ऊँट संरक्षण: रेगिस्तान का जहाज खतरे में 🐪

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रमेश चंद्र मीणा

(एडिशनल सेक्रेटरी)

लैंड एंड बिल्डिंग डिपार्टमेंट

दिल्ली सरकार

 

   (नया अध्याय, देहरादून)

     

              ऊँट संरक्षण: रेगिस्तान का जहाज खतरे में 🐪

राजस्थान के लिए ऊँट (Camel) केवल एक पशु नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, आर्थिक और पारिस्थितिक पहचान का प्रतीक है। इसे ‘रेगिस्तान का जहाज’ कहा जाता है, लेकिन आज इसकी संख्या तेजी से घट रही है। राजस्थान के विशेष संदर्भ में, ऊँट संरक्षण और पशुपालक (रबारी/रायका) समुदायों की घटती संख्या एक गंभीर समसामयिक संकट है जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।

संकट के मुख्य कारण और विश्लेषण

ऊँटों की घटती संख्या के पीछे कई जटिल कारक जिम्मेदार हैं:

1. राज्य पशु संरक्षण अधिनियम और उसके अप्रत्याशित परिणाम

राजस्थान सरकार ने 2014 में ऊँट को राज्य पशु घोषित किया और ‘राजस्थान ऊँट (वध पर रोक और अस्थायी प्रवासन या निर्यात का विनियमन) अधिनियम’ लागू किया। इस कानून का उद्देश्य ऊँटों के वध को रोकना था, लेकिन इसके दो बड़े अप्रत्याशित परिणाम हुए:

गैर-कानूनी बिक्री पर रोक: अधिनियम ने राज्य के बाहर ऊँटों के व्यापार और बिक्री पर प्रभावी रूप से रोक लगा दी। इससे ऊँटों का आर्थिक मूल्य घट गया।

पशुपालकों का मोहभंग: जब ऊँटों को बेचना मुश्किल हो गया, तो पालकों के लिए उन्हें पालना लाभप्रद नहीं रहा, जिससे उन्होंने प्रजनन (Breeding) कम कर दिया और धीरे-धीरे इस व्यवसाय से दूरी बना ली।

2. चर भूमि (Pasture Land) का सिकुड़ना

ऊँटों के लिए भोजन मुख्य रूप से ओरण, गोचर, और पारंपरिक चरागाहों से आता है।

जनसंख्या वृद्धि और शहरीकरण के कारण ये चरागाह तेजी से अतिक्रमण की चपेट में आ गए हैं।

सरकारी योजनाओं, विशेषकर सौर ऊर्जा संयंत्रों (Solar Parks) और ढांचागत परियोजनाओं (Infrastructure Projects) के लिए चर भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है।

इससे ऊँटों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता और उनके पारंपरिक यात्रा मार्ग (Migration Routes) बाधित हो गए हैं।

3. आजीविका और सांस्कृतिक परिवर्तन

यांत्रिकीकरण: कृषि और परिवहन में ट्रैक्टर, ट्रक और अन्य वाहनों के बढ़ते उपयोग ने ऊँटों की उपयोगिता को कम कर दिया है।

रबारी/रायका समुदाय का पलायन: पारंपरिक ऊँटपालक समुदाय (जैसे रबारी और रायका) अब अपने बच्चों को शहरों में बेहतर शिक्षा और नौकरी के लिए भेज रहे हैं। नई पीढ़ी इस कठिन और कम लाभ वाले व्यवसाय को अपनाने में रुचि नहीं दिखा रही है।

समाजोपयोगी सुझाव और समाधान

इस संकट को हल करने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन और पारिस्थितिक बहाली पर केंद्रित बहु-आयामी रणनीति की आवश्यकता है:

        नीतिगत सुधार: ऊँट संरक्षण अधिनियम की समीक्षा की जाए। वध को नियंत्रित रखते हुए, राज्य के भीतर और बाहर उनकी कानूनी बिक्री और व्यापार को आसान बनाया जाए ताकि पालकों को प्रोत्साहन मिल सके।

आर्थिक प्रोत्साहन:

पालकों को प्रति-ऊँट सब्सिडी दी जाए ताकि उनके पालन-पोषण की लागत कम हो सके।

ऊँट पर्यटन और ऊँटनी के दूध पर आधारित डेयरी उद्योग को सरकारी समर्थन और ब्रांडिंग दी जाए।

पारिस्थितिक संरक्षण:

शेष बची हुई चर भूमियों (Gochar/Oran) को कानूनी रूप से संरक्षित किया जाए और उन पर अतिक्रमण हटाया जाए।

ऊँटों के पारंपरिक मार्गों को ‘कंजर्वेशन कॉरिडोर’ के रूप में मान्यता दी जाए।

सांस्कृतिक पुनर्जागरण:

राज्य सरकार और गैर-सरकारी संगठन (NGOs) मिलकर ऊँटपालक समुदायों को आधुनिक बाजार से जोड़ें, जिससे उनकी पारंपरिक जीवनशैली को सम्मान मिले और युवा इस पेशे में वापस आ सकें।

निष्कर्षतः, ऊँट संरक्षण केवल पशुधन का मामला नहीं है; यह राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत, जैव विविधता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बचाने का प्रश्न है। टिकाऊ समाधानों के साथ ही रेगिस्तान के इस जहाज को बचाया जा सकता है।

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