आत्मा की तृप्ति और जीवन का आधार है जल !

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका

अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति

 गोबरा नवापारा/राजिम,

  रायपुर, (छ.ग.)

 

                  (नया अध्याय, देहरादून)

 

                               आलेख –

      आत्मा की तृप्ति और जीवन का आधार है जल !

                    : सुश्री सरोज कंसारी 

 

जल के बिना जीवन कहां संभव है? इसलिए एक बूंद को भी न करें बर्बाद।

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तपती दुपहरी में पैदल दूर से सिर पर घड़ा रखकर पानी लाना पड़ता है। शायद यह दृश्य सभी ने देखा है। आज भी लोग लाते हैं। जहां जल पर्याप्त मिल रहा है वहाँ के लोगों को आभास नहीं है कि जल की हर बूंद जीवन के लिए कितनी ज़रूरी है। बस हम अपनी धुन में जिएं जा रहे हैं और प्रकृति की हर चीज का दोहन किए जा रहे हैं। बैठकर सोचने की फुर्सत नहीं है कि अगर हमें शुद्ध हवा और पानी मिलना बंद हो जाए तो क्या होगा? और यह सिर्फ कल्पना नही बल्कि हकीकत है। मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। लेने और देने से प्रकृति में संतुलन बना रहता है। यह सृष्टि का नियम है। लेकिन अगर हम सिर्फ लेते रहे और कुछ दे नहीं, तो एक दिन वो चीज समाप्त भी होगी। इसमें कोई दो मत नहीं। वैसे ही आज हम जंगल से लाभ ले रहे हैं: हवा, फल, फूल, लकड़ी, सब्जी, दवाई, छाया और भी अनंत उपकार हैं हम पर। लेकिन जिस मात्रा में हम पेड़ों को काटकर महल बना रहे हैं, उसी अनुपात में पौधे क्या लगाते हैं? शायद नहीं। जबकि वर्षा के लिए पेड़ो का होना जरूरी है जिन्हें हम बेदर्दी से काट रहें हैं।

 

प्रकृति के पंच तत्वों से यह तन बना है। हम अपनी आवश्यकताओं के लिए उस पर निर्भर हैं, लेकिन हम क्या कर रहे हैं? अपने स्वार्थ के लिए उसको नुकसान पहुंचा रहे हैं। नदी को दूषित कर रहे हैं। आज सिर्फ दूर तक जीवनदायिनी नदी में रेत ही रेत दिखाई देती है। अब दूर तक पानी की धारा प्रवाहित नही होती। गंदगी के ढेर ही दिखते हैं। परन्तु मनुष्य की लापरवाही से वह पूरी तरह दूषित हो रहीं है, जिसके जिम्मेदार कोई नही, सिर्फ हम हैं। हम लिप्त हैं अपने भोग विलास में और नदिया अपने संरक्षण के लिए मानव को पुकार रही हैं। लेकिन हम सुन नहीं रहे हैं, जिसका अंजाम हम स्वयं भुगत रहे हैं। दूषित जल पीकर विभिन्न गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं, फिर भी कहां समझते हैं? लेकिन अति का एक दिन अंत तो होना ही है।

 

सोचिए! अगर नदी नाले पूरी तरह सूख जायेंगे और पीने लायक जल नहीं बचेंगे तो हम कहां होंगे? फिर भी इतनी सी बात को हम कहां समझ पाते हैं। उसे प्रदूषित किए जा रहे हैं। उसे हम अपने हाथो से ही विषाक्त बना रहे हैं। कैसी विडंबना है मनुष्य जीवन की। जानते तो सब हैं लेकिन करते नहीं।

 

जब कोई चीज बाजार में महंगी मिलती है और वो जीवन जीने के लिए जरूरी हो तो हम उसे हर हाल में खरीदते हैं। नाप तौलकर जब कोई चीज मिलता है तो उसकी कीमत हम जानते हैं। उसका उपयोग सोच समझकर करते हैं क्योंकि पता है कि ज्यादा खर्च करने पर फिर मिल पाना संभव नहीं, इसलिए बचत करके चलते हैं। जैसे कुछ दिन पहले टमाटर की किमत बढ़ गई थी, जो सामान्य दिनो में दस रुपए किलो मिलते थे। आवक कम होने से कीमत बढ़ गई, तो जिसे सौ रूपए मे खरीदकर लाने के लिए मजबूर हुए। लेकिन जब सस्ती हो जाती है तो मनमाने उपयोग करते हैं, इज्जत नही कर पाते। वैसे ही जल अभी हमें मुफ्त में मिला रहा है, इसलिए उसे मनमाने बर्बाद कर रहे हैं। मजा आ रहा है। उसके संरक्षण के कोई उपाय नहीं करते, क्योंकि अभी हमें कहीं न कही से पर्याप्त मिल जा रहा है। लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जब धरती पर जल मिलना बंद हो जायेगा। एक एक बूंद के लिए तड़पेंगे, तभी उसकी कीमत जानेंगे। तब क्या होगा? हम अपने जीवन को कैसे बचा पाएंगे? जबकि उसे तो हम आज विषैला बना ही रहे हैं।

