सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री एवं लेखिका
नवापारा-राजिम
रायपुर (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय)
“रिश्तों की कला: प्रेम, समझ और सम्मान का समन्वय”
– सुश्री सरोज कंसारी
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬
तोड़कर कुंठित विचारों की जंजीर, स्वतंत्र रूप से जीना सीखिए। सांसारिक जीवन में कदम रखते ही हम विभिन्न उलझनो में उलझ जाते हैं और यह भूल जाते हैं कि हम एक इंसान हैं और हमारा एक स्वतंत्र विचार है, जिसके प्रयोग से हम अपने जीवन को सुखी, समृद्ध और सौभाग्यशाली बनाने के साथ ही अपने व्यक्तित्व का विकास कर मन को विभिन्न परिस्थितियों में शांत रख सकते हैं। लेकिन रिश्ते-नाते, पद-प्रतिष्ठा, शोहरत, भोग-विलास में लिप्त रहने के कारण अपने मूल उद्देश्य को भूलकर सात्विक भाव नहीं भर सकते और जीवन भर भटकते रहते हैं, सुकून की तलाश में। समझ नहीं पाते कि मानसिक रूप से इतनी परेशानी क्यों है। जो नहीं, उसकी कल्पना करते हैं, जो है उसकी इज्जत नहीं कर पाते, और खोने के बीच जिंदगी में संतुलन नहीं स्थापित कर पाते। अशांत मन होने की वजह से किसी की बात को समझने में असमर्थ होते हैं, किसी की तकलीफ को महसूस नहीं कर पाते। प्रत्येक मन में एक अजीब सी बेचैनी है, कुछ ना कुछ तलाश करते रहते हैं, और अपनी अधूरी ख्वाहिश को लेकर एक बोझिल मानसिकता के साथ जीने के लिए विवश होते हैं। समझदारी तो सभी के पास है, लेकिन उसका सही दिशा में और समय पर उपयोग न कर पाने के कारण खुद से समस्याएं उत्पन्न करते हैं। अपने भीतर व्यवहार और कार्य को देखने, उसे व्यवस्थित करने और अपने आपको सुधारने, संभालने की बजाय, दूसरों के जीवन में अधिक रुचि रखते हैं और अपने अनुकूल माहौल न मिलने के कारण दुखी हो जाते हैं। कई नकारात्मक बातें सोच लेते हैं, दूसरों को देखकर अपनी तुलना करते हैं, अपने वर्तमान से संतुष्ट नहीं होते। कभी अतीत को याद करके दुख का रोना शुरू कर देते हैं और जो साथ हैं, निभा रहे हैं, उन्हें भी अपनी दिन-हीन अवस्था बता-बताकर उदास जीने के लिए मजबूर कर देते हैं। जो बीत गया, जिस पर हम कोई सुधार नहीं कर सकते, उसके लिए अपनी ऊर्जा को बर्बाद करते हैं, भविष्य की चिंता करते हैं और आज के पल को भी नहीं जी सकते। जिनमें हीनभाव होता है, उनकी सोच छोटी होती है, वे अपने जीवन के बारे में सोचने और चिंता करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। हमेशा दुख का बोझ लेकर चलते हैं, खुद की परिस्थिति से नाराज तो रहते ही हैं, चेहरे पर उदासी का अजीब घेरा होता है। यही वजह है कि किसी में हमें अच्छाई नजर नहीं आती। एक सीमित दायरे में जीने, किसी से बात न करने, मेलजोल न होने के कारण समस्या के बीच घूमती है ज़िन्दगी, जिससे अपने ही रिश्ते-नाते को निभा नहीं पाते, उनसे ही क्रोधित होते हैं, उनके हंसने, बोलने, घूमने और हंसमुख स्वभाव से भी ईर्ष्या करते हैं। हर बात पर झुंझलाहट और चिड़चिड़ाहट होती है, क्योंकि दिल की बात को किसी से कहने की आदत नहीं होती। अपने आप से पास मित्र या पहचान में किसी को खुश देखकर छोटा महसूस करते हैं। अपने आप को व्यक्त नहीं कर पाते, बस मन ही मन घुटते-घुटकर चिंता से खुद को कमजोर बना लेते हैं। उनका मन पूरी तरह कुविचार से भर जाता है, जिंदगी उन्हें बोझ लगती है, किसी भी चीज में उनका दिल नहीं कहता, एकदम घबराए और बेचैन