हरी राम यादव
सूबेदार मेजर (आनरेरी)
(नया अध्याय, देहरादून)
वीरगति दिवस पर विशेष
सिपाही हरपाल सिंह वीर चक (मरणोपरान्त)
सन 1947-48 के भारत पाकिस्तान के युद्ध में 2 राजपूत रेजिमेंट अग्रिम मोर्चे पर तैनात थी। 04 फरवरी 1948 को सिपाही हरपाल सिंह अपनी यूनिट के गश्ती दल के सदस्य के रूप में आगे बढ़ रहे थे। सिपाही हरपाल सिंह के गश्ती दल को तीन तरफ से घिर जाने का खतरा दिखाई पड़ने लगा । सामरिक परिस्थितियों और सैन्य योजना के कारण गश्ती दल के कमांडर ने स्थिति को भांपते हुए अपने दल को पीछे हटने का हुक्म दिया। गश्ती दल की संख्या से छह गुना ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक उनके आसपास थे । सिपाही हरपाल सिंह के पास गश्ती दल की एल एम जी थी और वह उसके नं 1 थे। दल के सामने आयी भीषण समस्या को देखकर सिपाही हरपाल सिंह ने वहीं रूक कर अपने दल को कवरिंग फायर देने का निश्चय किया, ताकि उनका गश्ती दल सुरक्षित वापस लौट सके।
सिपाही हरपाल सिंह अपने गश्ती दल से अलग हो गये। उन्होंने अपने दल को कवरिंग फायर देना शुरू किया । उनके दल के कमांडर ने उन्हें पीछे हटने का आदेश दिया लेकिन अपनी जिम्मेदारी समझकर वह डटे रहे । इसी दौरान उनके पैर में गोली लग गयी और वह गम्भीर रूप से घायल हो गये। घायल होने के बाद वह लगभग सौ गज की दूरी रेंगकर एक सुरक्षित आड़ में गये। थोडी देर में उनकी सहायता के लिए एक जवान और आ गया। लेकिन दोनों और से हो रही गोलीबारी में उस जवान को गोली लग गयी और वह घायल हो गया। सिपाही हरपाल सिंह ने स्थिति को समझा और फिर आड़ में चले गए | आड़ में जाने के बाद उन्होंने पाकिस्तानी सैनिकों पर फायर खोल दिया। इसी बीच पाकिस्तानी सैनिक उनके और नजदीक पहुंच गये। जब उन्होंने देखा कि पाकिस्तानी सैनिक नजदीक आते जा रहे है तो वह लगभग 150 मीटर की दूरी तक छुपते हुए रेंगकर गये और अपने हथियार और गोला बारूद को छिपा दिया। उनके शरीर से लगातार खून बह रहा था। दोनों और से गोलीबारी जारी थी। इसी बीच गोली लगने के कारण वह वीरगति को प्राप्त हो गये। उन्होंने अपने साहस, वीरता और कर्तव्यपरायणता से अपनी बटालियन को होने वाले भारी नुकसान से बचा लिया।
सिपाही हरपाल सिंह ने अपनी जान की परवाह किए बिना तथा दुश्मन से घिरा होने के बावजूद अपने साथी सैनिकों के लिए ढाल बनकर उनको बचाया। उनके असाधारण साहस और वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।
सिपाही हरपाल सिंह का जन्म 28 जुलाई 1921 को बुलंदशहर के गांव कलां पुजरी, अहमदगढ़ में श्री राम दयाल सिंह के यहाँ हुआ था। वह 28 जुलाई 1941 को सेना की राजपूत रेजिमेंट में भर्ती हुए और प्रशिक्षण के बाद वह 2 राजपूत रेजिमेंट में पदस्थ हुए। लगभग 27 साल की उम्र में और 07 साल की सैनिक सेवा में उन्होंने वीरता और बलिदान की वह मिसाल पेश की, जिससे पूरा बुलंदशहर अपनी माटी के वीर सपूत पर आज भी गर्व अनुभव करता है।







