“जहाँ यह मायावी संसार तुम्हें तोड़ने, रोकने का षड्यंत्र रचेगा, वहाँ तुम्हारा आंतरिक बल (साहस) एक मौन ढाल बनकर अडिग खड़ा रहे।”- सुश्री सरोज कंसारी।

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सुश्री सरोज कंसारी

मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत

कवयित्री, लेखिका एवं अध्यापिका

समाज-सेविका, नवापारा-राजिम

रायपुर, छत्तीसगढ़।

 

 

                          (नया अध्याय, देहरादून)

 

                             आलेख :

“जहाँ यह मायावी संसार तुम्हें तोड़ने, रोकने का षड्यंत्र रचेगा, वहाँ तुम्हारा आंतरिक बल (साहस) एक मौन ढाल बनकर अडिग खड़ा रहे।”- सुश्री सरोज कंसारी।

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यह निष्ठुर जगत तुम्हारी आत्मा की परीक्षा लेगा, यह तुम्हें विघटित करने, पथ से विचलित करने और तुम्हारे संकल्प को खंडित करने का हर संभव प्रयत्न करेगा। अतः, तुम्हारा हौसला जीवन-यात्रा में एक अटल ध्रुवतारे के समान स्थिर रहे।” अपने व्यक्तित्व, परिवार और समाज, राष्ट्र हेतु हम कई तरह की सुखद कल्पनाएं करते हैं। जिस तरह के माहौल में रहते आए हैं, उसके प्रति एक सोच निर्मित होती है। जो भी अच्छाई-बुराई वहां व्याप्त होती है। उसे लेकर कई तरह के विचार आते हैं। और सोचते हैं। काश! एक व्यवस्थित, शांत और सुरक्षित जीवन हम जी पाते। मन में अच्छे विचार आते तो हैं परन्तु, उसे साकार करने, बुराइयों को दूर करने की कोशिश बहुत कम लोग कर पाते हैं। संसार की कमियों को देखने के बजाएं अपनी बुराइयों को खोजें। उसे दूर करते रहें तो कुछ सुधार संभव है। अपने आसपास को सुंदर, स्वच्छ और समस्याओं से मुक्त बनाने के लिए पहले अपने अंदर झांकना आवश्यक है। हम खुद को संत ही बताए और दूसरों दोष निकालते रहे तो किसी तरह की बुराइयों पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते। इंसान हैं जीवन के निर्वहन व्यस्तता आधुनिक जीवन शैली के बीच हमें संयम साहस और प्रेम का। रास्ता निकालना होगा तभी हम एक सुखद वातावरण का निर्माण कर सकते हैं कहने में सलाह देने जितना समय व्यतीत करते हैं उसे समाधान करने में व्यतीत किजिए। जिनके हृदय नफरत से भरे होते हैं। उन्हें संसार की खूबसूरती का आभास नहीं होता है। मानसिक स्थिति डांवाडोल रहती हैं, हमेशा दूसरों को हानि पहुंचाने, हरानेडराने, कलह, विवाद के बारे सोचते हैं, हर पल बेचैनी महसूस करते हैं। सात्विक भाव और सद्व्यवहारी बनने के लिए सत्य का अनुकरण जरूरी हैं, किसी पर आरोप- प्रत्यारोप मत कीजिए। चाहे रिश्ता कोई भी हो गलती हो जाने पर क्षमा करना सीखें। कभी किसी परिस्थिति में निष्ठुर मत रहिए। दया करुणा, सांत्वना देते रहें। हर इंसान को आत्मीय स्पर्श की आवश्यकता होती है। जिससे पत्थर दिल भी पिघलने लगता है। खुद की अनियंत्रित भावनाओं, भोग- विलास पर नियंत्रण रखें। भावुक होकर दिशा मत भटकें। सही राह पर चलें। चाहे वहां कितनी भी परेशानियां क्यों न हों? सदा मधुर वाणी बोलें। अपने दुर्व्यवहार से किसी को कभी दुखी न करें। आंतरिक रूप से पवित्र भाव रखने से बाह्य परिस्थिति स्पष्ट नजर आती है। दुर्भाव से भर जाने से अंतर्द्वंद्व उत्पन्न होते हैं । जीवन का सार ही आत्म कल्याण है। जिसके लिए हमें सर्वदा प्रयास करना चाहिए। अपने लक्ष्य के प्रति पूर्ण ईमानदार रहें। यह संसार कर्मक्षेत्र है। यहाँ अच्छे कार्यों और सद्विचारों के माध्यम से सकारात्मकता फैलाना हमारा कर्तव्य है। धर्म, अध्यात्म, भक्ति और नैतिक आचरण मनुष्य जीवन के मूल आधार हैं। ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण, दीन-दुखियों की सेवा और सहयोग से ही वास्तविक मानसिक शांति प्राप्त होती है।

