बाबा वैद्यनाथ मंदिर में तिलकहरुवा की अनूठी परंपरा

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कुमार कृष्णन

 

 

(नया अध्याय)

 

            बसंत पंचमी 

 

  बाबा वैद्यनाथ मंदिर में तिलकहरुवा की अनूठी परंपरा

 

बाबा वैद्यनाथ के धाम देवघर के लिए बसंत पंचमी का दिन बेहद महत्वपूर्ण रहता है। महत्वपूर्ण इसलिए, क्योंकि यहां पर माता सरस्वती की तो पूजा आराधना की ही जाती है, इसके साथ ही भगवान भोलेनाथ का तिलक भी चढ़ता है। जी हां! शादी विवाह से पहले जो तिलक की परम्परा है वो यहां इस दिन निभायी जाती है। माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ का विवाह महाशिवरात्रि के दिन हुआ था और देवघर के वैद्यनाथ मंदिर मे शादी से पहले तिलक की परम्परा बसंत पंचमी के दिन निभाई जाती है।

सनातन धर्म में शादी से पहले दूल्हे का तिलक चढ़ता है। महाशिवरात्रि के दिन भगवान भोलेनाथ दूल्हा बनते हैं और उसी दिन उनका विवाह संपन्न होता है। विवाह से पहले भगवान भोलेनाथ को भी तिलक चढ़ता है और यह परम्परा देवघर में बाबा भोलेनाथ को तिलक चढ़ाकर बसंत पंचमी को निभाई जाती है। इस दिन भगवान भोलेनाथ की विशेष पूजा आराधना की जाती है।

बसंत पंचमी के दिन मिथिलावासी तिलकहरुवा की परम्परा निभाते हैं और यह परम्परा सदियों से चलती आ रही है। मिथिलांचल हिमालय की तराई मे बसा हुआ है और माँ पार्वती हिमालय की पुत्री हैं। माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह हुआ तो पूरे मिथिलावासी अपने आप को भगवान भोलेनाथ का साला मानने लगे। इसी परम्परा के चलते लाखों की संख्या में लोग तिलक चढ़ाने देवघर पहुंचते हैं। वस्तुतः आस्था के इस सैलाब के पीछे वह लोकमान्यता है, जिसके अनुसार देवी पार्वती को पर्वतराज हिमालय की पुत्री और भगवान शंकर को मिथिला का दामाद माना जाता है। मिथिलांचल हिमालय की तराई में स्थित नेपाल से लेकर बिहार तक फैला है।

बसंत पंचमी के दिन लाखों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। मिथिला से देसी घी के मालपुए बनाकर लाते हैं और बाबा भोलेनाथ को अर्पण करते हैं। इसके साथ ही श्रृंगार के वक़्त तीर्थपुरोहित उस दिन से भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग के ऊपर अबीर, नये धान की बाली, आम का मंजर इत्यादि अर्पण करते हैं। यह परम्परा करीब डेढ़ महीने, हरिहरण मिलन तक निभाई जायेगी। वसंत पंचमी पर यहां सबसे ज्यादा श्रद्धालु बिहार-नेपाल के मिथिलांचल से पहुंचते हैं। बसंत पंचमी के दिन शिव पार्वती के विवाह की पहली रस्म का साक्षी बनता है यह स्थान। इस दिन बाबा वैद्यनाथ को विवाह के लिए बारात लाने का प्रतीकात्मक निमंत्रण दिया जाता है। महिला श्रद्धालु पारंपरिक रिवाजों के अनुसार भगवान शिव को तिलक लगाकर बारात लाने का निमंत्रण देती है। साल में बसंत पंचमी तिथि पर मां सरस्वती की पूजा वैदिक विधि से की जाती है। बाबा के गर्भगृह में पूजा अर्चना के बाद शिवलिंग को बेलपत्र और फूलों से सजाया जाता है। यह परंपरा त्रेतायुग से चली आ रही है।

देवघर में बाबा बैद्यनाथ का तिलक-अभिषेक करने के बाद लाखों लोग अबीर-गुलाल की मस्ती में सराबोर हो जाते हैंं।

वैद्यनाथधाम स्थित देवघर के ऐतिहासिक विवरण का उल्लेख शिवपुराण में है। यहां के संपूर्ण जीवन के केन्द्र बिन्दु बाबा वैद्यनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक है।शिवपुराण में वर्णित द्वादश ज्योर्तिलिंगों मेें इसका ‘वैद्यनाथ चिताभूमि’ के रूप में वर्णन है।

