विनोद कुमार शुक्ला: साधारण शब्दों में असाधारण संसार रचने वाला जादुई रचनाकार

Spread the love

 

संजय सोंधी 

(संयुक्त सचिव) 

भूमि और भवन विभाग 

दिल्ली सरकार

 

 

(नया अध्याय)

 

 

विनोद कुमार शुक्ला: साधारण शब्दों में असाधारण संसार रचने वाला जादुई रचनाकार

 

 

​                  हिंदी साहित्य जगत के सबसे मौलिक और अनूठे हस्ताक्षर विनोद कुमार शुक्ला का 88 वर्ष की आयु में निधन हो गया। 1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ला ने हिंदी साहित्य को वह दृष्टि दी जो अब तक दुर्लभ थी। वे एक ऐसे रचनाकार थे जिन्होंने साधारण से साधारण वस्तु, व्यक्ति और घटना में एक अलौकिक सौंदर्य और जादुई यथार्थ ढूंढ निकाला। उनकी शिक्षा-दीक्षा और कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से कृषि और प्रकृति से जुड़ा रहा, जिसका गहरा प्रभाव उनकी लेखनी पर भी दिखाई देता है। उन्होंने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में अपनी सेवाएँ दीं, लेकिन उनका असली संसार शब्दों के भीतर बसता था। विनोद कुमार शुक्ला की साहित्यिक यात्रा उस समय शुरू हुई जब हिंदी कविता और उपन्यास अपने शिल्प में बदलाव की तलाश कर रहे थे। उन्होंने अपनी पहली ही कविता संग्रह ‘लगभग जयहिंद’ से यह साफ कर दिया था कि वे परंपरा को मानते हुए भी अपनी एक नई राह बनाएंगे। उनकी शैली इतनी अनूठी थी कि अक्सर लोग उसे ‘जादुई यथार्थवाद’ के भारतीय संस्करण के रूप में देखते थे। उन्होंने बड़े-बड़े शब्दों या क्लिष्ट भाषा का सहारा लिए बिना बहुत गहरी बातें कहने की कला विकसित की थी। उनके लिखने का तरीका ऐसा था जैसे कोई बच्चा पहली बार दुनिया की चीजों को देख रहा हो और उसके कौतूहल को शब्दों में पिरो रहा हो। उनके उपन्यासों ने तो हिंदी गद्य की दिशा ही बदल दी। ‘नौकर की कमीज’ उनका वह कालजयी उपन्यास है जिस पर प्रसिद्ध फिल्मकार मणि कौल ने फिल्म भी बनाई। इस उपन्यास में उन्होंने निम्न-मध्यम वर्ग की विडंबनाओं और एक बाबू के जीवन के संघर्ष को जिस मानवीय संवेदना के साथ उकेरा, वह अतुलनीय है। इसके बाद ‘खिलेगा तो देखेंगे’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ जैसे उपन्यासों ने उन्हें विश्व स्तर पर ख्याति दिलाई। ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ उपन्यास के लिए उन्हें 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह उपन्यास एक छोटे से कस्बे के जीवन और वहां की छोटी-छोटी खुशियों और सपनों का एक अद्भुत दस्तावेज है। उनकी कविताओं की बात करें तो ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर विचार की तरह’, ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’ और ‘अतिरिक्त नहीं’ जैसे संग्रहों ने कविता प्रेमियों के दिल में खास जगह बनाई। उनकी कविताओं में पेड़, चिड़िया, हवा और धूप ऐसे पात्र बनकर आते थे जैसे वे हमारे परिवार का हिस्सा हों। वे केवल बड़ों के लिए ही नहीं, बल्कि बच्चों के लिए भी उतना ही सुंदर लिखते थे। ‘घोड़े का सातवां पैर’ और ‘प्यारे पीसी’ जैसी उनकी बाल रचनाएँ उनकी संवेदनशीलता का प्रमाण हैं। विनोद कुमार शुक्ला को उनके जीवनकाल में कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया, जिनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान, शिखर सम्मान, और रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार प्रमुख हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ‘पेन/नबोकोव अवार्ड’ (PEN/Nabokov Award) से सम्मानित किया गया, जो किसी भी भारतीय लेखक के लिए बहुत गौरव की बात है। वे हमेशा छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक साधारण जीवन जीते रहे और प्रचार-प्रसार की चमक-धमक से दूर रहे। उनका मानना था कि लेखक का असली काम लिखना है और उसके शब्द ही उसकी पहचान होने चाहिए। उनके निधन से हिंदी साहित्य का एक ऐसा कोना सूना हो गया है जहाँ से संवेदना की ताजी हवा आती थी। उन्होंने हमें सिखाया कि कैसे बहुत ही सरल हिंदी में बहुत ही गंभीर दर्शन की बात कही जा सकती है। उनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाती रहेंगी कि जब तक दुनिया में प्रेम, दया और मासूमियत बची है, तब तक साहित्य भी जीवित रहेगा। विनोद कुमार शुक्ला भले ही शरीर से चले गए हों, लेकिन अपनी ‘खिड़की’ और अपनी ‘कमीज’ के माध्यम से वे पाठकों की स्मृतियों में हमेशा जीवंत रहेंगे। उनका जाना एक पूरे युग का अंत है, लेकिन उनका शब्द-संसार अमर है।

  • Related Posts

    साथ-साथ चल सकते हैं आर्थिक विकास और वित्तीय अनुशासन

    Spread the love

    Spread the love  आशीष कुमार चौहान (एनएसई  प्रबंध निदेशक एवं सीईओ)                 (नया अध्याय, देहरादून)   भारत का बजट 2026-27 साथ-साथ चल सकते…

    स्मृतियों की राह में कविता.

    Spread the love

    Spread the love  राजकुमार कुम्भज जवाहरमार्ग, इन्दौर               (नया अध्याय, देहरादून) _____________________ स्मृतियों की राह में कविता. _____________________ कविता नहीं है राख का ढ़ेर …

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    साथ-साथ चल सकते हैं आर्थिक विकास और वित्तीय अनुशासन

    • By User
    • February 5, 2026
    • 2 views
    साथ-साथ चल सकते हैं आर्थिक विकास और वित्तीय अनुशासन

    स्मृतियों की राह में कविता.

    • By User
    • February 5, 2026
    • 10 views
    स्मृतियों की राह में कविता.

    आशाओं की छतरी

    • By User
    • February 5, 2026
    • 6 views
    आशाओं की छतरी

    थोड़ा सा इश्क में

    • By User
    • February 5, 2026
    • 6 views
    थोड़ा सा इश्क में

    वासंतिक छवि(दोहे)

    • By User
    • February 5, 2026
    • 12 views
    वासंतिक छवि(दोहे)

    अंजाम-ए- गुलिस्ताँ क्या होगा ?

    • By User
    • February 5, 2026
    • 5 views
    अंजाम-ए- गुलिस्ताँ क्या होगा ?