डॉ.यल.कोमुरा रेड्डी
सहायक आचार्य एवं अध्यक्ष
हिन्दी विभाग
एस.आर.आर.कला एवं विज्ञान महाविद्यालय
करीम नगर, तेलंगाना
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
युगद्रष्टा विवेकानंद: शिकागो की गर्जना से विकसित भारत के संकल्प तक।
डॉ.यल.कोमुरा रेड्डी
एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सूर्योदय
उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध भारतीय इतिहास का वह संक्रांति काल था, जब भारत अपनी चेतना खो रहा था। एक ओर विदेशी दासता की बेड़ियाँ थीं, तो दूसरी ओर समाज अंधविश्वास और आत्मग्लानि के अंधकार में डूबा था। ऐसे समय में स्वामी विवेकानंद का प्राकट्य केवल एक संन्यासी का उदय नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रीयता और आध्यात्मिक गौरव का पुनर्जन्म था। 11 सितंबर 1893 को शिकागो के मंच से दी गई उनकी वह ऐतिहासिक हुंकार आज भी भारतीय युवाओं के रगों में साहस का संचार करती है। उनके इसी प्रभाव को देखते हुए भारत सरकार ने 1984 में उनकी जयंती को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ घोषित किया, जो आज के ‘विकसित भारत’ के संकल्प का आधार स्तंभ है।
शिकागो यात्रा: संघर्ष, संकल्प और सिद्धि
स्वामी विवेकानंद की शिकागो यात्रा कोई सुगम मार्ग नहीं था। अपने गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस के निर्वाण के बाद, उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण एक साधारण परिव्राजक के रूप में किया। उन्होंने कन्याकुमारी की उस अंतिम शिला पर बैठकर भारत के अतीत, वर्तमान और भविष्य का ध्यान किया। उनकी इस यात्रा का उद्देश्य केवल धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि भारत की दरिद्रता को दूर करने के लिए पश्चिमी विज्ञान और भारतीय आध्यात्म के मेल का मार्ग खोजना था।
कठिनाइयों का सामना: जब वे शिकागो पहुँचे, तो उनके पास न तो कोई आधिकारिक निमंत्रण था और न ही पर्याप्त संसाधन। हाड़ कँपा देने वाली ठंड में उन्होंने सड़कों पर रातें बिताईं। अंततः, हार्वर्ड के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। प्रोफेसर राइट ने उनके बारे में कहा था, “इनका परिचय पूछना सूर्य से उसके चमकने का अधिकार पूछने जैसा है।”
शिकागो संबोधन: विश्व बंधुत्व का नया अध्याय 11 सितंबर सन् 1893ई. को जब स्वामी जी ने अपना भाषण “अमेरिका की बहनों और भाइयों” के संबोधन से शुरू किया, तो शिकागो का आर्ट इंस्टीट्यूट तालियों की गड़गड़ाहट से कांप उठा। यह तालियाँ केवल एक अभिवादन के लिए नहीं थीं, बल्कि उस सार्वभौमिक प्रेम के लिए थीं जिसे विवेकानंद ने अपने शब्दों में पिरोया था। उन्होंने दुनिया को सिखाया कि हिंदू धर्म केवल सहिष्णुता नहीं सिखाता, बल्कि सभी धर्मों को सत्य मानकर स्वीकार करना सिखाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस तरह सभी नदियाँ अंत में समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही सभी धर्मों का मार्ग एक ही ईश्वर की ओर जाता है।
राष्ट्रीय युवा दिवस: 1984 की घोषणा और राजीव गांधी का दृष्टिकोण
स्वामी विवेकानंद का जीवन युवाओं के लिए ऊर्जा का अक्षय पात्र है। स्वतंत्रता के बाद, राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में युवाओं को जोड़ने की आवश्यकता महसूस की गई।
• ऐतिहासिक निर्णय: 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में भारत सरकार ने 12 जनवरी को ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ घोषित किया। सरकार का मानना था कि स्वामी जी का दर्शन आधुनिक भारत के युवाओं को भटकाव से बचाकर राष्ट्र निर्माण की ओर मोड़ सकता है।
• उद्देश्य: 1985 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष’ घोषित किया गया था। भारत ने विवेकानंद के विचारों को केंद्र में रखकर युवा सशक्तिकरण की नई नींव रखी।
• राष्ट्रीय युवा महोत्सव: हर साल 12 से 19 जनवरी तक ‘राष्ट्रीय युवा सप्ताह’ मनाया जाता है, जो ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को चरितार्थ करता है।
आधुनिक शिक्षा और ‘मनुष्य निर्माण’