यह मात्र संयोग नहीं है कि देवघर भी शिव की चिताभूमि के रूप में जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां माता सती का हृदय गिरा था। शिव पुराण के अनुसार यहीं पर माता के हृदय का दाह-संस्कार किया गया था और तब बाबा वैद्यनाथ माता सती के वियोग में उसी राख में लोट-लोटकर पूरे अंग को भस्म विभूषित कर लिए थे। इसलिए भस्म का यहां विशेष महत्व है। और आने वाले श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में भस्म भी दिया जाता है। मान्यता यह भी है कि इस भस्म को अपने ललाट पर लगाकर किसी भी कार्य के लिए निकले वह कार्य पूर्ण होता है। मनोवांछित फलों की प्राप्ति भस्म को अपने ललाट पर लगाने से होती है। देवघर के तीर्थ पुरोहित श्रीनाथ महाराज के मुताबिक सावन और भादो में तीर्थ पुरोहित अपने यजमान को हवन से प्राप्त भस्म देते हैं। भगवान शिव का यह पीठ ऊर्जा का उदगमस्थल है, शक्ति का केन्द्र है।

देवर्षि नारद ने हनुमान जी से वैद्यनाथधाम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि यही एक मात्र स्थान है जहां शिव बिना पात्र, कुपात्र, पापी, पुण्यात्मा का विचार किए सबकी कामना पूर्ण करते हैं।

बाबा वैद्यनाथ के प्रादुर्भाव की कथा भी कौतुहलपूर्ण और अनोखी है। इस लिंग की स्थापना का इतिहास यह है कि एक बार असुरराज रावण ने हिमालय पर जाकर शिवजी की प्रसन्नता के लिये घोर तपस्या की और अपने सिर काट-काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने शुरू कर दिये। एक-एक करके नौ सिर चढ़ाने के बाद दसवाँ सिर भी काटने को ही था कि शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गये। उन्होंने उसके दसों सिर ज्यों-के-त्यों कर दिये और उससे वरदान माँगने को कहा। रावण ने लंका में जाकर उस लिंग को स्थापित करने के लिये उसे ले जाने की आज्ञा माँगी। शिवजी ने अनुमति तो दे दी, पर इस चेतावनी के साथ दी कि यदि मार्ग में इसे पृथ्वी पर रख देगा तो वह वहीं अचल हो जाएगा। अन्ततोगत्वा वही हुआ। रावण शिवलिंग लेकर चला पर मार्ग में एक चिताभूमि आने पर उसे लघुशंका निवृत्ति की आवश्यकता हुई। रावण उस लिंग को एक व्यक्ति को थमा लघुशंका निवृत्ति करने चला गया। इधर उन व्यक्ति ने ज्योतिर्लिंग को बहुत अधिक भारी अनुभव कर भूमि पर रख दिया। फिर क्या था, लौटने पर रावण पूरी शक्ति लगाकर भी उसे न उखाड़ सका और निराश होकर मूर्ति पर अपना अँगूठा गड़ाकर लंका को चला गया। इधर ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की। शिवजी का दर्शन होते ही सभी देवी देवताओं ने शिवलिंग की वहीं उसी स्थान पर प्रतिस्थापना कर दी और शिव स्तुति करते हुए वापस स्वर्ग को चले गये। जनश्रुति व लोक मान्यता के अनुसार यह वैद्यनाथ ज्योतिर्लिग मनोवांछित फल देने वाला है।

लंकापति रावण के द्वारा स्थापित होने के कारण ये ‘रावणेश्वर वैद्यनाथ’ भी कहलाते हैं। शुद्ध हृदय से पूजा करने पर ये बड़ी सहजता से प्रसन्न हो उठते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। इस कारण मनोकामना लिंग के नाम से भी इनकी प्रसिद्धि है। बाबा वैद्यनाथ की पूजा अत्यंत सरल है। निर्मल हृदय फूल और बेलपत्र के साथ शिवलिंग पर उत्तरवाहिनी गंगा का जल अर्पित करो और बाबा प्रसन्न। तभी तो श्रावण मास के आते ही भक्तगण देश के कोने-कोने से कातर भाव से यहां शिवपूजन हेतु खिंचे चले आते हैं। देवघर तो आधुनिक नाम है। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘देवताओं का घर’ पर संस्कृत ग्रंथों में इसका नाम हृदयपीठ, रावण वन, हरितिकी वन या वैद्यनाथ मिलता है। अघोर साधना का महत्वपूर्ण स्थान होने के कारण देवघर का तांत्रिक साधना के​ लिए कामाख्या के बाद स्थान आता है।

बाबा मंदिर में 22 देवी-देवताओं के अलग-अलग मंदिर है और सभी का अलग महत्व है। इन्हीं मंदिरों में एक माता सरस्वती का भी मंदिर है। इस मंदिर में प्रवेश करने के लिए मंदिर प्रांगण से भक्त मां सरस्वती के चबूतरे पर पहुंचते हैं। इस मंदिर में ओझा परिवार द्वारा मंदिर स्टेट की ओर से मां की पूजा की जाती है। (विनायक फीचर्स)

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