युगपुरुष कविवर सूर्य
सम्पादक एवं सृजक
(भारतीय संस्कृति के संरक्षक, महनीय आध्यात्मिक चिंतक, समाज-सुधारक, दार्शनिक एवं साहित्यकार)
(नया अध्याय, देहरादून)
आलेख
“वर्तमान में जीना सीखें !”
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हम अक्सर उन यादों में जीते हैं जो जा चुकी हैं या उन चिंताओं में जो अभी आई ही नहीं हैं। जब आप अपनी साँसों को महसूस करते हैं, तो आप ‘अभी’ में लौट आते हैं। याद रखिए, शांति भविष्य की किसी उपलब्धि में नहीं, बल्कि वर्तमान के इस पल को स्वीकार करने में है।
विचारों के दृष्टा बनें :
आप अपने विचार नहीं हैं। जैसे आकाश में बादल आते-जाते हैं, वैसे ही मन में विचार आते हैं। उन्हें रोकिए मत, बस उन्हें एक साक्षी बनकर देखिए। जब आप विचारों से खुद को जोड़ना बंद कर देते हैं, तो वे अपने आप शांत होने लगते हैं।
अति-चिंतन एक भ्रम है :
मन अक्सर उन समस्याओं की कल्पना करता है जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। अधिक सोचना उस अंधेरे कमरे में खो जाने जैसा है जहाँ दरवाजा खुला है, बस हमें अपनी आँखें खोलने की ज़रूरत है।
प्रकृति का मौन :
कभी गौर से देखिए, प्रकृति कभी जल्दबाजी में नहीं होती, फिर भी सब कुछ समय पर पूरा होता है। अपनी सांसों की लय को प्रकृति की लय से जोड़ें। मौन में वह शक्ति है जो शोर मचाते हजारों विचार भी नहीं दे सकते।
अभ्यास के लिए :
जब भी मन अशांत हो, बस एक पल रुकें और खुद से कहें— “इस पल में, सब कुछ ठीक है।” अपनी आती-जाती सांसों पर ध्यान केंद्रित करना ही स्वयं से मिलने का सबसे सरल मार्ग है।