स्वामी विवेकानंद ने कहा था, “शिक्षा मनुष्य में पहले से मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।” उनके अनुसार, केवल जानकारी का ढेर शिक्षा नहीं है, बल्कि वह चरित्र निर्माण का साधन होनी चाहिए।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 और विवेकानंद: भारत की वर्तमान शिक्षा नीति स्वामी जी के विजन को ही धरातल पर उतारने का प्रयास है:
1. समग्र विकास: विवेकानंद ने शरीर, मन और आत्मा के एकीकृत विकास पर जोर दिया था, जो आज के ‘होल्स्टिक डेवलपमेंट’ मॉडल का आधार है।
2. आत्मनिर्भरता: उन्होंने ऐसी शिक्षा की वकालत की जो व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा करे। आज का ‘स्किल इंडिया’ अभियान इसी दर्शन से प्रेरित है।
3. मातृभाषा का सम्मान: स्वामी जी का मानना था कि विचार अपनी भाषा में ही गहराई तक पहुँचते हैं, जिसे NEP 2020 ने प्राथमिकता दी है।
व्यावहारिक वेदांत: सामाजिक न्याय का पथ
विवेकानंद ने वेदांत को मठों से निकालकर खेतों, कारखानों और सामान्य जीवन तक पहुँचाया। उन्होंने इसे ‘व्यावहारिक वेदांत’कहा।
• दरिद्र नारायण की सेवा: उनके लिए भूखे को धर्म सिखाना पाप था। उन्होंने ‘नर सेवा ही नारायण सेवा’ का मंत्र दिया।
• समानता: यदि ईश्वर हर आत्मा में है, तो जाति या वर्ण के आधार पर भेदभाव कैसे संभव है? उनके विचार आज के समावेशी समाज और सामाजिक न्याय के आंदोलनों के लिए मशाल हैं।
नेतृत्व और मानसिक स्वास्थ्य: 21 वीं सदी की औषधि
आज के प्रतिस्पर्धात्मक युग में, जहाँ युवा तनाव और अवसाद से जूझ रहे हैं, विवेकानंद के सूत्र जीवनदायिनी सिद्ध होते हैं।
1. मन की एकाग्रता: स्वामी जी ने कहा था कि ज्ञान प्राप्त करने का एकमात्र तरीका ‘एकाग्रता’ है। उन्होंने ‘राजयोग’ के माध्यम से मन को नियंत्रित करने की विधि सिखाई, जिसे आज विश्व ‘माइंडफुलनेस’ के रूप में अपना रहा है।
2. आंतरिक शक्ति का जागरण: उनका प्रसिद्ध मंत्र—“उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए”-आज भी स्टार्टअप के दौर में युवा उद्यमियों का सबसे बड़ा मोटिवेशन है।
3. सेवक नेतृत्व: प्रबंधन की दुनिया में आज ‘सेवक नेतृत्व’ की बात होती है, जिसे विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना के समय ही प्रतिपादित कर दिया था। उनके लिए नेतृत्व का अर्थ अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी और सेवा था।
विद्वानों का दृष्टिकोण: आध्यात्मिक राष्ट्रवाद
इतिहासकार बिपन चंद्र और अमिय पी. सेन जैसे विद्वानों ने विवेकानंद को ‘आध्यात्मिक राष्ट्रवाद’ का प्रणेता माना है। उनका राष्ट्रवाद किसी देश की भौगोलिक सीमा तक सीमित नहीं था, बल्कि वह मानवतावाद पर आधारित था। उन्होंने भारतीयों के मन से हीन भावना को निकाला और उन्हें यह गर्व करने का अवसर दिया कि “मैं भारतीय हूँ और हर भारतीय मेरा भाई है।”
विजन 2047: विकसित भारत और विवेकानंद
भारत जब अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष (सन् 2047ई.) की ओर बढ़ रहा है, तो विवेकानंद की शिक्षाएं और भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं।
• विज्ञान और आध्यात्म का संगम: स्वामी जी चाहते थे कि भारत पश्चिम की विज्ञान की गति और पूर्व की आध्यात्म की शांति को मिला ले। आज का डिजिटल और वैज्ञानिक भारत इसी मार्ग पर अग्रसर है।
• विश्व गुरु की भूमिका: शिकागो ने भारत को जो वैश्विक पहचान दी थी, आज भारत जलवायु परिवर्तन, शांति और वैश्विक अर्थव्यवस्था में नेतृत्व करके उसी ‘विश्व गुरु’ की छवि को पुनः प्राप्त कर रहा है।
निष्कर्ष: एक शाश्वत मशाल
स्वामी विवेकानंद केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि एक जीवंत विचार हैं। शिकागो के मंच से जो शंखनाद हुआ था, उसकी प्रतिध्वनि आज भी हर उस युवा के मन में सुनाई देती है जो कुछ बड़ा करने का साहस रखता है। राष्ट्रीय युवा दिवस हमें याद दिलाता है कि हमारे भीतर असीम शक्ति है।विवेकानंद का जीवन हमें सिखाता है कि निस्वार्थ सेवा ही जीवन है और स्वार्थ ही मृत्यु है। आने वाली सदियों तक वे आधुनिक विश्व के निर्माता और भारतीय संस्कृति के सबसे प्रखर राजदूत के रूप में युवाओं का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे। उनका जीवन संदेश आज के युवा के लिए स्पष्ट है—आत्मविश्वास रखो, चरित्रवान बनो और राष्ट्र की सेवा में समर्पित हो जाओ।







