सुश्री सरोज कंसारी
मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत
कवयित्री, लेखिका एवं अध्यापिका
समाज-सेविका, नवापारा-राजिम
रायपुर, छत्तीसगढ़।
(नया अध्याय, देहरादून)
“निर्भीकता के साथ लड़ना होगा, बड़ा कदम उठाने का साहस करो।” — सुश्री सरोज कंसारी।
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आपकी सफलता दूसरों के कठिन परिश्रम की नींव पर टिकी होती है, इसलिए किसी की मेहनत का उचित मूल्य न देना तथा अधिक कार्य लेना नैतिक रूप से गलत होता है। पद और प्रतिष्ठा से ऊपर उठकर, मालिक और कर्मचारी के बीच ‘इंसानियत’ का रिश्ता होना चाहिए। याद रखें, हर इंसान अपने आत्मसम्मान का स्वामी है; किसी की मजबूरी का लाभ उठाना मनुष्यता नहीं। इस धरती पर कोई छोटा-बड़ा या अमीर-गरीब नहीं, हम सब एक-दूसरे के पूरक और सहयोगी हैं। दर्द देने वाली इस दुनिया में यदि आप किसी की पीड़ा की दवा और खुशियों का कारण बन सकें, तो यही जीवन की सबसे बड़ी खूबसूरती व सौभाग्य है। उनका जीवन जो अपने कर्म व्यवहार से किसी के दुख तकलीफ़ को कम करने का काम कर लेते है वरना आज स्वार्थ पूर्ण जीवन जीने में सभी लगे हैं किसी को मतलब नही ये सोचने और देखने का की किस कठिनाई से गुजर कर आप जी रहे है भले लोग कम ही हैं बस सोच का अंतर हैं अगर मान लिए तो हर व्यक्ति अपनी जगह राजा हैं अपने जीवन का वो खुद मालिक है लेकिन कभी-कभी हम जो नही चाहते वो भी सहते और करते है क्योंकि जीवन निर्वहन के लिए रोटी कपड़ा मकान शिक्षा अन्य आवश्यकताओं के लिए हम निर्भर हो जाते है मेहनत मजदूरी करने के लिए कोई शान से बैठकर सिर्फ रुपए गिनते है तो कोई सुबह से लेकर रात तक सिर्फ लगातार कठिन परिश्रम करते है डरे सहमे कोई गलती न हो जाए यही सोचकर रहते गुलामी पूर्ण जीवन जीते है। सब किस्मत का खेल हैं जैसी परिस्थिति होती है वैसे ही ढलना पड़ता है लेकिन सभी एक दूसरे के बिना अधूरे हैं इसलिए कभी भी किसी गरीब का मजाक नहीं बनाना चाहिए उनसे दुर्व्यवहार नहीं करना यह मानवता है लेकिन आज हम देखते हैं कि कुछ लोग जिनके पास दौलत और पूंजीपति होते हैं। धन-दौलत, शौहरत से भरपूर हैं। अपने अमीरी पर घमंड करते हैं और अपने सानिध्य में कार्य करने वाले मेहनती, कर्मठ सक्रिय अपने परिवार, समाज और देश के हित सोचने वाले व्यक्तियों का शोषण करते हैं जो कि किसी भी दृष्टि से उचित नहीं। काम के बदले पैसे देते हैं और इस दृष्टि से दोनों बराबर हैं। कोई किसी को सताने का अधिकारी नहीं पर, कुछ लोग अपने पास काम करने वाले लोगों को बेहद परेशान करते हैं। उन्हें मानसिक यातना देते हैं, शारिरिक श्रम वेतन से अधिक लेते हैं उनकी कमजोरी को जान लेते हैं और फायदा उठाते रहते हैं। उनसे दिन-रात मेहनत करवाते हैं और कम वेतन देते हैं। सुबह से लेकर, रात लगभग बारह घंटे काम देते हैं। बदले में देते क्या हैं? दो या तीन सौ प्रतिदिन के हिसाब से जो बहुत कम है इससे किसी गरीब को परिवार