हरीश काला, मयाली (रुद्रप्रयाग)
कर्मफल का सिद्धांत
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पूर्व जन्म, वर्तमान जन्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत को हमें मानना ही होगा। कर्म फल भोगने की धारणा पर अटूट विश्वास भी रखना होगा। हमारा कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता। देर-सवेर उसका फल हमें मिलता ही है। हम किसी को गाली दें, तो वह हमें थप्पड़ मार कर तुरंत बदला लेता है, यहाँ कर्म का फल तुरंत मिल गया। कुछ उल्टा सीधा खा पी लें, तो उसका फल कुछ दिनों बाद या वर्षों बाद शरीर में रोग के रूप में फूटता है। इसी प्रकार कुछ कर्मों का फल इसी जीवन में मिल जाता है, जबकि कुछ का अगले जन्म में।भगवान के यहाँ देर है पर अंधेर नहीं। भगवान को हम किसी भी नाम से पुकारें, उसे निराकार माने या साकार, पर यह तो मानना ही होगा कि सब कुछ उसी की कृपा से होता है। ईशावस्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् -इस संसार में जो कुछ भी है, कण-कण, में रोम-रोम में, ईश्वर का वास है । वही सारे संसार का नियंता है, नियामक है! हम सारे संसार को भले ही धोखा दे लें, पर भगवान को धोखा नहीं दे सकते। हमारे कर्मों का फल तो हमें अवश्य ही भोगना पड़ेगा ।हमारे जीवन में जो भी अच्छी-बुरी परिस्थितियाँ आती हैं, वे भी हमारे कर्मों का फल है। पूर्व जन्मों के कर्मों के अनुसार ही हमें इस जन्म में विभिन्न परिस्थितियों का सामना करना होता है!कोई अच्छे समृद्ध संस्कारी परिवार में जन्म लेता है, कोई दुराचारी, निर्धन परिवार में!किसी को अनेकानेक सुख-सुविधाएँ सरलता से उपलब्ध होती हैं, तो कोई सदैव अभाव या कष्ट में ही रहता है। इस सब के लिए हम किसी अन्य को दोष नहीं दे सकते। अब भी यदि हम खराब कर्म करते रहेंगे, तो अगले जन्म में हमें जीव जंतुओं की न जाने कितनी योनियों में कष्ट भोगने पड़ेंगे और फिर से मनुष्य शरीर मिला तो संभव है कि उस समय और अधिक विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़े। यदि अच्छे कर्म करेंगे तो अगले जीवन में और अधिक सुखद परिस्थितियाँ प्राप्त होगी!