 

काश! समय रहते समझ जाएं तो कितना अच्छा हो। आने वाली पीढ़ी को हम शुद्ध और पर्याप्त जल दे पायेंगे। उन्हें जल संरक्षण के प्रति जागरुक करें, संरक्षण के हुनर सिखाइए। भविष्य के लिए जल को संरक्षित कर लेंगे तो यह एक महान कार्य और कदम होगा। आज भी बड़े महानगरों मे जाकर देखिए, पानी की कमी है। वहाँ लोग खरीदकर उपयोग करतें हैं, समझदारी से उपयोग करते हैं। लेकिन चूंकि हमें मुफ्त में मिला है तो भरपूर उपयोग करते हैं। उसे संभालने की क्षमता नही होती। बताने पर भी जिम्मेदारी नहीं समझते। वह दिन दूर नही जब हम भी उसे खरीदकर उपयोग करेंगे।

 

जल है तो ही इस धरती पर मानव जीवन का अस्तित्व है, सभी का जीवन सुखी है और हर कार्य सुव्यवस्थित हो रहे हैं। जल ही जीवन का प्रमुख आधार है। इसके बिना जीवन की कल्पना व्यर्थ है। समस्त जीव जगत के लिए जल की हर एक बूंद कीमती है। इस धरा पर 70 प्रतिशत जल है। जल जीवन के हर पल की जरूरत है। पीने योग्य जल हमें नदी, तालाब, वर्षा के पानी से मिलते हैं। भूमि से भी जल प्राप्त होते हैं। आज मानव अपने स्वार्थ के लिए इसे बेदर्दी से दूषित कर रहे हैं, साथ ही इसका दुरुपयोग हो रहा है। जल का संरक्षण बेहद जरूरी है, नहीं तो भविष्य में जल के लिए तरसना पड़ेगा। आने वाली पीढ़ी के लिए उसे सहेजना है तो जल के महत्त्व को समझना पड़ेगा और उसके संरक्षण के उपाय के साथ ही सदुपयोग करना ज़रुरी है।

 

आज हम देखते हैं कि जल का बहुत उपयोग करते हैं, बर्बाद करते हैं। लेकिन जल संकट का सामना जिस दिन करना पड़ेगा उसके अंजाम से हम सभी अनजान हैं। मनुष्य आज सुविधा भोगी हो गए हैं। हर चीज आसानी से मिल जा रही है तो उन्हें किसी चीज के लिए मोहताज नहीं होना पड़ता। लेकिन आज भी कई ऐसे स्थान हैं जहां जल के उचित साधन नही हैं, जहाँ लोग गंदे दूषित पानी पीने के लिए विवश हैं। जहां सूखा ग्रस्त क्षेत्र है वहां की महिलाएं बहुत दूर से पानी भरकर लाती हैं, घड़े में। सोचिए हम कितने लापरवाह हैं। कोई जिम्मेदारी नहीं, और जिनके पास नहीं है वे इसके लिए परेशान हैं। पर हम कब तक नही समझेंगे? जब पानी मिलना ही बंद हों जाएगा, कोई स्रोत नहीं होंगे, नदी नाले सूख जायेंगे, तब क्या होगा? अगर हम आज नहीं समझेंगे तो आने वाले समय में निश्चित ही हम सभी को जल संकट का सामना करना पड़ेगा, जो कि भयंकर होगा।

 

आज अपने लिए हम सब कुछ जुगाड करने में लगे हैं, लेकिन प्रकृति के साएं में मनुष्य जीवन का अस्तित्व जुड़ा है, इस पर विचार नहीं करते। पेड़ पौधे को काट रहे हैं। फल, फूल, लकड़ी, औषधि, छाया और वर्षा का जो साधन हैं उसे उजाड़ने में संकोच नहीं करते। जब संरक्षण के उपाय नहीं करेंगे तो हमें सांस लेने के लिए शुद्ध वायु कैसे प्राप्त होगी ? वर्षा नहीं होगी तो जल कैसे प्राप्त कर पाएंगे? उजाड़ना आसान है लेकिन संवारना मुश्किल। शुद्ध वायु कहा से मिलेंगे? वर्षा नहीं होगी तो जल कैसे संभव हो पाएगा?