चलाने में परेशानी होती है। उनके सपने तो दूर की बात बच्चें की ठीक से परवरिश नहीं हो पाती और वे सदैव दुखी अवस्था में अपना जीवन यापन करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। एक इंसान जिसमें समझ और भावनाएं होती हैं…पर, जब देने की बारी आती है तो निष्ठुर हो जाते हैं…कुछ ऐसे भी होते हैं जो रौब झाड़ने खुद को सही साबित करने के लिए गलत व्यवहार करते हैं गलती होने पर चिल्लाते हैं वेतन काटते है न आने पर लेकिन समय से ज्यादा काम लेते है तब बढ़ाकर नही देते उसे सीजन का नाम देते हैं जरा-जरा सी बात पर एक इंसान के रूप में दूसरे इंसान से इस प्रकार का दुर्व्यवहार उचित नहीं कानून की दृष्टि में भले ही गलत ना हो लेकिन इंसानियत की दृष्टि से घोर अन्याय है वक्त का कोई भरोसा नहीं इंसान है वक्त पलटते देर नहीं लगती इसलिए किसी के साथ भी वो बर्ताव न करें। जिसका दुष्परिणाम भुगतना पड़े गलत करते हैं तो एक बार अपने आत्मा से आवश्यक पूछे कि आप जो कर रहे हैं, क्या वह सही है। उससे आप खुश हैं और यदि हाँ, तो आप इंसान की श्रेणी में नहीं आते हैं। यदि ऐसा करते हुए अफसोस होता है तो जिससे आप गलत किए हैं उनसे माफी मांग लें। और उन्हें इतना वेतन अवश्य दें जिससे उनके परिवार का उचित भरण-पोषण, शिक्षा और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ तो चार पैसे अपने भविष्य के लिए बचा सकेंगे और सम्मानजनक ज़िन्दगी जी सकेंगे। क्योंकि एक व्यक्ति जो किसी के अधीन रहकर, काम करता है उनकी सुनता है और दिन रात उसके पीछे समर्पित रहता है और कई सालों से उनके यहां काम कर रहा होता है और उनके पास भविष्य के लिए, कुछ पूँजी ना बचें तो आपके यहां से छोड़ने के बाद वह इसी प्रकार बेबस और लाचार रहेगा। आप सोचिए! आप इंसान है समझदारी है। आपका भी परिवार है। एक इंसान जब दूसरे इंसान की जगह पर रह रहे हों तो उन्हें उनके वास्तविक स्थिति का ज्ञान होता है कि कैसे एक कम वेतन में अपने चार-पांच बच्चों को पालना, अपनी पत्नी की आवश्यकताओं की पूर्ति करना। बिल भरना और महंगाई के इस समय में, ऐसे ही दीन-हीन अवस्था में रहना! आप रहकर देखें। क्या आप दो ढाई सौ रुपए प्रतिदिन के वेतन में अपने जीवन का निर्वहन कर सकते हैं और नहीं कर सकते हैं तो आपको कोई अधिकार नहीं कि कम वेतन देकर, ज़्यादा काम लेकर किसी को का शोषण करें। सबसे बड़ी मानवता तो यह होती है कि हम अधिक से अधिक किसी को देंगे और इतना दें कि उनसे हमें दुआएँ मिलें… पर, हम आज क्या करते हैं, ईर्ष्या व अपने पद-प्रतिष्ठा दिखाने के नाम पर दूसरों को नीचा दिखाने का प्रयास करते हैं…जो इस प्रकार करते हैं अपने आप को मालिक समझते हैं। वह किसके दम पर बनते हैं, क्या वे अपने व्यवसाय को एकाकी चला सकते हैं? बिना किसी कर्मचारियों के आप अपने व्यवसाय को नहीं आगे बढ़ा सकेंगे…और न ही फायदा होगा और न ही अपने परिवार को चला सकते हैं। इसलिए किसी के साथ सबसे पहले ऊँची आवाज़ में बात करना और उन्हें गाली देना उनके साथ मारपीट करना बंद करो। यदि गलती हो जाएतो इंसानियत का परिचय दें। उन्हें माफ कर दें। उन्हें समझ ने का प्रयास कीजिये। प्रेम की भी एक भाषा होती है, हर समय नफरत उगलना तो इंसान की परिभाषा नहीं हो सकती है…मानवीय गुण दया, क्षमा और करुणा, स्नेह रखें। अपने मन में केवल दिखावे के लिए कुछ न करें। व्यवहार में सादगी भर लें। सादगी में ही जीवन की सुन्दरता है। क्योंकि आज एक व्यक्ति जो दूसरे के पास काम करते हैं, दुखी होते हैं, और एक मालिक जो अमीर हैं। किसी बात की कमी नहीं होतीं। जो आपके साथ काम करते हैं, उनकी वजह से अपने व्यवसाय को व्यवस्थित चला पा रहे हैं। बचा पा रहे हैं तो आप आप अपने साथ काम करने वाले को तुक्ष ना समझे उनके मनोबल बढ़ाएं। उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलें। प्रेम सहनुभूति से देखें, सम्मान दें। उनकी भावनाओं को समझें। उन्हें भी आगे बढ़ने का अवसर दें। उनका भी सहयोग करें। याद रखें ! जब हम किसी के दुख-तकलीफ को समझते हैं तो हममें मानवीय गुण पनपते हैं, और जब हम किसी की भावनाओं को समझकर उसे गरीबी अवस्था से उठाने का प्रयास करते हैं तो इंसान की श्रेणी में हम उच्च स्थान प्राप्त करते हैं और हमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। सहृदय हमारे लिए मंगल कामनाएं करते हैं। याद रखिए! किसी के द्वारा दिल से की गई प्रार्थनाएँ आगे चलकर लाभदायक होतीं हैं। उसका परिणाम हमें अच्छे रूप में ही कभी ना कभी मिलता है यह मत सोचिए कि आप जो कर्म व्यवहार कर रहे हैं उसका जीवन पर कोई असर नहीं होगा मनुष्य के मन वचन कर्म और सोच का प्रभाव उसके जीवन पर अवश्य पड़ता है इसलिए दुआ जितना हो सके लीजिए और अगर किसी कारणवश आप किसी के दिल को दुखाते हैं उन्हें दिन-रात मेहनत करने के बाद उनके शरीर को पूरे थकान देने के बाद भी उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करते है जिसकी वजह से अगर वह रात भर सो नहीं पाएगा बेचैन रहेगा उन्हें घबराहट होगी तो उसका परिणाम आपको अवश्य मिलेगा किसी का दिल दुखाने की सजा भुगतना पड़ता है। ज़िन्दगी में सब करें… पर, किसी की आह! न लें। किसी की उम्मीद को कुचल कर उसके मेहनत का कम वेतन देकर उस पर दबाव डालकर अपना प्रभाव मत बनाइए जिंदगी है कोई भरोसा नहीं कल क्या हो? अगर हम किसी का भला करते हैं किसी गरीब की मजबूरी को समझते हैं जिससे चेहरे पर प्रसन्नता आती है और हमारी वजह से यदि उसकी जिंदगी में खुशहाली आती है तो इससे बड़ी दौलत और कोई हो नहीं सकती। हम अक्सर देखते हैं कि जाने-अनजाने में कभी अचानक दुर्घटना से जान बचा लेते हैं तो कहते हैं कि यह ईश्वर की दया है सच में, यह वही इंसान है जिसे आपने खुश होने की वजह दी… जिनके हित की रक्षा किए थे. उसकी दुआएँ आपके लिए दवा बन गई इसलिए कभी भी किसी को रोने के लिए विवश न कीजिए। आंसू की हर बूंद कुछ कहती है…आज आप अमीर हैं, कल क्या