युगपुरुष कविवर सूर्य
प्रखर आध्यात्मिक चिन्तक
महनीय समाज-सुधारक, साहित्यकार
भारतीय मानवतावादी, दार्शनिक
(नया अध्याय, देहरादून)
“वैदिक प्रकाशन द्वारा युगपुरुष कविवर सूर्य जी की पुस्तक ‘मानवता ही मानवीय लक्ष्य’ का शीघ्र प्रकाशन।”
सम्पादक की क़लम से…
वर्तमान समय की चुनौतियों व मानवता की स्थिति : हे ईश्वर, यह कैसा दौर है, मानवीय संवेदनाएँ जहाँ कुंठित हो गई हैं। जहाँ लोगों की खुशियाँ किसी क्रूर व्यापार की वस्तु बन गई हैं। नैतिकता तथा सज्जनता की आवाज़ें दबी हुई हैं, जबकि चालाक एवं पाशविक प्रवृत्ति वाले लोगों का दबदबा बढ़ता जा रहा है। मानवता का सबसे बड़ा पतन यह नहीं कि इंसान गिर गया है, वरन् यह है कि वह गिरते हुए को देखकर भी मौन है। दूसरों की पीड़ा का यह दृश्य मेरे कविवर-हृदय को विचलित कर देता है।
मानवीय, कोमल स्वभाव बहुआयामी है तथा इसमें विभिन्न प्रेरणाएँ व व्यवहार शामिल होते हैं। मेरे जीवन में चुनौतियाँ तथा निराशाएँ होती हैं। किन्तु, मानवीय संवेदना एवं करुणा ही बेहतर समाज की ओर ले जाने वाली सूर्य की आशावान किरणें हैं, जो अज्ञानता से ढके जग के अंधेरे को अविरल मिटाती रहती हैं। मैं सूर्य हूँ, मैं कविवर हूँ। मेरा जीवन इस निठुर” तथा”संवेदनहीन” संसार में, व्याप्त अज्ञान के अंधकार को मिटाने के लिए है।
मानवता की सेवा ही ईश्वर की सेवा है। यही सर्वज्ञ ईश्वर की वास्तव में, पूजा है।
सरलता ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति है। हमें सहानुभूति, दया तथा मानवता को बढ़ावा देने का, बिना किसी रुकावट के प्रयास करते रहना चाहिए। हम मिलकर एक ऐसा संसार रचें जहाँ मनुष्य भयमुक्त निर्भीकता के संग जीवन जिएँ। संसार में विश्व-शांति तथा सद्भावना का घर क़ायम हो। आज के इन्सान, जो इन्सान होने का केवल दावा करते हैं, उन्होंने वास्तव में, इन्सान बनने की कोशिश नहीं की; सीखा कम तथा गलतियाँ ज़्यादा कीं। मनुष्यों को, विश्व बंधुत्व का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए, क्योंकि यह उनकी आवश्यकता है।
यह मेरा सर्वदा से मानना रहा है कि जब लोग अपनी भावनाओं को दबाते रहते हैं, तो उनकी आत्मा निर्जीव हो जाती है। साहित्य (काव्य) की सार्थकता तभी होती है जब वह अमानवीय, पशु-तुल्य समाज में, व्याप्त बुराइयों, विसंगतियों तथा समस्याओं को उजागर करता है। काव्य के मर्म को समझने-समझाने तथा संवेदनाओं को जगाने के साथ ही, संस्कृति को विकसित तथा बेहतर बनाने का, मेरा यह अविरल प्रयास ही मेरी और साहित्य की सार्थकता का मापदंड है।
हे ईश्वर, अज्ञान से ढके इस संसार में, दया ही सबसे बड़ा धर्म है; मेरी आपसे सभी के सुख की अभिलाषा है। यह संसार केवल निर्मम, निष्ठुर तथा संवेदनहीनता की पराकाष्ठा नहीं, अपितु एक ऐसा अंधकारमय मायाजाल है, जहाँ मानवीय संवेदनाओं का कोई मोल नहीं। यहाँ भावुक, कोमल हृदयों को पग-पग पर, क्रूर छलनाओं तथा स्वार्थ की अग्नि में जलकर भस्म होना पड़ता है। यह धरा, जो कभी प्रेम और करुणा का उद्गम स्थल मानी जाती थी, अब पाषाण की भाँति कठोर हो चुकी है, जहाँ भावनाओं का चीरहरण कर उन्हें मौन रुदन के लिए विवश कर दिया जाता है। इस मरुभूमि में, सच्चे भावों के लिए कोई स्थान नहीं, केवल धोखे की काली परछाइयाँ हर ओर पसरी हैं।
मैं, सामाजिक, धार्मिक तथा अमानवीयता, कुरीतियों पर, कठोरता से प्रहार कर मानवीय नैतिक मूल्यों की स्थापना करने के लिए सार्थक प्रयासरत हूँ।
हिन्दी साहित्य-जगत् के प्रखर सूर्य,







