गृहायुद्ध

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विवेक रंजन श्रीवास्तव

 

 

           पुस्तक चर्चा 

 

गृहायुद्ध

 

                         

                     (नया अध्याय,  देहरादून)

 

यह उपन्यास समकालीन भारतीय नौकरशाही और सरकारी आवास-व्यवस्था की जटिल दुनिया का उसे समझकर भीतर से किया गया सूक्ष्म चित्रण है। लेखक स्वयं प्रशासनिक सेवा से जुड़े रहे हैं, इसलिए कथा में जो दृश्य, प्रसंग और व्यवस्थागत पेच दिखाई देते हैं, वे कल्पना से अधिक अनुभवजन्य सत्य के रूप में उभरते हैं। सरकारी मकान यहां केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि सुरक्षा, प्रतिष्ठा, पहचान और अस्मिता का प्रतीक बन जाते हैं । इनसे जुड़ा संघर्ष ही उपन्यास के शीर्षक में निहित “गृहा-युद्ध” का रूप लेता है।

कथानक का केंद्रीय फलक सरकारी क्वार्टरों और उनसे संबंधित पूरी रोचक तथा जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया है। किसे कब, कौन-सा मकान मिलेगा, किसका नाम सूची में ऊपर जाएगा, किसका आदेश आखिरी क्षण में रुक जाएगा, कौन ट्रांजिट हॉस्टल में पड़े-पड़े परिवार से दूर कटता रह जाएगा, और कौन राजनीतिक सामाजिक प्रभाव से एक ही जगह पर जड़ जमा कर बरसों बैठा रहेगा। उपन्यास के अलग-अलग अध्याय, एक एक प्रकरण अपने-अपने स्तर पर स्वतंत्र छोटी कथा लगते हैं, पर धीरे-धीरे पाठक समझता है कि ये सब एक ही तंत्र के विभिन्न कोण हैं। जिन सबकी डोर अंततः आवास-संकट और उससे उपजे सरकारी तनावों से बंधी है। इस प्रक्रिया में सरकारी दफ्तर, विभागीय गेस्ट हाउस, फील्ड हॉस्टल, जिला मुख्यालय और मंत्रालय,सभी मिलकर एक ऐसा व्यापक “प्रशासनिक नगर” रचते हैं , जहाँ हर कमरे, हर फाइल और हर नोटशीट के पीछे किसी न किसी परिवार का अव्यक्त भय और उम्मीद छिपी है।

विषय वस्तु के स्तर पर ‘गृहायुद्ध’ केवल मकान-अलॉटमेंट की तकनीकी झंझटों का ब्यौरा नहीं है। एक छोटे से शासकीय क्वार्टर के न मिलने या छिन जाने का अर्थ है,बच्चों की पढ़ाई का बाधित हो जाना, पत्नी का अकेलापन, बूढ़े माता-पिता की देखभाल का संकट, रोज़-रोज़ बढ़ता किराया, असुरक्षित मोहल्लों में अस्थायी डेरा, और हर समय स्थानांतरण का खतरा बने रहने की मानसिक व्यथा,दूसरी ओर यही आवास-व्यवस्था कुछ लोगों के लिए विशेषाधिकार, शक्ति और अतिरिक्त आय का साधन बनती दिखती है। कहीं सिफारिश, कहीं “एडजस्टमेंट”, कहीं रिश्वत और कहीं सहकर्मियों के बीच आपसी सौदेबाज़ी । इस सबके बीच लेखक यह दिखाता है कि किस तरह एक संसाधन,जो मूलतः सुविधा और सुरक्षा देने के लिए है, धीरे-धीरे असमानता और अन्याय का औजार बन जाता है।

चरित्र-रचना इस उपन्यास की बड़ी उपलब्धि है। ईमानदार, नियमबद्ध और संवेदनशील अधिकारी, व्यवस्था से त्रस्त पर फिर भी उम्मीद न छोड़ने वाले कर्मचारी, आरामतलब, जोड़-तोड़ में निपुण, “इमेज” और श्रेष्ठता के खेल में लगे बड़े अफसर, चपरासी, ड्राइवर, बाबू, मकान दलाल, ठेकेदार, महिला अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता आदि सभी पात्र अपनी-अपनी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, तर्क और मनोदशा के साथ रचने में सुदर्शन जी की पकड़ उपस्थित है। कोई भी पात्र केवल खलनायक या केवल नायक बनकर नहीं आता, ईमानदार अफसर भी कभी-कभी व्यवस्थागत मजबूरियों के कारण समझौता करते दिखते हैं और भ्रष्ट माने जाने वाले पात्रों के भीतर भी अपनी तरह की असुरक्षाएँ और तर्क छिपे रहते हैं। इससे उपन्यास एकरेखीय न होकर बहु-स्तरीय और मानवीय हो उठता है।

