राजेंद्र रंजन गायकवाड़
साहित्यकार एवं
सेवा-निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
दिल की धड़कन थम सी गई है,
आग बरस रही आसमान से,
सूरज ने धरती को चूल्हे पर चढ़ाया,
सुलग रही है जमीन, अंगारों पे।
शहरों में पिघल रहे तार,
सड़कें लावा उगल रही हैं,
लोग छाँव ढूँढते फिर रहे,
मौत नाच रही हर साँस में।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र की धूल,
चित्तौड़गढ़ से लेकर विदर्भ तक,
लू का तूफ़ान उठा है ऐसा,
जैसे क़यामत आ गई हो कहीं से।
पानी की बूँद भी, तरस रही,
भूजल सूखा, नदियाँ हैं मुरझाईं,
प्रकृति रो रही है चुपके से
इंसान ने लूट लिया सब कुछ से।
ओ ! मेरे हमदम मेरे हमसफर,
अब वक्त है संभलने का,
पेड़ लगाओ, पानी बचाओ,
वरना बरसती लू हमें निगल जाएगी,
बढ़ती गर्मी हैवानी कहानी बन जाएगी।







