राजेंद्र रंजन गायकवाड़
साहित्यकार एवं
सेवा-निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
गजल
जिन्दगी खत्म हो रही है,
काम, खत्म नहीं होता।
हर साँस में दर्द बसा है,
आराम नसीब नहीं होता।
सूरज की किरणें चुभती हैं,
रात का अंधेरा दूर नहीं होता।
दिल पूरा थक चुका है मगर,
दिमाग का ठिकाना नहीं होता।
बस थोड़ा और काम कर लूं,
ये सिलसिला खत्म नहीं होता।
खुद से वादा किया है, निभा लूं,
किया वादा, कभी पूरा नहीं होता।







