हरी राम यादव
सूबेदार मेजर (ऑनरेरी)
अयोध्या, उ. प्र.।
(नया अध्याय, देहरादून)
बसंत में लगा निखरने रुप
सर्दी का घट गया सितम,
खिलने लगी है धूप।
मुरझाई सी प्रकृति का,
लगा है निखरने रूप।
लगा है निखरने रूप,
भूप सा हो रहा भिनसार।
हरियाली करने चली,
धरती का सोलह सिंगार।
शाम सरक गयी आगे,
दिनकर का बढ़ गया काम।
बसंत के नव विहान में,
हरी, चमके धरा अविराम।







