प्रभारी सम्पादक जौनपुर यूपीः पंकज सीबी मिश्रा
राजनीतिक विश्लेषक
(नया अध्याय)
बराबरी की बहस से दिखावे की शिक्षा तक…..!
बराबरी की बहस से दिखावे की शिक्षा तक सब कुछ समाज को खोखला कर रही । बराबरी का अर्थ यह नहीं कि सरकारी स्कूलों को निजी स्कूलों की नकल सिखा दी जाए या निजी स्कूलों पर सरकारी ढर्रे की योजनाएँ थोप दी जाएँ। बराबरी का अर्थ है—समान शैक्षिक दर्शन और समान परिवेश । जहाँ सरकारी स्कूलों को संसाधन, शिक्षक-संख्या और अकादमिक स्वायत्तता मिले, और निजी स्कूलों को बाल-मनोविज्ञान, तनाव-मुक्त सीखने और सामाजिक उत्तरदायित्व की अनिवार्यता स्वीकार करनी पड़े तब जाकर समानता स्वीकार्य होगी । आज की विडंबना यह है कि नीति-निर्माता जाति के आंकड़ों में बराबरी खोज रहे हैं, जबकि कक्षा में असमानता गहरी होती जा रही है। जब तक शिक्षा को बच्चे के विकास से जोड़कर नहीं देखा जाएगा, तब तक कहीं बचपन छीना जाएगा और कहीं सीखने का अधिकार। बराबरी की बात तब सार्थक होगी, जब शिक्षा व्यवस्था संस्थानों की प्रतिष्ठा या नीतियों की सफलता नहीं, बल्कि बच्चे के मन, बुद्धि और मानवीय गरिमा को केंद्र में रखेगी। इसके बिना हर सुधार, हर बहस और हर घोषणा सिर्फ़ और सिर्फ एक छलावा ही रहेगा । ज़ब तक बौद्धिक दिखावा सवर्णो में बनी रहेगी, तब तक राजनीति यह स्वीकार नहीं कर पाएगी कि आर्थिक संवर्ग में सभी जाति एक ही मानक पर खड़े है। उदाहरण के लिए निजी और सरकारी विद्यालयों को ले लीजिये, दोनों में अंतर केवल भवन, फीस या परिणाम का नहीं, बल्कि शिक्षा और लक्ष्य आधारित दृष्टि का भी है। सरकारी विद्यालयों में जहाँ शिक्षा को सामाजिक उत्तरदायित्व मानकर न्यूनतम संसाधनों में अधिकतम समावेशन की लड़ाई लड़ी जा रही है, वहीं निजी विद्यालय शिक्षा को बाज़ार की भाषा में बिजनेस से जोड़ा जा चुका है जो आउटपुट और रैंक में बचपन को तौलने का उपक्रम बन चुके हैं। दोनों ही जगह बच्चा केंद्र में नहीं है अपितु कहीं वह योजनाओं और आदेशों के झंझावात में फंसा पड़ा है, तो कहीं प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं की चक्की में पिस रहा है । आखिर क्यों कागज़ के चंद नोटों के लिए यह अमूल्य बचपन घिस कर हम मानवीय दृष्टि खत्म कर दे रहें ! शिक्षाशास्त्र कहता है कि शिक्षा का उद्देश्य बच्चे के संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास का संतुलन है। पर सरकारी स्कूलों में आनंदमयी शिक्षा को अक्सर संसाधन विहीन प्रयोगशाला बना दिया गया है जहाँ शिक्षक पर रजिस्टटर और योजनाओं का बोझ, कागज़ी नवाचार और गैर-शैक्षणिक कार्य थोपकर यह मान लिया गया कि सीखना अपने आप हो जाएगा। परिणाम यह कि अनुशासनहीनता को स्वतंत्रता और अकादमिक शून्यता को आनंद का नाम दे दिया गया। यह आनंद नहीं, बल्कि उपेक्षा है।
