राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, देहरादून)
____________________
तटस्थता मारती है सभी को.
____________________
हार-जीत में भिन्न होता ही क्या है
कोई दो कदम आगे, कोई दो कदम पीछे
बीच में फिर-फिर वही रिक्तताएँ अपार
और फिर-फिर वही अतिरिक्तताएँ विचित्र
जो नहीं मित्र, जो नहीं शत्रु वे भी वहाॅं
मिलते हैं हाजिर-नाजिर देखने को तमाशा
किसी भी युद्ध-उत्सर्ग में बाधक हैं वे ही
हार-जीत में भिन्न होता ही क्या है
तटस्थता मारती है सभी को.
____________________
बेबस बस्तियाँ नहीं हों राख.
____________________
इतना उपहास भी ठीक नहीं
कि खुदक़ुशी पर आमादा हो जाये वह
जो अभी-अभी छत पर उड़ाता है पतँग
पतँग का कट जाना एक खेल,एक दौर है
लज्जित करने या लज्जित होने जैसी
हर किसी चक्रव्यूह में भी होती है हद
छोड़ देते हैं एक रास्ता दफा हो जाने का
अलाव उतना ही होता है बेहतर
कि सर्द-देह को कुछ चलने जैसा
और कुछ युद्ध-मैदानों में लड़ने जैसा
स्वाभिमान भरा वीरोचित्-ताप दे सके
बस,बेबस बस्तियाॅं नहीं हों राख?
____________________







