संकलन – राजेंद्र रंजन गायकवाड़
(सेवा निवृत केन्द्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
बसन्त पंचमी के शुभ अवसर पर पद्मविभूषण डॉ. गोपाल दास ‘नीरज’ द्वारा रचित प्रसिद्ध कविता
“आज बसंत की रात”
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना!
धूप बिछाये फूल-बिछौना
बगिया पहने चांदी-सोना
कलियां फेंके जादू-टोना
महक उठे सब पात,
गमन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना!
बौराई आमवा की डाली
गदराई गेहूं की बाली
सरसों खड़ी बजाए
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना!
धूप बिछाए फूल-बिछौना,
बगिया पहने चांदी-सोना,
कलियां फेंके जादू-टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना!
बौराई अंबवा की डाली,
गदराई गेहूं की बाली,
सरसों खड़ी बजाए ताली,
झूम रहे जल-पात,
शयन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।
खिड़की खोल चंद्रमा झांके,
चुनरी खींच सितारे टांके,
मन करूं तो शोर,







