
संजय एम तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इन्दौर, (मध्यप्रदेश)
नहीं करते जो तुम्हारा जिक्र…!
क्यों? करते हो उनकी इतनी फ़िक्र,
कभी नहीं करते जो तुम्हारा ज़िक्र।
छोड़ दो उन्हें ख़्वाबों में याद करना,
न बहाओ कीमती आँसू का झरना।
तुम कह दो उन्हें अपनी राह पकड़ो,
मेरा पीछा छोड़ो मुझे यूँ ना जकड़ो।
क्यों? करते हो उनकी इतनी फ़िक्र,
कभी नहीं करते जो तुम्हारा ज़िक्र।
क्या? दिया तुमने मुझे ज़िन्दगीभर,
खूब मारे ताने सुबह शाम दोपहर।
आज भी चढ़े हैं धन-दौलत के पर,
नकचढ़ो के कभी न पड़े नरम स्वर।
क्यों? करते हो उनकी इतनी फ़िक्र,
कभी नहीं करते जो तुम्हारा ज़िक्र।
ज़माने की ठोकर खाते फिरते हो,
पता नहीं किस-किससे मिलते हो।
इतना भी दिल यूँ ना लगाया करों,
सितम बेवफाई का ना ढाया करों।