एपस्टीन फाइल्स: लोकतंत्र का आईना या सत्ता का कवर-अप?

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डॉ. सत्यवान सौरभ

(पी-एच.डी., राजनीति विज्ञान,

कवि, लेखक एवं सामाजिक चिंतक)

बरवा, हिसार–भिवानी (हरियाणा) 

 

 

                             (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

एपस्टीन फाइल्स: लोकतंत्र का आईना या सत्ता का कवर-अप?

(एपस्टीन का काला जाल: मोदी के नाम पर वैश्विक साजिश?)

 

 

 

अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा सार्वजनिक की जा रही एपस्टीन फाइल्स केवल एक आपराधिक कांड का खुलासा नहीं हैं, बल्कि वे आधुनिक लोकतंत्रों की पारदर्शिता, जवाबदेही और सत्ता-संरचना पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। जेफरी एपस्टीन—एक ऐसा नाम, जो वित्तीय वैभव, राजनीतिक पहुँच और यौन शोषण के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का पर्याय बन चुका है—की मृत्यु के छह वर्ष बाद उसके दस्तावेज़ सामने आ रहे हैं। इन फाइल्स का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि ये दिखाती हैं कि किस प्रकार सत्ता, पूंजी और गोपनीय नेटवर्क लोकतांत्रिक संस्थाओं को भीतर से प्रभावित करते हैं।

 

नवंबर 2025 में अमेरिकी कांग्रेस ने एपस्टीन फाइल्स पारदर्शिता अधिनियम पारित किया। इसके तहत जनवरी 2026 तक 33 लाख से अधिक पृष्ठ सार्वजनिक किए जा चुके हैं। इनमें ई-मेल संवाद, उड़ान लॉग, संपर्क सूचियाँ, वित्तीय लेन-देन और जांच एजेंसियों की आंतरिक रिपोर्टें शामिल हैं। इन दस्तावेज़ों में अमेरिका ही नहीं, बल्कि कई देशों के राजनीतिक, कारोबारी और कूटनीतिक हलकों के संदर्भ सामने आए हैं। भारत का नाम भी इन्हीं संदर्भों में उभर कर आया है, जिसने इस बहस को और तीखा बना दिया है।

 

जेफरी एपस्टीन का नेटवर्क कोई साधारण अपराध नहीं था। न्यूयॉर्क से फ्लोरिडा और कैरिबियन द्वीपों तक फैले इस जाल में दुनिया के कई प्रभावशाली लोगों के शामिल होने के आरोप रहे हैं। 2019 में अमेरिकी जेल में उसकी रहस्यमय मौत के बाद वर्षों तक फाइल्स सील रहीं। लेकिन पीड़ितों के दबाव, मीडिया की पड़ताल और न्यायिक हस्तक्षेप ने सरकार को इन्हें सार्वजनिक करने के लिए बाध्य किया। जुलाई 2025 में जारी पहले बैच में गिस्लेन मैक्सवेल के मुकदमे से जुड़े कई नाम सामने आए। ट्रंप, क्लिंटन और ब्रिटिश शाही परिवार से जुड़े संदर्भ पहले ही चर्चा में थे, लेकिन नए दस्तावेज़ों ने बहस को वैश्विक स्तर पर फैला दिया।

 

भारत से जुड़े आरोपों और दावों ने स्वाभाविक रूप से राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। फाइल्स में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अप्रत्यक्ष उल्लेख, उद्योगपति अनिल अंबानी से संबंधित कुछ ई-मेल और पूर्व राजनयिक हर्ष पुरी के नाम सामने आने का दावा किया गया है। 2017 के कुछ ई-मेल संवादों में यह संकेत दिया गया है कि अमेरिकी राजनयिक नियुक्तियों, अंतरराष्ट्रीय बैठकों और प्रभाव-निर्माण में एपस्टीन से सलाह ली गई। एक ई-मेल में एपस्टीन द्वारा यह दावा किया गया है कि उसने भारत-इज़रायल कूटनीतिक संवाद के दौरान अमेरिकी नेतृत्व को प्रभावित करने में भूमिका निभाई।

 

भारत सरकार ने इन दावों को पूरी तरह निराधार और कचरा करार दिया है। सरकार का यह कहना स्वाभाविक है, क्योंकि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे आरोप गंभीर होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि आरोप असत्य हैं, तो स्वतंत्र और पारदर्शी जांच से परहेज़ क्यों? लोकतंत्र में सरकार की विश्वसनीयता केवल खंडन से नहीं, बल्कि जांच और जवाबदेही से स्थापित होती है।