 

जल इस विशाल धरती की अमूल्य संपत्ति है, जिसके संरक्षण के लिए हमें जागरुक, सतर्क और सक्रिय होना जरूरी है। हर किसी को जल को बचाने का प्रयास करना जरुरी है। जल हमारी पृथ्वी की अमूल्य धरोहर है। किसी एक पर निर्भर होकर ही जल का संरक्षण संभव नहीं। मनुष्य ही जल को दूषित करते हैं, लेकिन अपने अस्तित्व को जीवित रखना है तो ‘जल ही जीवन है‘ मानकर आज से ही उसका सदुपयोग कीजिए और उसके संरक्षण के हर संभव प्रयास कीजिए। ऐसे कोई उपाय करें जिससे भूमि में जल की मात्रा अधिक मात्रा में बढ़े। बेवजह जल को बर्बाद होने से रोकें। जितना जरुरी है उतना ही उपयोग करें, जिससे भूमिगत जल की मात्रा भी बढ़े।

 

वर्षा के जल को किसी माध्यम से संग्रहित रखें। अंधाधुंध पेड़ो की कटाई पर रोक लगे। अधिक से अधिक पौधारोपण करें। कारखानों के दूषित जल को नदी में न मिलने दें, उसे अलग से प्रवाहित करें जिससे नदी का जल दूषित न हो। नदी में कचरा, गंदगी करना बंद करें। अस्थि विसर्जन पर कड़ाई से प्रतिबंध हो। पशु को नदी में जाने से रोकें। प्लास्टिक का उपयोग पूर्णतया बंद करना होगा। कहते हैं कि तीसरा युद्ध जल के लिए होगा। उसमें कोई संदेह नहीं। अगर इसी तरह जल को दूषित करने में लगे रहेंगे, उसे बर्बादी से नही रोक पाएंगे, फिर तो धरती में पीने लायक जल ही नही बचेगा। आज हम देखते हैं कि तापमान कितना अधिक है, जिससे नदी नाले सूख रहे हैं। इसलिए अब भी न जागे तो इस धरा में जल के लिए एक दिन हाहाकार मच जाएगा और हम अपनी ही करनी पर पछतावा करेंगे। इसलिए ज़रुरी है समय रहते इस पर चिंतन करें और जल की शुद्धता और संरक्षण पर ध्यान दें।

 

हर मनुष्य अपने जीवन की रक्षा के लिए विभिन्न प्रयास करते हैं। अपने लिए रोटी, कपड़ा, मकान और अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति करतें हैं, लेकिन जो जीवन के लिए जरुरी मूल तत्व हैं उसकी उपेक्षा करते हैं। अपने जीवन के लिए जुगाड करते हुए यह भूल जाते हैं कि जो हर पल हमारे लिए जरुरी हैं, प्रकृति से मिलते हैं, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी हमारी है। वैसे तो हम बच्चों को बहुत सी सीख देते हैं, वैसे ही उन्हें जल के महत्त्व को भी बताना चाहिए, क्योंकि हम बचपन में जैसे आदत विकसित करते हैं वो उनके जीवन जीने का अनिवार्य अंग बन जाता है।

 

हर मनुष्य के मन में जल के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए क्योंकि जल जीवन के लिए जरुरी है। हम जिस देश के नागरिक हैं उसके प्रति हमारी भी कुछ जिम्मेदारी है। आने वाली पीढ़ी में भी जल के संरक्षण के लिए समर्पण भरना जरुरी है, क्योंकि आज जीवनदायिनी नदी को हम अपने ही हाथो दूषित करके अपने ही स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहे हैं। आधुनिक औद्योगिक क्रांति के चलते शुद्ध जल मिल पाना बहुत मुश्किल हो गया है। इसके लिए वृहद स्तर पर अभियान बनाने, उनके क्रियान्वयन करने के लिए रणनीति और आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है। दैनिक दिनचर्या में हर पल जल की आवश्यकता होती है: भोजन बनाने, नहाने, कपड़ा-बर्तन धोने, पौधों के बढ़ने, पीने के लिए, आग को बुझाने के लिए भी जल की जरूरत होती है।

 

