“मानसिक शांति सर्वोपरि आवश्यकता है। अपने मन को इतना सुदृढ़ व स्थिर बनाए रखें कि कोई भी बाहरी परिस्थिति या कठिनाई आपकी शांति को भंग न कर सके।” – दार्शनिक कविवर सूर्य।

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सम्पादक (उ. प्र.): दार्शनिक कविवर सूर्य

आध्यात्मिक चिन्तक,

साहित्यकार, मानवतावादी।

 

      मुख्य शीर्षक – 

“मानसिक शांति सर्वोपरि आवश्यकता है। अपने मन को इतना सुदृढ़ व स्थिर बनाए रखें कि कोई भी बाहरी परिस्थिति या कठिनाई आपकी शांति को भंग न कर सके।” – दार्शनिक कविवर सूर्य।

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       (नया अध्याय, देहरादून)

 

प्रेम से ही जीवन वास्तविक अर्थों में सुन्दर बनता है। संवेदनशीलता की गूँज दूर-दूर तक सुनाई पड़नी चाहिए। साहित्य मनुष्य के हृदय की आध्यात्मिक प्यास बुझाता है, और उसे निरंतर संवेदनशील बनाता आया है। मनुष्य का हृदय स्वभावतः इन्हीं भावों के लिए आकुल रहता है। प्रेम की गहराईयों को जानने वाले ही इस असहनीय पीड़ा को खामोशी से सहने का सामर्थ्य रखते हैं। जीवन में मानसिक शांति सबसे आवश्यक व अनमोल है। अपने भीतर के मन को इतना पक्का बना लें कि कोई भी बाहरी समस्या उसकी शांति भंग न कर पाए। यह काल टूटने का नहीं, अपितु जागृति का दीपक स्वयं भी प्रज्वलित रखने तथा औरों में भी जलाने का है। जहाँ हृदय की भावनाओं तथा समय की गरिमा का अनादर हो, वहाँ से मौन विदाई लेना ही श्रेयस्कर होता है।

 

        आज के मर्मरहित युग में वाणी का महत्व: मनुष्यों को वाणी का वरदान प्राप्त है, जिससे उन्हें सर्वोपरि और सर्वोत्तम जीवन मिला है। तथापि, प्रत्येक मनुष्य का मन ही समस्त दुखों की जड़ होता है, जो एक बड़ी शक्ति भी है। इस मन को स्थिर रखने की कला हर किसी में सहज रूप से विद्यमान नहीं होती। मनुष्य को प्राप्त यह ‘वाणी’ नामक दैवीय वरदान, वास्तव में उसके हृदय का दर्पण है। वर्तमान काल के इस आपाधापी भरे, भीषण कठोर तथा मर्मरहित संसार-सागर में—जहाँ संवादों की सरिता में बहुधा विषतुल्य (जहर के समान) कटुता तथा उपेक्षा का भाव विद्यमान रहता है—वहाँ वाणी का माधुर्यपूर्ण, शालीन एवं सर्व-कल्याणकारी होना नितांत आवश्यक है। कर्कश तथा विषाक्त शब्दों के प्रहार, एक संवेदनशील और भावुक हृदय को गहरे तक आहत कर देते हैं, जैसे कोई अदृश्य घाव। इसके विपरीत, जो हृदय पहले से ही पाषाणवत कठोर हो चुका है, उस पर इन आघातों का कोई असर नहीं होता, वह पीड़ा से अछूता रह जाता है। अतः, हमारी वाणी केवल शब्दों का समूह न होकर, यह (वाणी) संवेदनशीलता, करुणा तथा आत्मीयता का मधुर प्रवाह बननी चाहिए। जो न केवल हमारे अपने अस्तित्व को, वरन् समस्त मानवता को एक सौम्य एवं शांतिपूर्ण दिशा प्रदान कर सके। एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण निवेदन है कि उस संवेदनशील हृदय वाले व्यक्ति को कभी भी नज़रअंदाज़ न करें जो आपसे अगाध प्रेम करता है, आपकी परवाह करता है, आपका सम्मान करता है व आपको नितांत स्मरण करता है। वास्तव में, चिंता तथा आदर केवल वही व्यक्ति करता है जिसका हृदय प्रेम से ओत-प्रोत होता है। किसी भी रिश्ते की नींव में ‘परवाह’ सबसे अनिवार्य तत्व है; यदि परवाह विद्यमान है, तभी वह रिश्ता जीवित और सार्थक है। हे सर्वज्ञ ईश्वर, सबका कल्याण हो।

 

जयतु भारतम्।

“भारतीय संस्कृति के संरक्षक, सामाजिक समता एवं एकात्मता के प्रतीक”

 

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