होगा… ये नहीं जानते हैं.. क्या पता समय के चक्र में जिसे आप नौकर समझकर कमजोर समझ काम लेते हैं उसे शारीरिक, मानसिक रूप से सताते हैं…करते हैं और उसे दुत्कार कर कभी नौकरी से निकाल देते हैं, किसी गलती पर अगर वह ठान ले दृढ़ इच्छा शक्ति से मेहनत कर आगे बढ़ जाए, और कभी किसी घाटे में आपका व्यवसाय नष्ट हो जाए, तो हानि हो और आपको उसके पास जाना पड़े जाना वक्त है कुछ नहीं कह सकते इसलिए अमीरी में कभी भी अपने आप को मलिक मत बताइए। बस इंसान बने रहने में ही फायदा है कभी नुकसान नही होता। खाली समय में जब हम परिवार समाज पर और राष्ट्र के बारे में चिंतन करते हैं और लोगों की दुख तकलीफ को दिन भर देखे रहते हैं तो किसी न किसी बात का असर हमारे मस्तिष्क का पर होता है। भावनाओं के प्रवाह में जब बहते हैं और दूसरों को महसूस करने की जब हममें क्षमता होती है तो हम देखते हैं कि कैसे धूप में पसीना बहाते जब सब कूलर पंखे ए.सी. में आराम करतें हैं तब ये श्रमिक नवनिर्माण का काम करते हैं और इन्हें अपनी मेहनत का उचित परिणाम नहीं मिलता तो आंखों में आंसू लेकर अपने भाग्य पर समझौता कर लेते हैं आज हम देखते हैं कि अपने आप को मलिक कहने वाले लोग अपने अधीन काम करने वाले लोगों को नौकर समझते हैं नौकर का अर्थ होता है झुककर रहना दबकर रहना और काम करना लेकिन आज समय बदला है वह अपनी मेहनत से पसीना बहाते हैं तब आप जाकर कोई अपने व्यवसाय में लाभ कमा पाते है लेकिन अगर सभी लोग संगठित हो जाए और दुर्व्यवहार सहना काम बंद कर दे तो क्या अकेले कर पाएंगे शायद नहीं इसलिए कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। वह भी आपके समान एक इंसान है इंसानियत के नाते उसे नौकर मत समझिए। ध्यान से देखो तो नौकर शब्द को बिल्कुल हटा देना चाहिए और किसी को मालिक भी नहीं कहना चाहिए। हम सभी का मालिक एक ही है उस विधाता के जिसके अधीन हम रहते हैं। उनके नियम के आगे किसी की नहीं चलती है वहीं एक मालिक, सर्वज्ञ है। जो सभी की सहायता करते हैं मुसीबत में हम उनको याद करते हैं मुसीबत में याद करने का अर्थ यही नहीं है कि हम जो मांगे वह देंगे इसका अर्थ है कि हमें हिम्मत मिलती है…मनोबल बढ़ता है। एकाग्र होते हैं, शांत होते हैं, समझौता करते हैं और जो किसी होटल में किराना दुकान में फैंसी स्टोर में किसी लघु कुटीर उद्योग में गृह निर्माण में या कही भी किसी के सानिध्य में काम करते हैं उन्हें मालिक द्वारा किसी प्रकार से प्रताड़ित किया जाता हे तो उनका विरोध होना चाहिए इस प्रकार किसी को सताने की सजा मालिको को दी जानी चाहिए। सभी कार्यरत, मेहनती इंसान में एकता हो। संगठन हो…इस बात पर विचार होऔर नौकर समझकर जो अपने को सेठ मालिक समझते हैं, उनके खिलाफ भी कड़ी कारवाही होनी चाहिए। यह आज के समय में अति आवश्यक है। कहते हैं कि अपने अच्छे दिनों में किसी को सताने से अक्सर हमें भी बुरे दिनों से गुजरना पड़ता है. इसलिए एक ऐसा नियम बनना