जल के बिना हम तड़प जायेंगे। परमात्मा ने हमें जीवन दान दिया, उसकी रक्षा की जिम्मेदारी भी हमारी है। जल का सदुपयोग और संरक्षण कर हम पुण्य कर्म की शुरुवात कर सकते हैं और उसके लिए अन्य सभी को प्रेरित कीजिए। यह एक महान कार्य है।

 

आत्मा की तृप्ति और जीवन का आधार हैं जल, जिसके बिना मानव जीवन का अस्तित्व नहीं। कल्पना कीजिए, जल न हो तो क्या होगा? जल के अभाव में यह सुंदर धरती बंजर भूमि न होती ? विकास की दौड़ में हम भाग तो रहे हैं लेकिन जो जीवन के लिए जरुरी है उस अमूल्य जल को संरक्षित करने के कोई ठोस उपाय नहीं कर रहे। यही हाल रहा तो आने वाले समय में जल की एक बूंद के लिए हाहाकार मच जाएगा। जल हमारे लिए बेहद आवश्यक है। जल को कल के लिए संरक्षित करना जरुरी है, जिसके लिए जल को प्रदूषण से बचाना, उसके लिए योजना बनाना, मीठे जल के लिए आवश्यक कार्य योजना बनाने की जरूरत है। पानी की हर बूंद को बर्बाद होने से बचाने के लिए जागरूकता के साथ ही भविष्य में इसके संरक्षण के लिए चिंतन जरूरी है।

 

जल संकट आज सबसे बड़ी चुनौती है जिसके कई कारण हैं: जंगलों की कटाई, वृक्षारोपण न किया जाना, जनसंख्या वृद्धि के कारण अधिक उपयोग होना, बड़े-बड़े उद्योग द्वारा जल को प्रदूषित करना। जल के कारण ही हरियाली है, प्रकृति की सुंदरता है, लहलहाते फसल हैं। इस धरती पर समस्त जीव जंतु का अस्तित्व है। आज मनुष्य की लापरवाही का ही परिणाम है कि जल प्रदूषित हो रहा है। स्वच्छ जल का अभाव है। दूषित जल से स्वास्थ्य पर बुरा असर होता है, विभिन्न बीमारियां जन्म लेती हैं। जल का उपयोग सही रूप में करें। इसकी बर्बादी को रोकना मानवीय गुण है। नहाने, कपड़ा धोने, भोजन बनाने, खेती में, बागवानी में जितना जरुरी है उतने ही उपयोग करें। फिर नल बंद करें। नल, पाइप, उसकी टोटी को चेक करें। अनावश्यक बहते पानी को रोकने के आवश्यक उपाय करें। कचरे को कूड़ेदान में डालें।

 

एक दिन नल न आने पर या कम आने पर कितनी परेशानी होती है। गुस्सा करते हैं, चिड़चिड़ाते हैं। जल के बिना आवश्यक काम बाधित होता है। एक दूसरे को पूछते हैं “आपके घर पानी है? दूसरी जगह से पानी लाने के लिए दौड़ते हैं। सब भीड़ जाते हैं..पानी भरने। लेकिन जब आसानी से पानी की पूर्ति होती है तो क्या करते हैं? उसे जरूरत से ज्यादा उपयोग करते हैं, महत्व नही समझते, अनावश्यक बहाते हैं। पानी के लिए झगड़े होना आम बात है। लेकिन आज भी न समझे तो कल मानव का अस्तित्त् ही मिट जाएगा जल के बिना।

 

जल न हो तो सारा जग सूख जाए। इस एक पंक्ति से जल की महत्ता प्रदर्शित हो रहीं है। इससे सुंदर, सरल और सहज रूप में जल की महिमा को बखान नही कर सकते। सीधी सी बात है, आग लगने पर उसे बुझाने के लिए जल न हो तो सब जल जायेगा। स्वाभाविक है, अगर कहीं आग लग जाए तो हम कैसे घबरा जाते हैं कि कहीं अनहोनी न हो जाए। भागकर पानी की व्यवस्था करते हैं ताकि दूर तक आग न फैले, इसलिए त्वरित काम करते हैं। भीड़ एकत्रित हो जाती है ताकि किसी को नुकसान न हो, इसलिए उसके लिए इंतजाम करते हैं। पानी की अनुपस्थिति में आगजनी की घटनाएं भयावह होती रहती हैं। सोचिए! आग लग जाए..और उसे बुझाने के लिए पानी न हो तो क्या होगा? समझना तो हम सभी को है कि जल न होने से सिर्फ नुकसान है और जल से ही संसार सुखी-समृद्ध है । इसलिए अपनी जिम्मेदारी निभाते चलें…जल को बचाते चलें।

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