सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका
अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा/राजिम,
रायपुर, (छ.ग.
(नया अध्याय, देहरादून)
अक्तिपर्व विशेष/आलेख :
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बचपन के खेल सिर्फ मनोरंजन नहीं होते, वे जीवन की पहली पाठशाला होते हैं
-सुश्री सरोज कंसारी
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गुड्डे-गुड़ियों के खेल से बच्चे भावनात्मक रूप से एक दूसरे से जुड़ते हैं।- गुड्डे-गुड़ियों के खेल से बच्चे अपने रीति-रिवाज से परिचित होते हैं । हमारे हिन्दुस्थान में पग-पग पर सभ्यता और संस्कृति की एक अनोखी झांकी प्रस्तुत होती है। जहां लोग मिल-जुलकर तीज-त्यौहार मनाते हैं और अपनी रीति-रिवाज और परंपराओं का निर्वहन करते हैं, जिसे देखकर आने वाली पीढ़ी भी अपनी संस्कृति से परिचित होती है। त्यौहार ही हैं जो जीवन में खुशियाँ और उत्साह का संचार करते हैं। इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में व्यस्त मानव को थकान से फुर्सत के कुछ आनंदित पल मिलते हैं, जिसमें सभी पारिवारिक जन, रिश्ते-नाते और सभी लोग मिलकर आपसी सद्भाव, समन्वय और सद्व्यवहार से त्यौहार मनाते हैं। हर इंसान को अपनी संस्कृति का ज्ञान होना चाहिए और जब हम मिलकर किसी खुशी को आपस में मनाते हैं, तभी गम के अंधकार दूर होते हैं।
जब किसी विशेष अवसर पर एक दूसरे से मिलते हैं और मिलकर कार्य करते हैं तब हम अनावश्यक तनाव से दूर रहते हैं। आपसी बैर को भूलकर एक सुखद माहौल का निर्माण करते हैं। समय-समय पर आने वाले यह त्यौहार ही हमारी एकता, अखंडता, सहयोग और सामंजस्य के लिए प्रेरित करते हैं । यही वजह है कि यहां के लोग भाईचारे के भाव का संदेश देते हैं, जिसे अन्य देश के लोग भी अनुकरण करते हैं। जहां प्रेम होता है वहीं मर्यादा, संयम और लगाव होता है और मन के अनुकूल वातावरण का निर्माण होता है।
वैसे तो हम बहुत से त्यौहार मनाते हैं जिनमें कुछ प्रमुख हैं: दशहरा, दीपावली, होली, सावन, मकर संक्रांति, रक्षा बंधन आदि। इसी प्रकार विभिन्न त्यौहार मनाकर हम जीवन में मिठास घोलते हैं, सभी का अपना महत्त्व है। वैसे ही एक पर्व है अक्ती पर्व। यह अक्षय तृतीया के दिन मनाया जाने वाला लोकपर्व है, जिसे छत्तीसगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में ‘अक्ती’ कहते हैं। यह विवाह का एक संस्कार है जिसे बच्चे खेल-खेल में सीखते हैं। मिट्टी के गुड्डे-गुड़िया का विवाह पूरे रीति-रिवाज से किया जाता है। सुबह से बच्चों के साथ बड़े भी इसकी तैयारी करते हैं, विवाह मंडप बनाकर इसमें गुड्डे-गुड़िया को बिठाकर विवाह का पूर्ण वातावरण तैयार करते हैं।
गुड्डे-गुड़ियों के खेल से बच्चे खुद को भविष्य के लिए तैयार करते हैं और उनमें पारिवारिक ज़िम्मेदारी का बोध होता है। प्रेम, स्नेह, दुलार, करुणा, क्षमा, दया के भाव एक दूसरे के साथ रहकर सीखते हैं । पारिवारिक वातावरण का हर किसी के जीवन पर प्रभाव पड़ता है। बेटियाँ अपनी माँ को देखकर छोटी उम्र में ही साड़ी पहनना, झाड़ू-पोंछा करना, बर्तन धोना, कंघी करना, तैयार होना, घर चलाना सीखती हैं और उनकी नकल करती हैं। इस प्रकार वो रिश्तों को निभाना, उन्हें संबोधित करना जानती हैं।
