“धैर्य व निरंतरता से सब संभव हो जाता है; कठिनाई मानव को थकाती नहीं, बल्कि गहरी दृष्टि प्रदान करती है” :

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री एवं लेखिका

नवापारा-राजिम

रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

 

              (नया अध्याय, देहरादून)

 

आलेख

“धैर्य व निरंतरता से सब संभव हो जाता है; कठिनाई मानव को थकाती नहीं, बल्कि गहरी दृष्टि प्रदान करती है” :

                  सुश्री सरोज कंसारी

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जब हम किसी समस्या से जूझते हैं, तो हमें जीवन, स्वयं की क्षमताओं और दुनिया की नई समझ मिलती है। संघर्ष हमें अनुभव देता है, जिससे हमारी सोचने-समझने की शक्ति परिपक्व होती है। हम चीजों को सतही तौर पर देखने के बजाय गहराई से देखना सीख जाते हैं। शक्ति का संचय कीजिए और अपनी ऊर्जा को व्यर्थ के तनाव में नष्ट मत होने दीजिए। आज के समय में चुनौतियाँ अधिक हैं और समय सीमित; ऊपर से सांसारिक जीवन की उलझने निर्वहन को और भी कठिन बना देती हैं। विशेषकर जब हम स्वयं को संदेह के घेरे में पाते हैं या एक साथ कई जिम्मेदारियों के बीच घिर जाते हैं, तब ‘क्या करें और क्या न करें’ का निर्णय लेना असंभव सा लगने लगता है। मानसिक विचलन की स्थिति में समाधान की राह सूझना बंद हो जाती है। यद्यपि प्रत्येक मनुष्य अपने आप में सर्वशक्तिमान है और उसमें अदम्य साहस, सामर्थ्य तथा असंभव को संभव बनाने की अपार संभावनाएँ निहित हैं, किंतु कठिनाई तब उत्पन्न होती है जब हम समय का सम्मान नहीं करते। लापरवाही, बिना योजना के कार्य करना और अनुशासनहीनता ही तनाव के मुख्य कारण हैं। जो व्यक्ति नियम और मन के सामंजस्य से कार्य नहीं करते, वे अंतर्द्वंद्व और बेचैनी से घिरे रहते हैं। वास्तव में, हमारी अशांति का कारण अक्सर बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि हमारा अपना कार्य-व्यवहार होता है। जीवन में अशांति का एक बड़ा कारण दूषित विचार, दूसरों की अंधी नकल और अनियंत्रित महत्वाकांक्षाएं हैं। हर मनुष्य इस संसार में सहजता, सरलता और मासूमियत लेकर जन्म लेता है। वह अपने कर्म, व्यवहार और पुरुषार्थ से ही सब कुछ अर्जित करता है। किंतु, जो व्यक्ति परिवार, समाज, राष्ट्र और अपने कार्यक्षेत्र की मर्यादाओं का उल्लंघन करते हैं, वे स्वयं ही अपनी शांति भंग कर लेते हैं। ऐसे लोग जो सुनने के बजाय केवल सुनाने में विश्वास रखते हैं, और सहयोग करने के स्थान पर कार्यों में बाधा डालते हैं, वे सदैव शिकायतों और दूसरों की बुराई करने में ही अपना बहुमूल्य समय नष्ट कर देते हैं। वास्तव में, ऐसे व्यक्ति अपने ही हाथों अपने वर्तमान और भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं। अगर हम केवल अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहें और व्यर्थ की बातों को महत्व न दें, तो हम भटकाव से बचकर अपनी मंजिल तक सुगमता से पहुँच सकते हैं। हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम किसी को क्षति न पहुँचाएं और एक सुखद वातावरण के निर्माण में सहयोग दें; ऐसा करने से जीवन का हर क्षण आनंदमय हो जाता है। अक्सर अत्यधिक चालाकी दिखाने और स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के मोह में हम अपने वास्तविक अस्तित्व को ही भुला देते हैं। जीवन की सरलता इसी में निहित है कि हम जैसे हैं, वैसे ही दिखें। कृत्रिमता को त्याग कर स्वाभाविकता को अपनाने से ही जीवन सुखी और सरल हो जाता है। यह दुनिया बहुत बड़ी है, हुनर, योग्यता और ज्ञान से परिपूर्ण न जाने कितने ही लोग हैं, जिन्हें हम जानते भी नहीं, पर कोई किसी से कम