भाषा और शैली भी विशेष ध्यान देने योग्य हैं। लेखक ने खांटी सरकारी-हिंदी, विभागीय शब्दावली और आम बोलचाल को बहुत स्वाभाविक तरीके से मिलाकर एक ऐसी भाषाई बुनावट रची है, जिसमें फाइल-नोटिंग, आदेश-पत्र, बैठक की कार्यवाही और कैंटीन की मौखिक गपशप, सबका स्वाद आता है। संवादों में व्यंग्य, नक़्क़ाशीदार विवरण और स्थानीय बोलियों के हल्के छौंके मिलकर वातावरण को अत्यंत जीवंत बना देते हैं। शिल्प की दृष्टि से विस्तृत दृश्य, बहु-पात्र संवाद और सूक्ष्म वर्णन, जैसे फील्ड हॉस्टल के तंग कमरे, सीलन भरी दीवारें, कतार में खड़े मकान-प्रार्थी, या देर रात तक जली रहने वाली ट्यूब-लाइट के नीचे झुकी फाइलें, पाठक को उस दुनिया के भीतर ले जाते हैं, मानो वह स्वयं उसी दफ्तर के गलियारों में चल रहा हो।

उपन्यास में व्यंग्य और यथार्थ का संतुलन महत्वपूर्ण है। कई प्रसंगों में स्थितियाँ इतनी विडंबनापूर्ण हैं कि पाठक मुस्कुराए बिना नहीं रह पाता, जैसे एक छोटे-से क्वार्टर की सूचना भर से पूरा विभाग सक्रिय हो जाना, दर्जनों फोन, चाय की बैठकों में मकान-चर्चा, मेमो और नोटशीट की भागदौड़, पर वही दृश्य ज्यों-ज्यों खुलता है, करुणा में बदलता जाता है, क्योंकि अंततः यह जद्दोजहद एक कर्मचारी के सम्मानजनक, स्थिर जीवन के न्यूनतम अधिकार के लिए है। लेखक व्यवस्था पर कटाक्ष करता है, पर पात्रों की बेइज़्ज़ती नहीं करता। वह उन्हें उनकी समग्र मानवीयता के साथ दिखाता है, जिससे पाठक उनके प्रति सहानुभूति भी महसूस करता है और सिस्टम पर गुस्सा भी आता है।

वैचारिक स्तर पर ‘गृहायुद्ध’ यह स्थापित करता है कि कर्मचारियों का आवास-संकट महज़ आर्थिक या तकनीकी मसला नहीं, बल्कि न्याय, समान अवसर, प्रशासनिक नैतिकता और मानवीय गरिमा का प्रश्न भी है। जब पात्र कर्मचारी वर्षों तक प्रतीक्षा-सूची में रहकर भी घर नहीं पा पाते, जबकि कुछ प्रभावशाली लोग नियमों की भाषा का उपयोग कर उन्हें अपने हित में मोड़ लेते हैं, तब पाठक अनिवार्य रूप से इस व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाने लगता है। आज के शहरों में बढ़ती रियल-एस्टेट कीमतें, अस्थायी किरायेदारी, लगातार होने वाले ट्रांसफर और असुरक्षित बस्तियाँ देखते हुए यह उपन्यास केवल सरकारी नौकरी की परिधि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हर उस नागरिक के अनुभव का रूपक बन जाता है जो घर की तलाश में व्यवस्था और बाज़ार के बीच पिस रहा है।

स्वाभाविक है कि इतने व्यापक और गहन विषय को समेटते हुए रचना कभी-कभी विवरणों से बोझिल भी हो जाती है,लम्बी प्रशासनिक प्रक्रियाओं, बैठकों या नोटिंगों का ब्यौरा सामान्य पाठक को धीमा कर सकता है। साथ ही, कथा का मुख्य फोकस सरकारी सेवकों की दुनिया पर है, जिससे व्यापक वर्गीय-विविधता अपेक्षाकृत सीमित महसूस हो सकती है, हालांकि परिधि पर ठेकेदारों, मजदूरों और झुग्गी-झोंपड़ी के बाशिंदों का उल्लेख इस कथा को जमीन से जोड़े रखता है। इन सीमाओं के बावजूद ‘गृहायुद्ध’ की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह एक दिखने में “छोटे” और तकनीकी विषय,सरकारी आवास, को केंद्र बनाकर एक बड़े, बहुस्तरीय सामाजिक-प्रशासनिक आख्यान में बदल देता है, जो पाठक के भीतर देर तक गूंजता रहता है और उसे अपने समय की व्यवस्था और अपने निजी “घर” के अर्थ पर नए सिरे से सोचने को उद्युक्त करता है।

मैंने भोपाल में उपन्यास की फिजिकल कापी पढ़ी कुछ नोट्स बनाए और आज यहां न्यूयार्क में ई कापी पढ़कर यह पुस्तक चर्चा लिखी है, दोनों ही रूप में मुझे उपन्यास ने बांधे रखा।

(विभूति फीचर्स)

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