डॉक्टर रामबली मिश्र, वाराणसी।
(नया अध्याय, देहरादून)
मजदूर की अस्मिता (दोहा)
रचना की यह नींव है,महलों का निर्माण।
करता हर मजदूर है,बनकर स्वयं प्रमाण।।
बिना किये होता नहीं,कोई अच्छा काम।
फिर होता बदनाम क्यों,मजदूरों का नाम??
मजदूरी कर भर रहा,परिजन का वह पेट।
फिर भी खुले बजार में,लगता नीचा रेट।।
मजदूरों के हाथ से,होता काम महान।
पूजन के वे योग्य हैं, वंदनीय इंसान।।
कर्म क्षेत्र संसार में,सदा श्रेष्ठ मजदूर।
पैसेवाले लोग भी,कर्महीन मजबूर।।
मजदूरों के भाव में,सच्चाई का राग।
फिर भी इनके प्रति नहीं,लोगों में अनुराग।।
मजदूरों के हाथ से,गगन चूमता गेह ।
बनता जाता अनवरत,सुंदर निः संदेह।।
मजदूरों के हाथ का,हो सदैव सम्मान।
ये हैं इस संसार में,जैसे प्रिय भगवान।।
डमरू घनाक्षरी (वर्णिक छंद)
चिहुंकत जब तब,
कदम धरत डर,
रुक रुक चलकर,
पुनि पुनि बढ़ता।
रह रह फड़कत,
लखत चलत यह,
हर हर हर हर,
फिर यह चलता।
रुकत न यह तब,
क्षण क्षण पल पल,
विकल बहुत नित,
धम धम चढ़ता।
बहुत मगन जन,
विसरत सुध तन,
सचल सबल बन,
सुखमय लगता।
डमरू छंद (वर्णिक)
सुखमय जीवन,
जीना बेहतर,
यदि दिल में,
हो स्नेहिल,
भावन,
मृदु,
हो।
हो,
अति,
कोमल,
मधुरिम,
शिवमयता,
मोहक सात्विक,
मंत्रमुग्ध समता।