नहीं। हर इंसान अपनी जगह बहुत ही बेहतर है। हम जहां भी हैं, जिस कार्य के लिए हैं, बस वहीं अपनी पूरी मानसिकता लगा दीजिए। मिलकर रहें, ईमानदार रहकर अपने कर्त्तव्य का निर्वहन प्रमुखता से करें। हर किसी की ज़िन्दगी में दर्द, पीड़ा, तकलीफ, सिसकी, कराह और परेशानियां हैं। कोशिश करें कि हम जाने-अनजाने में किसी को चोट न पहुंचाएं। सूर्य से तेज, पर्वत से दृढ़ता, चंद्रमा के जैसे शीतल, और धरा सी धीर रहने का गुण हर मानव को खुद में विकसित करने की कोशिश करनी चाहिए। सोच का हमारे जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ता है। जब हम जीने के लिए नियम, कानून, मर्यादा, संस्कार, सभ्यता, संस्कृति को मानते हैं और उसे अपने जीवन में अनुकरण करते हैं, तो शांत और सुखी रहते हैं। लेकिन आवेश में आकर बिना सोचे जो कार्य करते हैं, उससे हानिकारक परिणाम ही मिलते हैं। घिसना, पिटना, तपना और जरूरत में पिघलना बेहद जरूरी है। कठोर होकर संवेदनशील होने से मन में कड़वाहट भरे रह जाते हैं। मिठास पाने के लिए हमें आपसी समझौता, सामंजस्य, व्यवहार कुशल होना जरूरी है। नाजुक बनकर सिर्फ सुख के पालने में झूलने का ख्वाब त्याग दें, जीवन की हर पग की चुनौतियों का सामना करने के लिए त्याग, सेवा, समर्पण और संघर्ष की राह पर चलना आवश्यक है। सामना करने के लिए त्याग, सेवा, समर्पण और संघर्ष की राह पर चलना जरूरी है। जीवन का कोई भी क्षेत्र हो, जब तक हम आपसी भेद को भूलकर समाधान का हिस्सा नहीं बनेंगे, अव्यवस्था में सुधार नहीं हो सकता। समस्या और शिकायत की गिनती करते रहने और दोष देने से कोई महान कार्य नहीं होते। सबसे पहले कदम बढ़ाइए, साथ लेकर चलिए, एक दूसरे का मनोबल बढ़ाइए और फिर जो सुधार करना चाहते हैं, उसमें ध्यान लगाइए। कहने वालों की कमी नहीं, बस करने वालों की जरूरत है। नाराज, उदास होकर बैठिए मत, जो चाहते हैं उसे कर दिखाइए। जब तक विचारों का आदान-प्रदान नहीं होगा, गलतफहमी बनी रहेगी। इसलिए विवाद, बहस, झगड़े करने की बजाय आत्मिय संबंध बनाए रखना जरूरी है। जो है, जैसे हैं, जिस जगह हैं, उससे भागने, रूठने की बजाय कुछ करने की कोशिश तो कीजिए। जीवन में सब कुछ नहीं मिलता, ये सच है, पर जो है, उसके साथ हम हर पल को बेहतर बना सकते हैं। बशर्ते हममें जो असीमित ऊर्जा है, उससे खुद को शक्तिशाली, ज्ञानी, हिम्मती बनाने के लिए खर्च करें। बेवजह के खयाल करना, रोना, दुखी होना, सोचना, अफसोस करना, दूसरों को हानि पहुंचाना, घुटना, इससे तन और मन दोनों कमजोर होते हैं। धन-बल, शौहरत, पद-प्रतिष्ठा से संपन्न होना, यह शक्ति का स्रोत नहीं, इससे आंतरिक खुशियाँ नहीं बटोरी जा सकती। काम, क्रोध, मद, माया, ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, झूठ, बेईमानी और भ्रष्ट आचरण से दूर रहकर जब हम दिल में प्रेम, सकारात्मक सोच और हर कदम पर खुद पर विश्वास रख, उत्साह से भरपूर होते हैं, जरा सी बात पर टूटते नहीं, बल्कि जुड़ने का भाव रखते हैं, कदम डगमगाते नहीं, मुसीबत देखकर सामना करने के लिए आगे आते हैं, वही सबसे बड़ी शक्ति होती है। इसलिए मन को शक्तिशाली बनाइए और अपनी असीम ऊर्जा को व्यर्थ मत कीजिए। सही काम में, सही जगह, मानवता के हित में उपयोग कीजिए।

 

जीवन को बेहतर बनाने के लिए शक्ति का संचय करना और अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाना आवश्यक है। संघर्ष बुरा नहीं होता, यह हमें वह ‘दृष्टि’ देता है जो सुख-सुविधाओं में रहकर कभी प्राप्त नहीं की जा सकती। यदि आप टिके रहते हैं, तो हर मुश्किल अंततः आपको पहले से बेहतर और समझदार इंसान बनाकर छोड़ती है।

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