संजय सोंधी
संयुक्त सचिव
भूमि और भवन विभाग
दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, देहरादून)
मकर संक्रांति और षटतिला एकादशी का पावन मिलन: आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक।
भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति में खगोलीय घटनाओं को गहरा आध्यात्मिक अर्थ प्रदान करने की एक अनोखी परंपरा रही है। वर्ष 2026 का 14 जनवरी का दिन भारतीय जनमानस के लिए विशेष रूप से पुण्यदायी और महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इस दिन सूर्य देव उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करेंगे और साथ ही माघ मास की कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का दुर्लभ शुभ संयोग भी बनेगा। यह अद्भुत मिलन लगभग 23 वर्षों के बाद घटित हो रहा है, जिसे आध्यात्मिक साधकों और गृहस्थों दोनों के लिए मोक्ष के द्वार खोलने वाला एक शुभ अवसर माना जाता है। मकर संक्रांति प्रकृति के परिवर्तन, सूर्य की जीवंत ऊर्जा और फसल कटाई के उत्सव का प्रतीक है, वहीं षटतिला एकादशी भगवान विष्णु की परम भक्ति, आत्म-संयम और तिल के छह विशेष उपयोगों के माध्यम से पापों के नाश का पावन पर्व है। यह संयोग मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने, कर्मठता के साथ-साथ भक्ति के मार्ग पर अग्रसर होने का संदेश देता है।
सांस्कृतिक दृष्टिकोण से मकर संक्रांति भारत की कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था और सभ्यता का एक जीवंत प्रतीक है, जो सर्दी के अंत और नई फसल के आगमन का हर्षोल्लासपूर्ण जश्न मनाती है। यह पर्व सामाजिक सद्भाव, दान की महिमा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की भावना को बढ़ावा देता है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में इसे अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता में निहित एकता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। धार्मिक दृष्टि से सूर्य का उत्तरायण होना देवताओं के दिन का आरंभ माना जाता है, जो मानव जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि प्रदान करता है। षटतिला एकादशी, जिसे माधव तिथि भी कहा जाता है, भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और माघ मास में तिल के विभिन्न रूपों में उपयोग से आरोग्य, सौभाग्य और पाप मुक्ति की प्राप्ति होती है। यह पर्व दान और परोपकार की महत्वपूर्ण अवधारणा पर विशेष जोर देता है, क्योंकि केवल भक्ति ही नहीं बल्कि परहित की भावना भी मोक्ष के मार्ग में अनिवार्य है। इन दोनों पर्वों का यह दुर्लभ संयोग पुण्य फल को कई गुना बढ़ा देता है तथा समाज में सद्भाव, पारस्परिक सहयोग और पर्यावरण संरक्षण का सारगर्भित संदेश देता है।
इन पर्वों की गहराई को समझने के लिए पौराणिक कथाओं का सहारा लेना आवश्यक है। मकर संक्रांति की प्रमुख कथा सूर्य देव और उनके पुत्र शनि देव के जटिल संबंधों पर आधारित है। वैचारिक मतभेदों के कारण अलग हुए पिता-पुत्र के बीच इस दिन सूर्य स्वयं शनि के घर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, जो पुनर्मिलन और अटूट प्रेम का प्रतीक है। एक अन्य कथा के अनुसार इसी दिन माँ गंगा स्वर्ग से उतरकर राजा भगीरथ के पीछे चलते हुए कपिल मुनि के आश्रम से गुजरीं और अंततः गंगासागर में समाहित हुईं, जिससे सगर के साठ हजार पुत्रों को मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसीलिए इस दिन गंगा स्नान और गंगासागर मेले का विशेष महत्व है। महाभारत में भीष्म पितामह ने भी उत्तरायण की प्रतीक्षा करके ही प्राण त्यागे थे, क्योंकि इस काल में शरीर छोड़ना मोक्षदायी माना जाता है। एक कथा भगवान विष्णु द्वारा संकारासुर नामक दैत्य के वध से भी जुड़ी है, जो अंततः बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।