से रहते हैं। विपरीत परिस्थिति से सामंजस्य नहीं बिठा पाने के कारण लक्ष्य से भटक जाते हैं। आज अपनी ही लापरवाही की वजह से हर कोई परेशान नजर आता है, विभिन्न प्रकार की विचित्र सोच को भरकर जीते हैं, जिसमें स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पाते और बेहतर जीवन जीने में असफल हो जाते हैं। हर मनुष्य अपने शुभ कर्म से अपने जीवन में खुशहाली ला सकते हैं, लेकिन विचारों में सकारात्मक सोच न होने के कारण नकारात्मक भाव को लेकर एक दूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं। अपने हर एक असफलता के लिए दूसरों को दोष देने और अपने गलती को सुधार ना कर पाने के कारण आज हर कोई दुखी है और इसके पास, उसके पास अपने दुख का रोना रोकर सोचते हैं कि कोई उनके दुख को हल कर देंगे, लेकिन हम अपनी सहायता खुद नहीं कर सकते और दूसरों के मोहताज हो जाते हैं। स्वतंत्र विचार होने का अर्थ होता है अपने मन में, अपने विचारों में, अपने हृदय की गहराइयों में शुद्धता भरना और हर एक इंसान से सद्व्यवहार करना, शुभ बोलना और सोचना, अच्छे कार्य से जीवन को श्रेष्ठ बनाना, सुखद जीवन जीने के लिए जो जरूरी तत्व है, उसको ग्रहण करना। लेकिन आज हमारे आसपास कहीं ऐसी घटनाएं होती हैं, जिसे देखकर, सुनकर एक स्वच्छ विचारधारा जन्म नहीं ले सकती, क्योंकि आज भी जाति, धर्म, संप्रदाय, मजहब में लोग बंटे हुए हैं…और एक दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कमी नहीं करते। जब तक मन के भाव सही नहीं होंगे, हम आपस में एक दूसरे को अपना सहयोगी नहीं मानेंगे और आगे बढ़कर किसी के सहयोग के लिए कदम नहीं बढ़ाएंगे। तब तक हम इस संसार का कल्याण नहीं कर सकते। अक्सर हम देखते हैं कि आपसी जरा सी लड़ाई होने से हम एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं। जिस वक्त हम दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए प्रयास करते हैं और अपने मन में किसी के लिए दुश्मनी ठान लेते हैं, उसी पल बुरे दिन शुरू हो जाते हैं। क्योंकि जिस मन में धैर्य नहीं, क्षमा भाव नहीं, दया नहीं और सिर्फ बदले का भाव है, उनका जीवन दयनीय हो जाता है। बुरे स्वाभाव से हम किसी का दिल नहीं जीत पाते। निकलिए अपनी दूषित मानसिकता से और अपने अच्छे कर्मों से जीवन में शांति स्थापित कीजिए। धन, दौलत, नौकर, बंगले, गाड़ी, चैन से जीवन जीने की सिर्फ एक कल्पना है। हर दिन को हम एक अच्छा बना सकते हैं, छोटी-छोटी खुशियों में शामिल होकर, प्रेम देकर, हर किसी का सम्मान करके और मीठी बोली से अपने जीवन में खुशियों के रंग भर सकते हैं। जिस प्रकार एक बालक के मन में किसी प्रकार की गलत सोच नहीं होती, उसका मन निर्मल, नादान होता है, वह शरारत करते हैं लेकिन कभी किसी का बुरा या अहित नहीं सोचते, इस प्रकार हमें उम्र के हर मोड़ में शुद्ध भाव रखना चाहिए, बैर नहीं पालना चाहिए, गलती को क्षमा कर देना चाहिए, यही जीवन का सार तत्व है…अक्सर हम जिनसे जुड़े होते हैं, जिनसे आपस में विचार मिलते हैं, उनसे एक भावनात्मक लगाव होता है। साथ रहते, भावनाओं से आदान-प्रदान से एक उम्मीद बंध जाती है और अपनेपन से स्पर्श होने के कारण उनसे बहुत सी अपेक्षा करने लग जाते हैं, उन्हें अपनी हर गतिविधि में शामिल करते हैं और चाहते हैं वे हमारी हर बात को समझें, माने। पर हर इंसान की अपनी एक अलग सोच और जीने की शैली होती है और उनके सपने भी