क्या समाज बनाया है हमनें स्कूली शिक्षा के नाम पर..! नर्सरी में पढ़ने वाली एक बच्ची जब डीएम ऑफिस पहुंचती है और वहां जाते ही उसने डीएम से कहा कि मुझे आपकी तरह डीएम बनना है। तब इस घटना से भावुक स्कूली शिक्षित लोग भाव विभोर होकर वाह वाह कर रहे हैं, क्योंकि इन सबके घरों का यही माहौल होता है। बच्चों को डीएम, डॉक्टर, इंजीनियर बनाने का इनका सपना होता है और इसे ये शिक्षा बोलते हैं। जब डीएम ने उस बच्ची से पूछा कि तुम्हें मेरे जैसा क्यों बनना है तो उसने कहा कि घर में सब लोग मुझे कहते हैं कि तुम्हें डीएम बनना है….. ये घर का माहौल है जो नर्सरी की बच्ची को डीएम बनने को बोल रहा है..ना कि बचपन जीने को ! सोचिए थोड़ा कभी कि आपके घरों के बच्चे क्यों नहीं प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, मूर्तिकार, पेंटर, बांसुरी वादक या ऐसा कुछ बनना चाहते हैं? उन्हें क्यों डॉक्टर, डीएम और इंजीनियर वगैरह ही बनना होता है ? मेरे एक मित्र का बच्चा डॉक्टर बनने के लिए जी तोड़ मेहनत कर रहा है, इम्तेहान पर इम्तेहान दिए जा रहा है.. मैने जब अपने मित्र से पूछा कि इसे डॉक्टर ही क्यों बनना है ? वो मुझ से कहने लगा कि यार बहुत पैसा है नोट छापेगा और फिर क्या होगा वही करोड़ों खर्च कर डॉक्टर बनने वाला बच्चा, रोग से बेहाल, तिल तिल कर मर रहें निराश्रितो को आईसीयु, कमिशन, मेडिकल, जाँच के नाम पर लूटेगा । सोचिए कोई क्यों डॉक्टर बनना चाहेगा ? 24 घंटे मरीज़ से घिरे रहना, बीमारी, गंदगी, उल्टी, मवाद, गू, मूत्र इत्यादि देखना और उसी में जीवन बिताना..सिर्फ चंद कागज़ के नोटों के लिए…. छी ! क्यूंकि आपके आसपास कभी कोई स्वस्थ औरा बन ही नहीं पाता है जिससे आप अपने बच्चों को अच्छा कुछ बना पाए डॉक्टर इंजिनियर अधिकारी के अलावा जहां बस छलावा ही है। जिस अस्पताल में लोग जाने से घबराते हैं और दुआ करते हैं कि भगवान उन्हें कभी अस्पताल न पहुंचाएं, वहां आपके बच्चे को डॉक्टर बनकर 24 घंटे और सारी उम्र रहना है क्या ये कोई ड्रीम जॉब है ? ये कुछ है ऐसा जिसे करने की लालसा किसी के मन में प्राकृतिक रूप से जन्म ले ? नहीं प्राकृतिक रूप से आप के भीतर डॉक्टर बनने की चाहत कभी नहीं आती है, बल्कि यह आपके ऊपर थोपा गया मानसिक दुष्प्रभाव है। इसके लिए निजी विद्यालयों ने शिक्षाशास्त्र को प्रतियोगिता की गुलामी में झोंक दिया है। यहाँ बचपन, सीखनें की विवशता, परीक्षा-केन्द्रित, समय-सारिणी-निगल और परिणाम-आसक्त हो चुका है। बच्चे की जिज्ञासा, खेल, असफलता से सीखने का अधिकार—सब ‘सिलेबस पूरा हुआ या नहीं’ की बलि चढ़ जाते हैं। यह शिक्षा नहीं, प्रशिक्षण शिविर है, जहाँ मनुष्य नहीं, उत्पाद गढ़े जाते हैं।







