अक्षय तृतीया,गर्मी, मटका और बचपन की यादें…

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पवन वर्मा

 

          (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

अक्षय तृतीया,गर्मी, मटका और बचपन की यादें…

 

 

गर्मी की दोपहर, घर में रखे मटके के पास झुककर पानी पीना। यह सिर्फ प्यास बुझाने का काम नहीं था, यह एक पूरा अनुभव था। बचपन की यादों में यदि सबसे ठंडी चीज़ कोई है, तो वह न तो बर्फ है, न फ्रिज, वह है मिट्टी के मटके का सोंधापन। बचपन में एक कविता पढ़ी थी- “चल रे मटके टम्मक टूँ,तेरा पानी पीवे कूँ…” तब यह सिर्फ एक बाल कविता लगती थी, लेकिन आज समझ आता है कि वह कविता नहीं, जीवन का हिस्सा थी। जब फ्रिज नहीं, मटका ही संसार था आज के बच्चों को शायद यह समझाना मुश्किल है कि एक समय ऐसा भी था जब घरों में फ्रिज आम नहीं थे। गर्मियों में ठंडे पानी का एक ही सहारा होता था, मटका।

 

हमारे यहां तो एक परंपरा थी अक्षय तृतीया के दिन नया मटका जरूर आता था। जैसे यह कोई सामान नहीं, बल्कि घर का नया सदस्य हो। मिट्टी की खुशबू लिए वह मटका जब पहली बार पानी से भरा जाता था, तो लगता था जैसे गर्मी पर एक छोटी-सी जीत मिल गई हो। कई बार मटके के साथ एक सुराही भी आ जाती थी। पतली गर्दन वाली, और भी ज्यादा ठंडा पानी देने वाली। मटके को भरकर उसकी पूजा होती थी, मटके पर स्वस्तिक बनाया जाता था। उसके बाद नए मटके का पानी पीने को मिलता था। वह पानी पीना एक आदत नहीं, एक सुकून था।

 

खरबूजे का शरबत और आंगन की ठंडक

 

अक्षय तृतीया का मतलब सिर्फ नया मटका नहीं होता था। उस दिन घर में खरबूजे का शरबत और चने का सत्तू भी बनता था। मटके के साथ ही खरबूजा भी आता था। उसके छोटे छोटे टुकड़े कर, शक्कर मिलाकर मटके के आसपास रख दिया जाता था। मटके की पूजा के बाद, बतौर प्रसाद सत्तू और खरबूजा मिलता था। उसका स्वाद… आज भी किसी महंगे जूस या ड्रिंक में नहीं मिलता।

कटोरी भरकर जब वह शरबत हाथ में आता था, तो लगता था जैसे गर्मी थोड़ी कम हो गई है।

इधर बचपन मे पढ़ी कविता का मतलब, जो अब समझ आता है। तब तो “चल रे मटके टम्मक टूँ…” सिर्फ रटने की चीज थी। आज लगता है, वह कविता मटके से एक संवाद थी। “तेरा पानी पीवे कूँ…” यह सिर्फ एक पंक्ति नहीं थी, यह उस भरोसे की बात थी जो हम मटके पर रखते थे, कि वह हमारी प्यास जरूर बुझाएगा। “सबकी प्यास बुझावे तू…” यह एक सच्चाई थी। मटका कभी भेदभाव नहीं करता था। घर के हर सदस्य, मेहमान, राह चलता कोई भी, सबके लिए पानी एक जैसा ही होता था। आज आरओ और फ्रिज के ठंड़े पानी में न वह आत्मीयता बची न ही वह सौंधी सी मिठास।

 

50 की उम्र में भी वही सोंधापन

 

बचपन से लेकर अब 50 की उम्र तक, बहुत कुछ बदल गया है। घर बदल गए, शहर बदल गए, सुविधाएं बढ़ गईं। फ्रिज, कूलर, एसी सब आ गए लेकिन एक चीज़ आज भी वैसी ही लगती है। नए मटके के पानी का सोंधापन। आज भी जब कभी नया मटका घर में आता है, और उसमें पहली बार पानी भरकर पीते हैं, तो एक अजीब सा अपनापन महसूस होता है,जैसे बचपन फिर से लौट आया हो। तब मटका सिर्फ एक बर्तन नहीं था। वह घर की रसोई का हिस्सा था और गर्मियों का सबसे भरोसेमंद साथी। वह हमें सिखाता था कि सादगी में भी सुकून होता है। मिट्टी से जुड़कर भी ठंडक मिलती है। आज की पीढ़ी के लिए ठंडा पानी मतलब फ्रिज है। उन्हें शायद यह एहसास ही नहीं है कि मटके का पानी सिर्फ ठंडा नहीं होता था, उसमें एक खुशबू होती है मिट्टी की, घर की, अपनेपन की। वह पानी सिर्फ प्यास नहीं बुझाता, वह दिल को भी ठंडक देता है।  (विनायक फीचर्स)

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