तिरुमला के श्री वेंकटेश्वर स्वामी के मंदिर में वैकुण्ठ द्वार दर्शन और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था: एक विश्लेषण।

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डॉ.यल.कोमुरा रेड्डी

असिस्टेंट प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष

हिन्दी विभाग

एस.आर.आर.शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय

करीम नगर, तेलंगाना।

 

  (नया अध्याय, देहरादून)

 

तिरुमला के श्री वेंकटेश्वर स्वामी के मंदिर में वैकुण्ठ द्वार दर्शन और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था: एक विश्लेषण।

 

तिरुमला की सुरम्य पहाड़ियों पर स्थित श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर को न केवल भारत का सबसे धनी मंदिर माना जाता है, बल्कि इसे ‘कलियुग वैकुण्ठ’ के रूप में भी जाना जाता है। मान्यता है कि भगवान विष्णु स्वयं मानव जाति के उद्धार के लिए यहाँ प्रकट हुए हैं। हिंदू धर्म में वैकुण्ठ एकादशी का दिन आध्यात्मिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण अवसरों में से एक है, और इस दौरान होने वाला ‘वैकुण्ठ द्वार दर्शन’ धर्म, संस्कृति, वास्तुकला और आधुनिक प्रशासनिक प्रबंधन का एक अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है।

वैकुण्ठ एकादशी और वैकुण्ठ द्वार की पौराणिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

वैकुण्ठ एकादशी, जिसे मुक्कोटी एकादशी भी कहा जाता है, मार्गशीर्ष माह के दौरान शुक्ल पक्ष के 11वें दिन मनाई जाती है। वैष्णव परंपरा के अनुसार, यह वह क्षण है जब वैकुण्ठ के द्वार सभी जीवात्माओं के लिए खुलते हैं। इसकी जड़ें प्राचीन पुराणों में गहरी हैं। पद्म पुराण और विष्णु पुराण में इस दिन की महिमा का वर्णन विभिन्न आख्यानों के माध्यम से किया गया है।

सबसे प्रचलित कथा मधु और कैटभ नामक असुरों से जुड़ी है। मान्यताओं के अनुसार, इन असुरों ने ब्रह्मा जी से वेदों की चोरी की थी, जिसके पश्चात भगवान विष्णु ने उनका वध कर वेदों को पुनः स्थापित किया। मरते समय इन असुरों ने पश्चाताप करते हुए भगवान से प्रार्थना की कि वे वैकुण्ठ के उत्तर द्वार पर उनके रक्षक के रूप में स्थित रहें और यह वरदान माँगा कि जो भी भक्त इस दिन उस द्वार से भगवान का दर्शन करेगा, उसे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिले। भगवान ने इस प्रार्थना को स्वीकार किया, जिससे उत्तर द्वार दर्शन ‘मोक्ष का मार्ग’ बन गया। यह कथा असुरत्व के समर्पण और मोक्ष की प्राप्ति का एक महान आध्यात्मिक संदेश देती है।

एक अन्य महत्वपूर्ण कथा मुर नामक असुर और देवी एकादशी की उत्पत्ति से संबंधित है। जब भगवान विष्णु मुर के साथ युद्ध करते हुए बदरिकाश्रम के निकट एक गुफा में विश्राम कर रहे थे, तब उनके शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई जिसने मुर का वध किया। भगवान ने इसे ‘एकादशी’ का नाम दिया और घोषित किया कि इस दिन व्रत रखने वाले और उत्तर द्वार से दर्शन करने वाले भक्त सभी पापों से मुक्त होंगे। यह प्रसंग आत्म-अनुशासन और व्रत के माध्यम से पाप मुक्ति के मार्ग को रेखांकित करता है। इसके अतिरिक्त, ब्रह्म पुराण में स्वामी पुष्करिणी के महत्व और तीर्थ स्नान से मिलने वाली पवित्रता का वर्णन है, जबकि वैष्णव परंपरा में यह दिन महान संत नाम्मालवार को प्राप्त हुए मोक्ष और भक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक है।

आध्यात्मिक और योगिक व्याख्या: मुक्कोटी और कुंडलिनी

‘मुक्कोटी’ का अर्थ तीन करोड़ है, जो उन देवताओं की संख्या को दर्शाता है जो इस दिन दर्शन के लिए एकत्रित होते हैं। हालाँकि, योगिक विज्ञान में इसका गहरा अर्थ है। शरीर में सिर के शीर्ष भाग (सहस्रार चक्र) को उत्तर दिशा माना जाता है। उत्तर द्वार दर्शन का आध्यात्मिक तात्पर्य कुंडलिनी ऊर्जा का इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों के माध्यम से ऊपर की ओर गमन करना और सहस्रार चक्र तक पहुँचना है। इस प्रकार, भौतिक द्वार से गुजरना आंतरिक चेतना के द्वार खोलने का प्रतीक है।