षटतिला एकादशी की कथा का उल्लेख पद्म पुराण में मिलता है। एक बार नारद मुनि ने श्रीकृष्ण से इस व्रत के फल के बारे में पूछा, तो उन्होंने एक ब्राह्मणी की कहानी सुनाई। वह बहुत तपस्विनी थी किंतु उसने कभी अन्न दान नहीं किया था। वैकुंठ पहुँचने पर उसे एक सुनसान कुटिया तो मिली लेकिन भोजन नहीं। भगवान विष्णु ने उसे बताया कि दान के अभाव में यही उसकी स्थिति है। तब देव कन्याओं से व्रत की विधि सीखकर उसने तिल दान किया, जिससे उसकी कुटिया धन-धान्य से परिपूर्ण हो गई। यह कथा हमें भक्ति के साथ-साथ दान की अनिवार्यता का पाठ पढ़ाती है। एक अन्य कथा में सत्यनिष्ठ राजा हरिश्चंद्र से इस व्रत का संबंध दर्शाया गया है, जो पाप मुक्ति के महत्व को प्रतिपादित करती है।
भारत के विभिन्न भागों में मकर संक्रांति को विविध रूपों में मनाया जाता है, जो विविधता में एकता का सजीव उदाहरण है। पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में अलाव जलाकर, तिल-गुड़ फेंककर, लोक गीत गाकर और नाचकर मनाते हैं। तमिलनाडु में पोंगल चार दिनों का उत्सव है, जिसमें भोगी पर पुरानी वस्तुओं का त्याग, थाई पोंगल पर सूर्य को मीठी खीर चढ़ाना, मट्टू पोंगल पर गायों की पूजा और कानुम पोंगल पर परिवारिक मेल-मिलाप शामिल है। असम में माघ बिहू सामुदायिक भोज, अलाव और पारंपरिक खेलों के साथ मनाया जाता है। गुजरात में उत्तरायण के अवसर पर पतंगबाजी का रंगीन उत्सव आकाश को विभिन्न रंगों से सराबोर कर देता है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भोगी पर अलाव, पेद्दा पंडुग पर भोज और कनुमा पर पशु पूजा का विधान है। कर्नाटक में सुग्गी के रूप में गन्ना और नए अनाज का जश्न मनाया जाता है। बंगाल में पौष संक्रांति पर गंगा स्नान और पीठे जैसी मिठाइयों का प्रसाद चढ़ाया जाता है। उत्तर प्रदेश और बिहार में खिचड़ी बनाकर दान करने की परंपरा के साथ बड़े-बड़े मेले लगते हैं। कश्मीर में शिशुर सेंक्रात के रूप में सूर्य की उत्तरी यात्रा का स्वागत किया जाता है।
वर्ष 2026 में मकर संक्रांति के शुभ मुहूर्त के अनुसार सूर्य का मकर राशि में प्रवेश 14 जनवरी को दोपहर 3:13 बजे होगा। पुण्य काल इसी दिन सूर्यास्त यानी लगभग 5:45 बजे तक रहेगा, जिसकी कुल अवधि लगभग दो घंटे बत्तीस मिनट होगी। महा पुण्य काल दोपहर 3:13 बजे से शाम 4:58 बजे तक का समय विशेष फलदायी माना गया है। इस अवधि में स्नान, दान और पूजा जैसे कर्म अत्यंत शुभ फल प्रदान करते हैं, जिसमें तिल, गुड़, ऊनी वस्त्र और नए अनाज का दान अक्षय पुण्य का कारण बनता है। षटतिला एकादशी की पूजा विधि अत्यंत सूक्ष्म और पवित्र है। दशमी तिथि को सूर्यास्त के बाद भोजन न करके भगवान विष्णु का ध्यान करना चाहिए। एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 05:20 से 06:20 तक)में तिल मिश्रित गंगाजल से स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करके विष्णु जी के समक्ष दीप जलाकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए। षोडशोपचार पूजा के दौरान तिल से बने नैवेद्य, लड्डू और तिल मिश्रित जल अर्पित करना चाहिए। रात्रि जागरण में विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना श्रेयस्कर है। तिल का छह प्रकार से उपयोग करने का विधान है, जिसमें तिल मिश्रित जल से स्नान, तिल का उबटन लगाना, तिल से हवन, तिल से तर्पण, तिल युक्त भोजन ग्रहण करना और अंत में तिल का दान करना शामिल है। इस वर्ष यह तिथि 13 जनवरी को दोपहर 3:17 बजे आरंभ होकर 14 जनवरी की शाम 5:52 बजे समाप्त होगी। व्रत का पारण 15 जनवरी की सुबह 7:15 से 9:21 बजे के बीच किया जा सकता है।
यह दुर्लभ संयोग हमें एक नई शुरुआत की ऊर्जा और शक्ति प्रदान करता है, जहाँ सूर्य कर्मठता का और एकादशी आत्म-संयम का पाठ पढ़ाती है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं है, बल्कि समाज में सद्भाव, प्रकृति के प्रति गहरा जुड़ाव और आध्यात्मिक उन्नति का महापर्व है। पवित्र नदियों में स्नान करने की परंपरा हमारे अंतःकरण को शुद्ध करके जीवन को नई दिशा और प्रकाश से भर देती है। यह मिलन हमें यह प्रेरणा देता है कि जीवन में प्रकाश, ऊर्जा, भक्ति और परोपकार के सामंजस्य से ही सच्चे सुख और मोक्ष की प्राप्ति संभव है।