चाहिए कि किसी को भी नौकर समझकर उस पर, अपना अधिकार दिखाने वालों को किसी गरीब के ऊपर अत्याचार करने वालों को उनके काम के बदले सही वेतन न देने वालों के लिए, एक कठोर नियम बनना चाहिए। किसी के साथ ऐसा बर्ताव हो तो अन्य व्यक्ति हैं सभी संगठित होकर उसका विरोध करें किसी को अधिकार नहीं किसी को प्रताड़ित करने का जब हम ऐसे करेंगे तो गरीबों के साथ-साथ न्याय होगा… सुबह से लेकर रात तक काम करने वाले मेहनती लोगों की वजह से मालिक को मुनाफा होता है। पर, काम करने वालों को देने में कंजूसी करते हैं। हर तरह से काम करने वाले कर्मचारियों को इतना वेतन दें जिससे उन्हे भी अफसोस न करना पड़े…अपने अधीन काम करने वालों को कमजोर न समझें… उन्हें आत्मीयता से रखें। और मान-सम्मान भी किया करें। उनसे एक इंसान की तरह मिलिए। ह मेहनत करते हैं इसलिए वे नौकर नहीं इस शब्द का प्रयोग करना बंद करें. वह आपके भाई बंधु हैं इस संसार में है वसुदेव कुटुंबकम के भाव को याद करें और भारतीय संस्कृति में उच्च नीच का कोई भेदभाव नहीं। इंसानियत से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। हमें यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति को पीड़ित करना अधर्म है। भले ही कानून की किताबों में गरीब को कम वेतन देने या मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए स्पष्ट सजा का प्रावधान सीमित हो, परंतु नैतिकता का तकाजा है कि हर नियोक्ता (मालिक) अपने कर्मचारियों के साथ मित्रवत व्यवहार करे। मीठी वाणी का प्रयोग करें और किसी को भी अपमानित न करें। मालिक और नौकर की संकीर्ण धारणा को त्याग कर आपसी सामंजस्य के साथ चलें। कोई निर्धन है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह दुत्कार का पात्र है; बड़े से बड़े कार्य मधुर वाणी और आपसी समझ से सिद्ध किए जा सकते हैं। यह सुनिश्चित करना आपका दायित्व है कि आपकी वजह से कोई कड़ी मेहनत के बाद भी भूखा न सोए या अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए न तरसे। लाभ-हानि जीवन के चक्र हैं, लेकिन किसी को उसकी लाचारी का बोध कराना मानवीय अपराध है। मालिक होने से पहले आप एक इंसान हैं, इसे कभी न भूलें। सहज, सरल बनें और सद्व्यवहार अपनाएं। धोखे, षडयंत्र, चोरी या किसी गरीब का शोषण कर धन एकत्रित करना अत्यंत दुखद है। यदि आप किसी की पीड़ा नहीं समझ सकते और उसे स्वयं से छोटा समझकर दुर्व्यवहार करते हैं, तो आपमें इंसानियत का अभाव है। याद रखें, हर कर्म का फल मिलता है। दूसरों को देने के लिए यदि आपके पास कुछ है, तो वह केवल प्रेम और सम्मान होना चाहिए, कड़वाहट नहीं। उन्हें ‘नौकर’ कहना बंद करें, क्योंकि वे अपनी मेहनत की कमाई खाते हैं व अपनी सेवाओं से आपको आगे बढ़ने में मदद करते हैं। स्वयं भी खुश रहें और उन्हें भी सम्मान के साथ जीने दें। सबका हो कल्याण। मानवता सर्वोपरि। साधुवाद!
नारी शक्ति, अस्मिता की एक सशक्त प्रतीक