तिरुमला मंदिर की वास्तुशिल्प संरचना और उत्तर द्वार का विन्यास

तिरुमला का मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का शिखर है, जिसका विस्तार चोल, पांड्य और विजयनगर साम्राज्यों द्वारा किया गया। सामान्य दिनों में श्रद्धालु ‘बंगारू वकिली’ (स्वर्ण द्वार) से दर्शन करते हैं, लेकिन ‘वैकुण्ठ द्वार’ या ‘उत्तर द्वार’ एक विशेष आंतरिक गलियारा है जो गर्भगृह (आनंद निलयम) को घेरे हुए है। यह द्वार वर्ष के 355 दिन बंद रहता है और केवल धनुर्मास की वैकुण्ठ एकादशी पर ही खुलता है।

वास्तुशिल्प की दृष्टि से यह गलियारा ‘विमान प्रदक्षिणा’ पथ के भीतर स्थित है। जब भक्त इस द्वार से प्रवेश करते हैं, तो वे भगवान की मूर्ति के पार्श्व से गुजरते हुए प्रदक्षिणा पथ पर जाते हैं। वैकुण्ठ एकादशी के दौरान इसे अद्भुत विद्युत व्यवस्था और दुर्लभ फूलों से सजाया जाता है, जिससे भक्तों को अलौकिक जगत का अनुभव होता है। मंदिर के अन्य घटकों में 50 फीट ऊँचा ‘महा द्वारम’ और मुख्य गर्भगृह ‘आनंद निलयम’ शामिल हैं, जिसके स्वर्ण शिखर के नीचे भगवान की स्वयंभू प्रतिमा विराजमान है।

श्रद्धालुओं का विश्वास: मनोवैज्ञानिक और सामाजिक आयाम

तिरुमला में वैकुण्ठ द्वार दर्शन करोड़ों लोगों की आशाओं का सामूहिक प्रदर्शन है। भक्त इसके लिए किसी भी भौतिक बाधा को पार करने के लिए तत्पर रहते हैं। इसकी तैयारी कई सप्ताह पूर्व ही शुरू हो जाती है। ‘गोविंदा माला’ धारण करने वाले श्रद्धालु 41 दिनों तक कठोर ब्रह्मचर्य और नंगे पाँव चलने जैसे नियमों का पालन करते हैं। कई भक्त सैकड़ों किलोमीटर की ‘पदयात्रा’ कर पहाड़ियों पर पहुँचते हैं।

दर्शन का मनोवैज्ञानिक प्रभाव अत्यंत गहरा होता है। उत्तर द्वार के गलियारे में प्रवेश करते ही भक्तों को एक ‘शिखर अनुभव’ प्राप्त होता है। फूलों की सुगंध, मंत्रोच्चार और भगवान की दिव्य प्रतिमा का क्षणिक दर्शन भक्तों को सांसारिक दुखों से ऊपर उठा देता है। यह अनुभव उनके इस विश्वास को पुख्ता करता है कि उनके समस्त पाप नष्ट हो गए हैं।

क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव एवं भविष्य की रूपरेखा

वैकुण्ठ द्वार दर्शन का प्रभाव अब वैश्विक हो चुका है। दक्षिण भारतीय राज्यों के अलावा ओडिशा, महाराष्ट्र और विदेशों से भी भक्त बड़ी संख्या में आते हैं। यह आयोजन ‘विविधता में एकता’ का जीवंत उदाहरण है, जहाँ विभिन्न संस्कृतियों के लोग एक ही कतार में ‘गोविंदा’ के जयकारे लगाते हैं।

भविष्य में तिरुमला का अनुभव और अधिक तकनीकी होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा एनालिटिक्स के माध्यम से भीड़ नियंत्रण और व्हाट्सएप बॉट के जरिए बुकिंग को और सरल बनाया जाएगा। इन तकनीकी सुधारों के बावजूद मंदिर की सात्विकता और धार्मिक मर्यादा बनाए रखना की प्राथमिकता रहेगी।

निष्कर्ष

तिरुमला का वैकुण्ठ द्वार दर्शन एक ऐसा अलौकिक अनुभव है जो भक्त को भौतिक सीमाओं से मुक्त कर परमात्मा के सानिध्य में ले जाता है। प्राचीन कथाओं से लेकर आधुनिक ‘ई-डिप’ प्रणाली तक, यह उत्सव परंपरा और आधुनिकता के बीच एक सुंदर संतुलन है। श्रद्धालुओं का यह दृढ़ विश्वास कि इस द्वार से गुजरना सात जन्मों के पापों को धो देता है, उन्हें जीवन की चुनौतियों से लड़ने की शक्ति देता है। वास्तव में, यह मानवीय चेतना और ईश्वर के प्रति अटूट समर्पण का एक वैश्विक महोत्सव है।

 

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