हवलदार जसकरन सिंह शौर्य चक्र (मरणोपरांत)

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हरी राम यादव, सूबेदार मेजर (आनरेरी) अयोध्या, (उ. प्र.)

 

 

                 वीरगति दिवस पर विशेष

 

                   हवलदार जसकरन सिंह

                  शौर्य चक्र (मरणोपरांत)

 

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं – एक वह जो केवल स्वयं में ही मशगूल रहकर पूरा जीवन बिता देते हैं और दूसरे वह जो अपनी कर्मठता, परिश्रम , नेतृत्व कौशल और साहस से ऐसा कुछ कर जाते हैं जो अविस्वस्नीय और बहुत मुश्किल लगता है और लिख जाते हैं एक कहानी , जिसे लोग सदियों तक पढ़ते हैं , लिखते है और अपने से आगे की पीढ़ी को सुनाते हैं।

 

सन् 1996 में हवलदार जसकरन सिंह की यूनिट 9 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट जम्मू कश्मीर के बारामूला जिले में तैनात थी। 27 सितंबर को पता चला कि पीरोजपुर में धान के खेतों में दो आतंकवादी छुपे हुए हैं । उन आतंवादियों को पकड़ने के लिए एक खोजी अभियान चलाने का निर्णय लिया गया । हवलदार जसकरन सिंह इसी खोजी और घेराव दल के सदस्य थे। छुपे हुए दोनों आतंकवादी इस उम्मीद में थे कि लंबी और घनी फसलें उन्हें भागने में मदद करेंगी। खेतों की तलाशी लेते देख आतंकवादियों ने हवलदार जसकरन सिंह पर फायरिंग शुरू कर दी। एक आतंकी ने शुरूआती फायर में ही हवलदार जसकरन सिंह के ऊपर सटीक निशाना लगा दिया, जिससे वह घायल हो गए । अपनी चोट की परवाह किए बिना हवलदार जसकरन सिंह ने तेजी से अपनी स्थिति बदली और प्रभावी रूप से आतंकवादियों को भागने से रोका और एक आतंकवादी को मार गिराया।

 

दूसरे आतंकवादी ने हवलदार जसकरन सिंह पर प्वाइंट ब्लैंक रेंज से ब्रस्ट फायर कर दिया जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गये और आतंकवादी वहां से निकलने के प्रयास में मेंड़ के पीछे कूद गया। हवलदार जसकरन सिंह घायल होने के बावजूद कूदकर मेंड़ के ऊपर आ गये और भागते हुए आतंकवादी को मार गिराया जो कि मोस्ट वांटेड आतंकवादी था। हवलदार जसकरन सिंह ने अकेले ही आतंकी संगठन को बड़ा नुकसान पहुँचाया। घाव गहरी और ज्यादा रक्तस्राव के कारण वह वीरगति को प्राप्त हो गये। हवलदार जसकरन सिंह ने अदम्य साहस, समर्पण और असाधारण वीरता का परिचय दिया। उनकी वीरता और पराक्रम के लिए 27 सितम्बर 1996 को मरणोपरांत “शौर्य चक्र” से विभूषित किया गया।

 

हवलदार जसकरन सिंह का जन्म 15 अगस्त 1958 को जनपद एटा के गांव नगला सरदार में श्रीमती बतोली देवी और श्री बुध पाल सिंह के यहां हुआ था। इन्होंने अपनी शिक्षा अपने गांव के स्कूल से पूरी की और 09 सितम्बर 1977 को भारतीय सेना की ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में भर्ती हो गये। प्रशिक्षण के पश्चात इनकी तैनाती 9 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में हुई।

 

हवलदार जसकरन सिंह के परिवार में उनकी पत्नी श्रीमती सुभद्रा कुमारी और उनके तीन बेटे – सुशील सिंह, शोभित सिंह और राहुल सिंह हैं। उनके दूसरे नंबर के बेटे शोभित सिंह अपने पिताजी के नक़्शे कदम पर चलते हुए अपने पिता की यूनिट 9 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में अपने सेवाएँ दे रहे हैं । हवलदार जसकरन सिंह की वीरता और बलिदान के सम्मान की भी कहानी प्रदेश के और वीरगति प्राप्त सैनिकों की ही तरह है। जनप्रतिनिधियों , स्थानीय प्रशासन और सैनिक कल्याण के लिए बनी सरकारी एजेंसियों की उदासीनता के चलते इनके नाम पर जिले में कहीं पर एक ईंट तक नहीं लगी है । इनकी परिजनों का कहना है कि हमारे गांव में एक शौर्य द्वार और स्मारक तक जाने वाली सड़क का नामकरण हवलदार जसकरन सिंह के नाम पर होना चाहिए । हवलदार जसकरन सिंह की यादों को बनाये रखने के लिए इनके परिजनों ने अपने गांव में अपने पैसे से एक स्मारक का निर्माण करवाया है, जो उनकी वीरता और बलिदान की कहानी को बयां कर रहा है ।

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