डॉ. मोहन यादव के दो साल और प्रदेश के खस्ता हाल..?

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प्रभारी सम्पादक (मध्य प्रदेश): राजेन्द्र सिंह जादौन

               (नया अध्याय)

 

 

डॉ. मोहन यादव के दो साल और प्रदेश के खस्ता हाल..?

 

 

                 दो साल… सिर्फ दो साल

 

कागज पर यह सिर्फ 24 महीने होते हैं, लेकिन जनता की ज़िंदगी में यह कभी-कभी 24 साल जैसे लग जाते हैं। और मध्यप्रदेश के लिए तो पिछले दो साल ऐसे गुज़रे हैं जैसे किसी ने घड़ी को उल्टा घुमा दिया हो समय आगे बढ़ रहा है, पर हालात पीछे भाग रहे हैं।

 

वैसे डॉ. मोहन यादव की निजी छवि पर किसी को शक नहीं। आदमी सरल हैं, सीधे हैं, सादगीभरे हैं यह बात उनके समर्थक हवा में ऐसे उछालते हैं जैसे सादगी ही विकास का नया इंडिकेटर हो। अभी हाल ही में छोटे पुत्र का विवाह उन्होंने ऐसे साधारण ढंग से किया कि सादगी भी शर्मा जाए। 22 जोड़ियों का सामूहिक विवाह भी करवा दिया एक तीर से कई निशाने। फोटो खिंचीं, सुर्खियाँ बनीं, और इन सबके बीच ‘सादगी’ का एक ऐसा प्रचार रथ निकला जिसने सरकारी विज्ञापनों से भी ज्यादा शोर मचा दिया।

 

देश के चौथे नंबर के ‘रईस’ मुख्यमंत्री का ऐसा आयोजन यह सुनकर लोग थोड़ा चौंकते हैं। लेकिन आजकल भारतीय राजनीति में यही चलन है जितनी जेबें भारी, उतनी बातें हल्की। और जनता खुश! जनता को तो सादगी दिख गई, बाकी प्रदेश की हालत का क्या वह बाद में देख लेंगे।

 

सवाल यह है कि सादगी अच्छे गुणों की सूची में जरूर आती है, लेकिन क्या इससे प्रदेश का विकास होता है?

 

क्या बिजली-पीने का पानी-सड़क-स्कूल-अस्पताल सादगी देखने से मिल जाते हैं? क्या बेरोजगारी किसी सामूहिक विवाह मंडप में बैठकर कम हो जाती है? क्या भ्रष्टाचार विभागीय समीक्षा की उस 15 मिनट वाली बैठक में खत्म हो जाता है जिसमें सचिव से लेकर मंत्री तक सिर्फ चाय ठंडी होने से पहले रिपोर्ट मांग लेते हैं?

 

प्रदेश की हालत आज ऐसी है जैसे किसी सरकारी टेबल पर पड़ी पुरानी फाइल धूल से भरी, कोने मुड़े हुए, और अगर खोलो तो पहला पन्ना ही गायब। दो साल में प्रदेश को यह उम्मीद थी कि कुछ बदलेगा, पर बदला क्या? बस पोस्टर सिर्फ पोस्टर। हर चौक, हर दीवार, हर होर्डिंग पर वादा… पर जनता की थाली, जेब और उम्मीदें वहीं की वहीं।

 

सरकार समीक्षाओं में व्यस्त है। हर विभाग की समीक्षा। हर मंत्री की समीक्षा। हर योजना की समीक्षा। समीक्षा इतनी तेज कि किसी दिन अगर भाजपा ऑफिस में वाई-फाई धीमा हो जाए तो शायद समीक्षा से पहले उसका भी परीक्षण कर दिया जाए।

 

लेकिन जनता की समीक्षा कौन करेगा? किसी ने यह नहीं पूछा कि जो वादा किया था वह पूरा हुआ या नहीं। किसी ने यह नहीं पूछा कि सरकारी अस्पतालों की हालत क्यों नर्सिंग होम के विज्ञापनों जैसी लगने लगी है। किसी ने यह नहीं पूछा कि युवाओं के रोजगार का क्या हुआ न एग्ज़ाम समय पर, न रिज़ल्ट भरोसेमंद, और न ही भर्ती प्रक्रिया सरकारी दावों के हिसाब से साफ।