गुड्डे-गुड़ियों के खेल से बच्चे रिश्ते-नाते से परिचित होते हैं। आपस में मिलकर सभी बच्चों की टोली पारिवारिक जिम्मेदारियां को खेल के रूप में निर्वहन करती है, जिसमें कोई माता-पिता, भाई, चाची-चाचा बनते हैं, तो कोई घर के मुखिया बनकर सभी को मार्गदर्शन देते हैं । बच्चे वैसा ही खेलते हैं जैसा घर का वातावरण होता है । जो बच्चे देखते हैं उसी को खेलते और कहते हैं । गुड्डे-गुड़ियों के खेल से वे हकीकत की दुनिया में जीने की कला का निर्माण करते हैं । अक्ती पर्व के दिन भारतीय संस्कृति के अनुसार वैवाहिक परंपरा की झलक दिखाई देती है, जिसमें विवाह के संस्कारों को पूरे किए जाते हैं। गुड्डे-गुड़ियों के माध्यम से चूलमाटी, बारात निकालना, तेल-हल्दी, मायन, सामूहिक भोज और टीकावन करते हैं । पूरे नियम से विवाह संस्कार को पूर्ण करने के कारण वे अपनी संस्कृति से परिचित होते हैं ।
आज बहुत से तीज-त्यौहार लुप्त होते जा रहे हैं, जिन्हें सिर्फ औपचारिकता के रूप में मनाया जाता है। आज के बच्चे अधिकतर पर्व को नहीं जान पाते । पर, जरूरी है हर पर्व के ऐतिहासिक और पौराणिक महत्त्व को जानना । इसके लिए परिवार, पड़ोस, समाज और विद्यालय को जागरूक होना पड़ेगा और प्राथमिकता से हर जगह एक उत्सवपूर्ण माहौल का निर्माण कर उनमें रूचि उत्पन्न करनी होगी । सबसे पहले हम अपनी मानसिकता बनाएं: जैसा वातावरण हम उन्हें देंगे, जो वे देखेंगे उसी की वे नकल करेंगे।
हम कहते हैं आज बच्चे बिगड़ गए हैं, जो उचित नहीं है। जब घर के बड़े ही मोबाइल में व्यस्त हैं, तो बच्चे क्या करें..! कहां खेलें, किसके साथ रहें..? इस बात की जानकारी उन्हें देनी होगी। मानसिक विकास के लिए कई खेल हैं । अगर समय निकालकर परिवार के साथ हम समय व्यतीत करें तो बच्चों में क्रांतिकारी परिवर्तन आएंगे और वे स्वस्थ, फुर्तीले, साहसी और मजबूत बनेंगे। अभिभावक आने वाली पीढ़ी को अगर सही दिशा देंगे तो वे आज्ञाकारी, सेवाभावी, देशभक्त संतान के रूप में हमारे सामने होंगे। जरूरत है तो प्राचीन जीवन के अच्छे संस्कारों के अनुसार उन्हें ढालने की। जब बड़े ही किसी त्यौहार के नियम-परंपरा को नहीं जानेंगे, उसके महत्व को नहीं पहचानेंगे, तो बच्चे कैसे सीखेंगे..?
आज के बच्चे ही सुखद भविष्य के निर्माणकर्ता हैं। उनके कंधों पर ही जिम्मेदारी होगी। आज हम देखते हैं कि बड़ों के साथ छोटे भी अति व्यस्त नजर आते हैं । एक साथ होकर भी वे एक-दूसरे के साथ नहीं होते । आज बच्चे खेल खेलना भूल गए हैं। एक कोने में बैठकर मोबाइल चलाते हैं। मोबाइल में विभिन्न प्रकार के प्लेटफार्म हैं जिसमें वे अपना सारा समय व्यतीत करते हैं, जिसकी वजह से न तो रीति-रिवाज को जानते हैं, न मर्यादा, न संस्कार, न संयम है। वे एक अलग ही दुनिया में रहते हैं, जहां बड़ों का सम्मान भूल जाते हैं। इसलिए हर घर में एक नैतिक वातावरण का निर्माण करना जरूरी है, जहां बचपन में बच्चों को खेल-खेल में जीवन की विभिन्न समस्याओं से जूझने की कला सिखा सकें। खेल बच्चों के जीवन का गहना है। जितना ज़्यादा वे खेलते हैं उतने ही शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से मजबूत होते हैं । जो बच्चे खेल में रुचि रखते हैं, वे प्रसन्नचित्त होते हैं, उनका समुचित विकास होता है । इसलिए हर माता-पिता को अपने बच्चों को खेल खेलने के लिए प्रेरित करना चाहिए…गुड्डे-गुड़ियों का खेल एक प्राचीन परंपरा है जिसमें वे भावनात्मक रूप से एक दूसरे से जुड़ते हैं, साथ ही उनमें सामाजिक गुण विकसित होते हैं । वे समस्या-समाधान के बारे में जानते हैं । मनोरंजन के साथ ही उनकी सूझ-बूझ बढ़ती है । बचपन जीवन का सबसे प्यारा दौर होता है, इसलिए इसका भरपूर आनंद लेना चाहिए।
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