राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
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जीवन-राग वसंत.
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सर्दियाँ हुईं हैं कुछ भारहीन
थोड़ी फुर्ती आ रही है कामकाज में
और उदासी में टूट रहा है बहुत कुछ
आदर्शों की लग गईं हैं लंबी छुट्टियाँ
काम से काम हुआ जाता है बात बड़ी
कोई हस्तक्षेप नहीं,कोई शर्त नहीं
दिन हुए खन-खना रहे सिक्कों जैसे
और रातें कम्बख़्त आशिकाना
पत्ता-पत्ता गाने लगा है फिर-फिर
मुझ में जीवन-राग वसंत.
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हाजिर वसंत.
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घटती घटनाओं में
हड़ताली कर्मचारियों में
लड़के-लड़कियों में उमँग भरे
दिन ये कि भँवरे मंडराते जैसे
छुप-छुप,चुप-चुप,स्वप्निल आँखों में
भूला-बिसरा सपना कोई
आ गया अकस्मात्
हाजिर वसंत.
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झरने जैसा वसंत.
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किसी ताजा-ताजा खबर-सा
अभी-अभी स्पर्श मिला है उसका
कुछ खिलने जैसा खिलता है भीतर-बाहर
रग-रग में रँग-बिरँगे झरने जैसा वसंत
मैं देखता हूँ घर-आँगन.
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नशा नाम वसंत.
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वह जगह नहीं है कहीं भी
जहाॅं खिला नहीं हो कभी कोई फूल
इसी ज़मीन ने देखे हैं आँसू कई-कई
और देखे हैं अप्रिय दु:ख भी कई-कई
तो फिर क्या देखे नहीं बदलते मौसम
है नशा नाम वसंत हर बार नया
अनुभव में पाया मैंने.
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