हमें अपनी जिम्मेदारियों को पूर्ण निष्ठा से निभाते हुए आंतरिक द्वंद्वों और मनःस्थिति की अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है। हर व्यक्ति की सहनशक्ति और परिस्थितियों से जूझने की क्षमता भिन्न होती है, और हमारी सोच इन्हीं हालातों के अनुसार बनती है। जीवन में सुख-दुख के उतार-चढ़ाव में संतुलन बनाए रखना एक चुनौती है। बाहरी समस्याओं का समाधान खोजने के लिए, सबसे पहले अंतर्मन की उलझनो से निकलना आवश्यक है। जीवन के प्रति संदेहों और निर्णय लेने में असमर्थता पर विजय पाना ज़रूरी है। सच्चे संतोषी जीवन का मार्ग अनंत इच्छाओं पर अंकुश लगाने और आंतरिक शांति प्राप्त करने से होकर गुजरता है। याद रखिए! सरल रहने के लिए हमें कठिन तप करना होता हैं। जो त्याग करना जानते हैं अपनी खुशियों का औरों के लिए, वे ही मनुष्य जीवन को साकार कर पाने सक्षम हैं। मन के अव्यवस्थित भावनाओं को शुद्ध रखने के लिए हर तरह के दुर्भावों को दूर करना जरूरी है। कोई भी बुरी आदत तुरंत नहीं छूट जाती लेकिन हम चाहें तो धीरे-धीरे प्रयास से खुद में सद्गुणों को स्थापित कर सकते हैं। जब सद्कर्मों के लिए संकल्पित होते हैं। चाहे कैसे भी दौर हो हम अपनी अच्छाई को नहीं छोड़ते, तब कोई भी हालात हमें दिग्भ्रमित नहीं कर पाते।मन की चंचलता को सही दिशा देना जरूरी है। नाजुक मन में कभी भी कटुता का प्रहार नहीं करना चाहिए। दिल और दिमाग को सहज रखकर ही इस सांसारिक जीवन को सुखद बना सकते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट, आलस्य और अहंकार से जो भरे होते हैं। उनका हर पल दुख से भरा होता हैं, वे हर पल सुख की चाह में भटकते हैं लेकिन, कभी शांत नहीं रह पाते हैं। अंतर्मन में जब उलझन हो, सांसारिक जीवन का हर पल तकलीफों से भरा लगे, मन मस्तिष्क में नकारात्मक विचारों का लगातार प्रवाह हो तब अपने अंदर की शक्तियों को पहचानें की कोशिश करें, उन्हें सुप्त अवस्था से जागृत करें। उत्साहित कीजिए अपने मन को और तैयार हो जाइए। अपने मुरझाए जीवन में फिर से नई खुशियों का रंग भरने के लिए। सदुपयोग कीजिए इस अनमोल तन को क्रोध, नफरत और बदले में मत गुजारिए। अपने को कभी किसी कारण से कमजोर मत समझें। तुम जैसे हो बहुत अच्छे हो, अपने हर रूप को स्वीकार करें। खुद से प्यार किया कीजिये। सोचिए ! आपके जैसे और कोई नहीं हैं। तुम हर तरह की समस्याओं को हल करने में सक्षम हो, अपने हौसले से नई उड़ान भरो। तुम्हारा हौसला हर कदम पर अडिग रहना चाहिए। यह दुनिया निष्ठुर है, यह तुम्हें भावनात्मक रूप से तोड़ने का प्रयास करेगी, तुम्हारी राह में बाधाएँ डालेगी और तुम्हें रोकने की कोशिश करेगी… परन्तु, तुम्हें अपने लक्ष्य पर, जिस उच्च शिखर पर तुम पहुँचना चाहते हो, वहाँ अवश्य पहुँचना है। धैर्य रखो, हिम्मत से काम लो। तुम्हें न तो हारना है और न ही कहीं रुकना है। निरंतर चलते रहना ही जीवन का वास्तविक अर्थ है। चुनौतियों के बावजूद अडिग रहना।

 

 

   नारी शक्ति, अस्मिता की एक सशक्त प्रतीक

सादर !

 

 

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