 

मोहन यादव की व्यक्तिगत छवि चाहे जितनी सुहावनी हो, लेकिन शासन कोई व्यक्तित्व प्रतियोगिता नहीं है। यह वह दायित्व है जिसे निभाने के लिए सिर्फ सज्जनता नहीं, कड़क फैसले चाहिए। और कड़क फैसलों की जगह अब तक सिर्फ कड़क भाषण मिले हैं। शहरों की सड़कें कड़क नहीं हैं, बस भाषण कड़क हैं। गाँवों में पानी कड़क नहीं है, बस दावे कड़क हैं। युवाओं के भविष्य की राह कड़क नहीं है, बस विज्ञापन कड़क दिखते हैं।

 

प्रदेश की हालत इतनी पतली हो गई है कि आज कोई भी पुरानी सरकारी फाइल उठाओ, आधे दस्तावेज़ गायब और बाकी धुंधले मिलते हैं। योजनाओं का पैसा कहाँ जाता है, किस जेब से निकलकर किस जेब में समा जाता है यह इतना गोपनीय है कि RTI भी शर्मा जाए।और विभागों में हालात इतने अजब-गजब कि अफसर कुर्सियों पर बैठे-बैठे अपनी कुर्सियों के लिए ही लड़ाई लड़ रहे हैं। स्वस्थ विभाग हो, नगरीय प्रशासन हो, शिक्षा हो, PWD हो हर जगह या तो फाइलें अटकी हैं या अफसर और नेता आपस में।

 

और जनता? जनता आज भी उसी पुरानी लाइन में खड़ी है राशन कार्ड अपडेट कराने की लाइन, बिजली बिल सुधार की लाइन, अस्पताल में डॉक्टर के इंतज़ार की लाइन, और अंत में वोट डालने की लाइन।

 

दो साल में सरकार को ये दिखा कि प्रदेश आगे बढ़ रहा है। जनता को यह दिखा कि प्रदेश आगे बढ़ने का सिर्फ प्रचार बढ़ रहा है। दोनों अपने-अपने चश्मे से खुश हैं सरकार अपने चश्मे से, जनता अपनी मजबूरी के चश्मे से।

 

मोहन यादव की सादगी में कोई संदेह नहीं। लेकिन सादगी का शासन मॉडल अब पुराना पड़ चुका है। आज जनता को ‘सरल मुख्यमंत्री’ नहीं, ‘कठोर फैसले’ चाहिए। सरल व्यक्तिव नहीं, मजबूत प्रशासन चाहिए। और प्रशासन ऐसा जो विभागों की समीक्षा 30 मिनट में नहीं बल्कि असर के साथ करे।

 

भ्रष्टाचार खत्म हो या कम से कम उसका चेहरा तो दिखे। पर आज तो हालात यह हैं कि भ्रष्टाचार सीधा जनता के सामने खड़ा होकर कह रहा है “मैं हूँ, और मैं रहूंगा। तुम बस पोस्टर पढ़ते रहना।” दो साल में सरकार ने बहुत कुछ बताया पर दिखाया कम। और प्रदेश की हालत देखकर लगता है जैसे सरकार ने विकास को ‘सादगी’ के साथ ही न्यूनतम कर दिया है।

 

सरकार चाहे लाख दावे कर ले, लेकिन जनता की बातचीत में आज भी वही तीन बातें घूम रही हैं रोजगार नहीं, भ्रष्टाचार है, सड़क नहीं, गड्ढे हैं, सुविधाएं नहीं, सिर्फ कार्यक्रम हैं। दावे उड़ते हैं, हकीकत चलती है धीमी, लड़खड़ाती, और सरकारी फ़ाइलों की तरह फिसलती हुई।

 

मोहन यादव जी, सादगी आपकी निजी पहचान है, पर प्रदेश आपकी निजी संपत्ति नहीं। यह जनता की ज़िंदगी है, और जनता आज भी वही पुरानी उम्मीदों में झूल रही है।

दो साल बीत गए। और प्रदेश की हालत देखकर लगता है कि विकास कहीं गया नहीं वह सिर्फ रास्ता पूछते-पूछते भटक गया है।

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