अलग होते हैं। भले ही वे हमें मनाते हैं, जानते हैं, लेकिन जरूरी नहीं वे हर शर्त पर राजी हों। ऐसे में उन्हें परेशानी होती है, मना भी नहीं कर पाते और अंतर्मन में उनके द्वंद होता है। ऐसे रिश्ते फिर एक समय के बाद खुद को बंधे हुए समझने लगते हैं और फिर वे निराश हो जाते हैं। कोई भी रिश्ता हो, उन्हें सच्चे दिल से निभाइए, लेकिन अपनी शर्तों में उन्हें जीने के लिए बाध्य मत करिए। अपनी योग्यता, हुनर और स्वभाव के अनुसार पद-प्रतिष्ठा पाने और अपनी रुचि के अनुसार रहने के लिए वे भी स्वतंत्र होना चाहिए। हर पग पर उनका साथ देकर रिश्ते को और मजबूत कीजिए। किसी की हर बात में दखल देने और रोक-टोक करने से वे जल्दी मुरझा जाते हैं, टूटने, ऊबने और फिर दूर भागने का प्रयास करते हैं। इसलिए उन्हें कहाँ जा रहे, क्यों जा रहे, किससे बात किए, क्या बात किए, ऐसे रहो, ये कलर पहनो मत, इसके साथ रहो, उससे बात मत करो, जैसी बातें मन में संदेह उत्पन्न करती हैं और आपसी मधुर संबंध कमजोर होते हैं। धीरे-धीरे करीबी रिश्ते को भी तोड़ने, छोड़ने और ऊब जाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। साथ दीजिए, पर हर बात में नाराजगी उचित नहीं। उनसे कुछ अपेक्षा करना सामान्य रूप में ठीक है, लेकिन आपके अनुसार ही रहें या आपके शर्तों पर जिएं, ये सही नहीं। क्योंकि सभी के सपने और सोच अलग होते हैं। सिर्फ साथ रहने, उनसे अपनत्व होने और प्रेमभाव होने की वजह से ही किसी को जीवन का हिस्सा मानकर उन्हें बांधकर नहीं रखना चाहिए। उन्हें स्वतंत्र रहने देना चाहिए और रिश्तों में मिठास बनाए रखना चाहिए। किसी के साथ रहकर स्वाभिमान को जीवित रखना चाहिए। आपस में विश्वास रखें और उन्हें भी अपने अनुसार जीवन के पथ पर चलने, फैसला लेने और पसंद के अनुसार जीने का अधिकार दीजिए। तभी कोई भी रिश्ते अंत तक टिके रहेंगे। अक्सर हम जब किसी के विचारों से प्रभावित होते हैं, तब उनके साथ अधिकत्तर समय व्यतीत करने की वजह से उन पर अधिकार के भाव स्वमेव आ जाते हैं। हम उनसे हर वो बात मनवाना चाहते हैं। इस बीच भूल जाते हैं वो भी इंसान हैं, उनकी भी सोच है। हमे भी उनके अनुकूल रहना और उनकी पसंद-नापसंद का ध्यान रखना जरुरी है। जैसे हम उनसे कोई उम्मीद रखते हैं, वही व्यवहार देना भी ज़रूरी है। तभी रिश्तों में गहराई आ पाती है। वरना आज के माहौल में हम देख रहे हैं, बनते-बिगड़ते, न जाने किस मोड़ पर चले जाते हैं, जहाँ अपनों के लिए ही दिल में स्थान नहीं होता। महसूस कीजिए, किसी से क्या अपेक्षा करते हैं, वहीं व्यवहार उन्हें भी दीजिए। सिर्फ अपने अनुसार किसी को इशारे पर मत नचाइए, उनकी भी सुनिए। संसारिक रिश्ते, नातों के जाल से एकदम मुक्त रह पाना संभव नहीं, क्योंकि एक दूसरे के साथ मिलकर ही जीवन का निर्वहन होता है। इसलिए अपने विचारों से स्वतंत्र रहिए, लेकिन अपनी हर जिम्मेदारियों से बंधे रहिए। किसी को अपना बनाकर वह बर्ताव मत करिए, जिससे उसकी मानसिकता को चोंट पहुंचे, किसी बात से वे विचलित हो जाएं और केवल नाम के लिए रिश्ते हों, पर हृदयसे आपके कई अजीब हरकत से वे टूट चुके हों। कोई निभा रहे हैं, इसका फायदा भी मत उठाइए, उसकी हर सोच और तकलीफ का ध्यान रखें और उन्हें बेहद सम्मान दें।
महत्वपूर्ण सन्देश :
“रिश्तों को निभाने के लिए प्रेम, समझ व सम्मान का समन्वय जरूरी है, तभी जीवन में सुख तथा शांति मिल सकती है।
—————————————







