कवयित्री
सरोज कंसारी
नवापारा राजिम
रायपुर (छ.ग.)
(नया अध्याय, देहरादून)
अक्ति पर्व विशेष
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गुड्डे-गुड़ियों के खेल से
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गुड्डी ने कहा माँ मुझे गुड्डा दिला दे
विवाह के लिये मंडप आज बना दे
हल्दी के रंग अपने हाथों से लगा दे
मुझे आज सोलह श्रृंगार तू करा दे।
चूड़ी, बिंदी व हाथों में मेहंदी रचा दे
इस गुड़िया रानी को दुल्हन बना दे
गुड्डे से मेरी आज तो ब्याह रचा दे
आज मुझे तू प्रीत की रीत सीखा दे।
मुझे भी परम्पराओं के दर्शन करा दे
अपनी आँचल की परछाई बना दे
ढोल, नगाड़े और शहनाई बजवा दे
मेरी सखी सहेलियों को निमंत्रण दे।
त्याग,तपस्या और समर्पण सीखा दे
हर इम्तिहां के लिये तैयारी करा दे
सात फेरो के वचन हैं क्या ये बता दे
दिल से आज आशीर्वाद मुझे तो दे।
सभी रिश्ते-नातों से अवगत करा दे
कन्यादान महादान हैं सब को बता दे
सपनो में मेरी खुशियो के पंख लगा दे
इस अजनबी जग से परिचय करा दे।
संस्कारों की मुझे भी चोला पहना दे
ग़मो के हर घूँट को पीना भी सीखा दे
भारतीय संस्कृति की झलक दिखा दे
माँ मुझे अपनी जैसी ही प्यारी बना दे।
माँ,बहू,अर्धांग्नी के फर्ज आज बता दे
ममता स्नेह व करुणा की मूरत बना दे
सब्र की बांध न टूटे सहनशील बना दे
गुड्डे-गुड़ियों के खेल से हर रस्म बता दे।।
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