डॉ0 हरि नाथ मिश्र, अयोध्या
(नया अध्याय, देहरादून)
परशुराम
श्री परशुराम जयंती एवं अक्षय तृतीया के उपलक्ष्य में लिखे गए दोहे-
परशुराम जमदग्नि-सुत, शंकर-प्रिय अभिराम।
वंशज भृगु मुनि के रहे, लीला- ललित-ललाम।।
मातु-नाम है रेणुका, भ्राता पाँच महान।
सबसे लघु भ्राता परशु, रहे पिता की शान।।
पिता-प्रेम में हो मगन, वधे स्वयं निज मात।
मुदित पिता से पुनि किए, प्राण-दान की बात।।
परशुराम श्रीराम इव, विष्णु-रूप-अवतार।
हुए धरा पर अवतरित, अक्षय तृतीया वार।।
त्रेता से द्वापर तलक, परशु-काल-विस्तार।
कलियुग में भी आगमन, कल्कि-नाम-अवतार।।
किए शंभु-धनु भंग जब, त्रेता में प्रभु राम।
होकर अति क्रोधित परशु, पहुँचे मण्डप-धाम।।
परशुराम श्रीराम मिल, किए कार्य अनुकूल।
विष्णु-रूप दो शक्ति का, मेल न हो प्रतिकूल।।
धेनु-पिता प्रतिशोध में, कर क्षत्रिय-कुल-नाश।
किए थापना धर्म की, महि से ले आकाश।।
गिरि महेंद्र आवास है, जन्म नर्मदा-तीर।
शस्त्र फावड़ा अति प्रखर, परशुराम बहु वीर।।
परशुराम ऋषि आठवें, हैं सप्तर्षि समान।
यही तृतीया अक्षया, तिथि है परम महान।।






