हरी राम यादव
बनघुसरा, अयोध्या, (उ. प्र.)
(नया अध्याय, देहरादून)
आओ लिखें हम एक नयी कहानी
आओ लिखें हम एक नयी कहानी,
जिसमें न कोई राजा हो न रानी।
बस उसमें गांवों की स्वच्छ हवा हो,
और हो बूढ़े कुंए का निर्मल पानी ।
उसकी कथा वस्तु हो मंहगू ममता,
और हो उसमें गांव की बोली बानी।
हों उसमें गहरी गडही ताल तलैया,
जिसमें उगती हो तलपटनी रानी।
नदी, नाव और पनघट हों उसमें,
जिसमें पशु पक्षी की देखें मनमानी।
बातें करते कोई बुढऊ बाबा हों,
हों उसमें काका काकी मामा नानी।
हवा हो उसमें पंछुवा और पुरवाई,
और हों उसमें घाघ मौसम विज्ञानी।
हों उसमें उड़ते भूरे काले बादल,
और हो दादुर मोर चकोर की बानी ।
उछल-कूद करते बछड़े बछिया हों,
और हो मरकही गाय की रंभानी।
उसमें हरियाली हो उन पेड़ों की,
जिसके संग आयी “हरी” जवानी।
जिसमें हो खट्टे मीठे आम की खुशबू ,
आ जाए सूखे मुंह में भी पानी।
काले काले मीठे जामुन फल हों,
जिसके दाग की न हो कभी रवानी ।।
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शराब के शबाब में डूब रहे गांव हैं
शराब के शबाब में डूब रहे गांव हैं,
बैठने के लिए ठेके बन गये ठांव है।
जिसे देखो शाम को वहीं चला आ रहा,
हाथ में पाउच और नमकीन है गहा।
पी पीकर लोग इधर-उधर गिर रहे,
बताओ सरकार उन्हें मनुष्य कौन कहे।
उन्हें न चिंता स्वयं की न घर बार की,
न चिंता माता-पिता पत्नी परिवार की ।
क्या समाज को डुबोकर सडे़ आब में,
चार चांद लगाएंगे अपने रुआब में।
अगर शराबी बनाना देश का विकास है,
तो फिर बताइए हरी क्या विनाश है।
चूल्हे को ठंडा कर रही शराब की थैली,
इसके प्रदेश की छवि हो रही मटमैली।
हर अपराध की जड़ में बसी शराब है,
‘पी लिया था’ अपराधी का जबाब है।।