 

यह विवाद केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में भी ट्रंप प्रशासन पर आरोप लगे हैं कि उसने दस्तावेज़ों को जारी करने में अनावश्यक देरी की और कुछ हिस्सों को छिपाने की कोशिश की। रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी और डेमोक्रेट नेताओं ने न्यायिक निगरानी की मांग की है। इससे स्पष्ट होता है कि दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र भी सत्ता और पारदर्शिता के टकराव से अछूता नहीं है।

 

भारतीय लोकतंत्र के संदर्भ में यह बहस और गहरी हो जाती है। हमारा राजनीतिक तंत्र पहले ही प्रॉक्सी नेतृत्व, कॉरपोरेट प्रभाव और अपारदर्शी निर्णय-प्रक्रियाओं की आलोचना झेल रहा है। पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण मिला है, लेकिन कई जगह वास्तविक सत्ता आज भी प्रॉक्सी पुरुषों के हाथों में है। यह केवल स्थानीय स्तर की समस्या नहीं, बल्कि सत्ता-संरचना की व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाती है—जहां औपचारिक लोकतांत्रिक ढाँचे के पीछे अनौपचारिक नेटवर्क निर्णय लेते हैं।

 

एपस्टीन फाइल्स इसी प्रवृत्ति का वैश्विक रूप हैं। सतह पर लोकतंत्र चमकता है, लेकिन भीतर संपर्क, धन और गोपनीयता का खेल चलता है। भारत में कोहिनूर विवाद, राफेल सौदा या चुनावी बॉन्ड जैसी व्यवस्थाओं पर उठे सवाल इसी कारण विश्वास के संकट को जन्म देते हैं। जब पारदर्शिता अधूरी होती है, तो अफवाहें और संदेह स्वाभाविक रूप से पनपते हैं।

 

वैश्विक स्तर पर ये फाइल्स पूंजीवाद और सत्ता के गठजोड़ को उजागर करती हैं। एक ऐसा अभिजात्य वर्ग, जहां कानून अक्सर कमजोर पड़ जाता है और प्रभावशाली लोग जवाबदेही से बच निकलते हैं। भारत जैसे उभरते लोकतंत्र के लिए यह चेतावनी है। हमारी अर्थव्यवस्था वैश्वीकरण के दौर में तेज़ी से आगे बढ़ रही है—विदेशी निवेश, स्टार्ट-अप संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ बढ़ रही हैं। लेकिन क्या हमारी संस्थाएँ इतने मज़बूत हैं कि वे छिपे हुए प्रभाव-जालों का सामना कर सकें?

 

राजनीतिक दृष्टि से भी यह मुद्दा महत्वपूर्ण है। 2029 के आम चुनावों से पहले ऐसे खुलासे राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं। विपक्ष का कर्तव्य है कि वह सवाल उठाए, लेकिन उससे भी अधिक ज़रूरी है कि संसद में गंभीर और तथ्यात्मक बहस हो। सर्वोच्च न्यायालय को, आवश्यकता पड़ने पर, स्वतः संज्ञान लेना चाहिए ताकि संस्थागत विश्वास बना रहे।

 

समाधान के रास्ते स्पष्ट हैं। पहला, भारत से जुड़े सभी संदर्भों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच—राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त। दूसरा, संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों और वरिष्ठ अधिकारियों के विदेशी संपर्कों का नियमित सार्वजनिक प्रकटीकरण। तीसरा, सूचना के अधिकार को और मज़बूत करना तथा राजनीतिक फंडिंग में पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करना। अंतरराष्ट्रीय मंचों, जैसे जी-20, पर साइबर और वित्तीय पारदर्शिता को एजेंडा बनाना भी ज़रूरी है।

 

एपस्टीन फाइल्स केवल एक व्यक्ति या कांड की कहानी नहीं हैं। वे यह बताती हैं कि लोकतंत्र की असली परीक्षा सत्ता से सवाल पूछने में है। यदि हम सवालों को दबा देंगे, तो सत्ता का आईना धुंधला होता जाएगा। ग्रामीण भारत की आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से लेकर संसद और वैश्विक मंचों तक—हर स्तर पर जवाबदेही लोकतंत्र की प्राणवायु है।

 

समय रहते सुधार किए गए, तो लोकतंत्र मजबूत होगा। अन्यथा रहस्य, नेटवर्क और अपारदर्शिता लोकतांत्रिक संस्थाओं को भीतर से खोखला करती रहेंगी।

सत्ता जवाबदेह हो—यही गणराज्य का मूलमंत्र है।

जय हिंद।

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