
युगपुरुष कविवर श्री ‘सूर्यदीप’।
काश ! बचपन मेरा लौट आता
बचपन तो अक्सर यूँ ही गुज़र जाता है,
फिर कभी भी नहीं ये लौटकर आता है।
जैसे समय ये झरने सा, बहता जाता है,
बचपन का वो आँगन याद आता है।
जब बच्चों को खेलते हुए देखता हूँ,
मुझको अपना बचपन याद आता है।
काश! फिर से बचपन मेरा लौट आता,
बचपन का ख़याल दिल को रुला जाता है।
तब होती नहीं थी कोई आशा व निराशा,
बचपन के वो लम्हें बहुत ही अनमोल थे।
काश! फिर से वो बचपन मेरा लौट आता,
बचपन में मासूम चेहरा व मीठे बोल थे।
बचपन से संवेदनशील, भावुक इन्सान हूँ,
मैंने कभी भी दिल किसी का नहीं दुखाया।
बचपन में कहानी मुझे सुनाती थी दादी-नानी।
तितली को पकड़ना और वृक्षों पे चढ़ना,
छोटी-छोटी बातों पर बहनों से वो लड़ना,
विद्यालय जाने हेतु ख़ूब सुबह में उठना।
नोट /विशेष:- मैंने सदैव हिंदी रचनाकारों की रचनाओं को सराहा , लगातार उन्हें प्रकाशित किया, सभी साहित्यकारों को ‘कुछ और कुछ और’ लिखने को प्रेरित किया। सदैव ही हृदय से उत्साहवर्धन किया है।
जय माँ भारती!
आधुनिक भारत के समाज की तमाम कुरीतियों के विरोध में अहम भूमिका निभाने वाले जाने-माने प्रतिष्ठित समाज-सुधारक हैं। हिन्दुस्तान की नारी शक्ति की बुलंद आवाज़, सामाजिक एकता तथा समानता के प्रतीक, अतीव उदार हृदय के स्वामी –
– युगपुरुष कविवर श्री ‘सूर्यदीप’
भारतीय संस्कृति के अनुरूप एक दार्शनिक,
हिन्दी भाषा के महनीय कवि -साहित्यकार,
संवेदनशील समाज–सुधारक, सामाजिक कार्यकर्ता, आध्यात्मिक प्रखर चिन्तक, सम्पादक, नवोदय लोक चेतना कल्याण समिति, ऐतिहासिक बाग़पत, उत्तरप्रदेश, भारत।