मनकी बात : ठंड, कैलेंडर और सत्ता की गर्मी

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प्रभारी सम्पादक (म. प्र.): राजेन्द्र सिंह जादौन।

 

 

 

व्यंग्य

  मनकी बात : ठंड, कैलेंडर और सत्ता की गर्मी

 

 

 

कल रात ठंड इतनी बर्बर थी कि खिड़की के बाहर हवा नहीं, मानो बेरहम राजनीति फुफकार रही हो। रज़ाई में दुबककर भी शरीर काँप रहा था, और बिजली का बिल याद आते ही हीटर तक हाथ बढ़ाने की हिम्मत भी ठिठुर गई। तभी अचानक मुझे सत्ता के उन तेजस्वी हिन्दू नेताओं का ख्याल आया जो हर समस्या का समाधान ऐसे बताते हैं जैसे देश नहीं, कैलेंडर चला रहे हों। जिनके भाषणों में मई की लू और नवंबर की ठिठुरन दोनों सिर्फ शब्दों का खेल होते हैं सच्चाई से उनका उतना ही लेना-देना होता है जितना जनता के सवालों से।

 

मन में खयाल आया कि अगर ये लोग इतने सहज भाव से हर विपत्ति को पलट कर विकास बता देते हैं, तो मैं क्यों न ठंड को गर्मी में बदल दूँ? जब सरकार मौसम की तरह बदल सकती है, तो मौसम को सरकार की तरह क्यों नहीं? बस मैंने ठिठुरते हाथों में थोड़ी हिम्मत जुटाई, कैलेंडर उठाया और नवंबर की सर्द पत्ती को उखाड़कर सीधा मई खोल दिया। जेठ का महीना जिसमें सड़कें पिघलती हैं और नेता जोश में जलते हुए भाषण देते हैं कि देश तप रहा है विकास की धूप में। मैंने भी वही राजनीति वाला तरीका अपनाया कागज पलटा और मौसम बदल गया। और कमाल ये कि कमरे में अचानक गर्मी की एक काल्पनिक लपट उठी, मानो मेरे हाथ में सत्ता की वही ताकत आ गई हो जो पन्नों से सच्चाइयाँ बदल देती है।

 

कमरे की गर्माहट तो काल्पनिक थी, पर व्यंग्य सच्चा। और इसी सच्चाई ने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि राजनीति का सबसे बड़ा हथियार कोई योजना नहीं, कोई नीति नहीं सिर्फ बदल देना है। चाहे वो बयान हों, मुद्दे हों, वादे हों, या फिर इतिहास के पन्ने। जनता ठंड में कँप रही हो या महँगाई में पिघल रही हो सत्ता के लिए मौसम सिर्फ एक रूपक है, जिसे भाषणों में गर्म करना और सोशल मीडिया में ठंडा करना उनकी रोज़ाना की कला है। जब नेता मंच पर चढ़कर कहते हैं कि देश बदल रहा है, नया भारत उभर रहा है, विकास की गर्मी हर घर तक पहुँच रही है तो इस कथित गर्मी से कहीं किसी का घर नहीं, सिर्फ सियासत का कमरा गरम होता है।

 

मेरे कैलेंडर का पन्ना तो मैंने पलट दिया, पर असल पन्ने कौन पलटता है? अदालतें तारीखें पलटकर मुद्दों को लंबा करती हैं, मंत्रालय कागज़ों को पलटते-पलटते योजनाओं की उम्र बढ़ाते हैं, और नेता चुनावी मौसम के हिसाब से बयान बदलते रहते हैं। जनता चाहे जितनी ठंड में काँपे, सत्ता अपने कमरे में मई की हवा चलाती रहती है। सवाल ठंड का हो या बेरोज़गारी का, उनके लिए जवाब हमेशा वही तैयार भाषा “ग्लोबल इफेक्ट”, “विपक्ष भटका रहा है”, “देश आगे बढ़ रहा है।” इस देश में हर समस्या का समाधान बयान के थर्मामीटर से नापा जाता है, और बयान चाहे जितने गरम हों, जनता की ठंड कम नहीं होती।

 

कल रात मेरे पास हीटर नहीं, विकल्प नहीं, बस व्यंग्य था। और उसी व्यंग्य ने मुझे सिखाया कि जब हालात बदल न सकें, तो नेता नहीं, आम आदमी भी कम से कम अपने कैलेंडर में बदलाव कर सकता है। फर्क बस इतना है कि नेता जहाँ पन्ना पलटते हैं, वहाँ सच्चाई गायब हो जाती है; और हम जहाँ पन्ना पलटते हैं, वहाँ सिर्फ हँसी आ जाती है। लेकिन ये हँसी छोटी नहीं है ये हँसी उस लोकतंत्र की आख़िरी आग है, जो ठंड में भी बुझने से इंकार करती है।

 

मैंने सोचा, अगर सत्ता में बैठे नेता मेरी ये ट्रिक देख लेते तो जरूर किसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहते “देखा, ये है आत्मनिर्भर भारत! आम आदमी ने कैलेंडर पलटकर ठंड हर ली।” और जनता ताली बजाती, जैसे हर बार बजाती है, इस उम्मीद में कि अगली बार असल गर्माहट उसके घर में भी पहुँचेगी। लेकिन राजनीति में बदलाव अक्सर काग़ज़ पर आता है, जीवन में नहीं। ठंड आती है, जाती है, पर समस्याएँ नवंबर की तरह हर साल लौट आती हैं जिद्दी और जमाने वाली।

 

फिर भी कल रात मई की उस काल्पनिक गर्मी में मैंने एक बात समझी व्यंग्य अब केवल साहित्य का हथियार नहीं, आम आदमी की जिंदगी का हीटर है। यह वह आग है जो न बिजली माँगती है, न अनुमति। नेता मौसम बदलते रहेंगे, हम कैलेंडर पलटते रहेंगे, और देश अपने-अपने तापमान में जीता रहेगा। पर जब तक हम हँस सकते हैं, सवाल उठा सकते हैं, और सच्चाई में गर्मी खोज सकते हैं तब तक लोकतंत्र सचमुच ठंड में नहीं जमेगा।

 

नवंबर की रात थी, पर मेरे कमरे में मई था। और यही सबसे बड़ी बात है सत्ता चाहे जितनी ठंड फैला ले, हमेशा अपना तापमान खुद तय करता है।

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