सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका
अध्यक्ष : दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा/राजिम,
रायपुर, (छत्तीसगढ़)
(नया अध्याय, देहरादून)
लेख –
अपना चरित्र इतना साफ रखो कि तुम्हें देखकर, सुनकर या साथ रहकर लोगों की नीयत खुद-ब-खुद सुधर जाए।
: सुश्री सरोज कंसारी
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अच्छाई बढ़ाओ। पानी कीचड़ में गिरकर भी बहते-बहते खुद को साफ कर लेता है। हम भी हालात कैसे भी हों, भीतर की सफाई न खोएं तो दूसरों के लिए भी रास्ता बन जाते हैं।
जीवन का उद्देश्य जब सांसारिक सुख से परे हो जाता है, तब हम परम आनंद की खोज करते हैं। ऐसे आनंदित जीवन की, जो बाहरी विडंबनाओं से अलग हो। आत्मिक प्रेम की, जो भागदौड़ भरी इस दुनिया में हमारी अनंत इच्छाओं का अंत कर हमें शांत और संतुष्ट जीवन प्रदान कर सके।
आज हम सिर्फ भटक रहे हैं, उस सुख की चाह में जहाँ मोह-माया, भोग-विलास, काम-क्रोध, नफरत-षड्यंत्र, झूठ-छल और ईर्ष्या का एक जाल बिछा है। जहाँ हम पूरी तरह कैद हैं। चाहकर भी नहीं निकल पा रहे हैं। बस अनंत वेदनाओं के साथ ही जीवन यापन कर रहे हैं। अपने और पराए के बीच उलझे हैं। मन की व्याकुलता आत्म-कल्याण के मार्ग में बाधक है। जीवन की परेशानियों का सामना करते, भागते-जूझते और फिर माया के दलदल में गिर जाते हैं।
इस सांसारिक जीवन में बहुत कराह, चीख और दर्द है। मन अधूरी ख्वाहिशों और लगाव को छोड़ नहीं पा रहा। इच्छाएँ अनंत हैं। जीवन के श्रेष्ठ कार्य को भूलकर हम बस पाने की होड़ में शामिल हैं। स्वार्थ से भरे अपने सुख के लिए भावनाओं को आहत कर रहे हैं। विधाता की इस सुंदर रचना को जानना, समझना और मानसिक शांति के प्रयास जरूरी हैं।
जितना जल्दी हम दूसरों से उम्मीद छोड़कर श्रेष्ठ कर्म, आत्म-सुधार, परोपकार, धर्म-नैतिकता और प्रेम की राह चलेंगे, तभी इस मायावी जंजाल से मुक्त हो पाएंगे। स्व-सुख का त्याग और दूसरों के हित में समर्पण भाव के बिना जीवन साकार नहीं होता। इस सांसारिक जीवन में रहते हुए रिश्तों में गहराई रखिए। आत्मिक बंधन जो अटूट हों, जिनमें आपसी सहयोग, समंजस्य, मित्रवत भाव, निभाने की चाह और एक मीठा सा एहसास हो, जिसे कोई भी मजबूरी तोड़ न पाए। परिस्थितियाँ बनती-बिगड़ती रहती हैं। फर्ज की राहों पर चलकर निभाना सीखिए। हमेशा जोड़ना सीखिए।
परम आनंद की खोज कर जीवन को धन्य करें। बाहरी सुख के लिए आंतरिक कलह को बढ़ावा मत दीजिए। अंतर्मन के शोर से बाहर निकलिए। खुद को बनाना और बिगाड़ना आपके हाथ में है। अच्छे कर्म से अपने हर पल को सुखद बनाइए।
अपने जोश, जुनून और समस्त ऊर्जा को सही कार्य और सही लोगों पर लगाइए। सच का साथ देकर अपना आत्म-सम्मान बनाए रखिए। बाहर की परिस्थिति हमें कभी-कभी कमजोर बना देती है। जीवन में बहक जाने के कई कारण होते हैं, लेकिन मन की परम शांति का मार्ग आत्म-संयम, ध्यान और प्रार्थना से ही संभव है। मन की अशांति हमें उदास जीवन जीने के लिए विवश करती है। आत्म-उत्थान के लिए सच्ची आस्था, श्रद्धा, भक्ति और अटूट विश्वास जरूरी हैं। बाह्य जीवन से प्रभावित हुए बिना आंतरिक शांति के लिए कार्य कीजिए।
परम सुख को पाने के लिए दिखावा करना छोड़ दीजिए। जैसे भीतर हैं, वैसे ही बाहर रहिए। दुर्भाव मुक्त जीवन जीने की कोशिश कीजिए। जीवन का अर्थ भोग तक सीमित मत कीजिए। खुद की भावनाओं का विस्तार कीजिए। हर उस कार्य में सहभागी बनें..! जो आपको आत्मिक खुशी से भर दे।
किसी से भी जुड़ें, भावनाओं का प्रवाह सुखद हो। आपके सुख, शांति और व्यक्तित्व के विकास में जो भी सहयोगी हों, उनके प्रति आभार व्यक्त कीजिए, सम्मान दीजिए। प्रेम, सहयोग, सहानुभूति बाँटते रहिए।
जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच सामंजस्य बनाकर रखिए। सजग रहिए और जिज्ञासु होकर सीखते रहिए। शांत चित्त होकर अपने जीवन के हर पहलू पर गहन विचार कीजिए। क्या नहीं मिला इस पर ध्यान न दें, क्या पाना है उस पर कार्य कीजिए। जीवन की इस क्षणिक यात्रा को अपने अच्छे व्यवहार से, अद्भुत कार्य से और यादगार बनाइए। लोगों को प्रेरित कीजिए।
अव्यवस्थित जीवनशैली में सुधार कीजिए। जीवन में आकस्मिक दुर्घटनाएँ भी होती हैं जिनमें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक कई तरह के नुकसान होते हैं। लाभ-हानि से ज्यादा प्रभावित हुए बिना जीवन व्यतीत कीजिए। भीतर से इतने शांत और सहज हो जाइए कि बाहर का शोर तुम्हें विचलित न कर पाए। निर्भीक होकर कर्मपथ पर चलिए। अपने खिलाफ हो रही आलोचना, अनावश्यक टीका-टिप्पणी, शिकायत को सुनने, सहने और उससे आगे बढ़ने की क्षमता रखिए।
जब तक साँसें चल रही हैं तभी तक जीवन की खूबसूरती है। जीवित इंसान ही जीवन का आनंद ले सकता है। साँसों की मोहलत कब तक है, चिंता इस बात की मत कीजिए। हर साँस में जिंदगी है, तो क्यों न हम इसे जीवंत बनाएँ? मनुष्य जीवन के हर पल में सुख, समृद्धि और विकास की असीम संभावनाएँ हैं। जीवन की क्षणभंगुरता के बीच हमें इसे उत्साहित होकर जीना है। जीवन की विभिन्न चुनौतियों के बीच ही श्रेष्ठ, सरल और सात्विक बनने की पूरी कोशिश करनी है। जीने की कला एक सतत प्रक्रिया है, इसलिए निरंतर आत्म-सुधार के प्रयास करते रहिए। मूल तत्व को ग्रहण कीजिए और जो आत्मा को शोक, दर्द, भय, संताप, ईर्ष्या, द्वेष से भर दे, उन कारणों को मन-मस्तिष्क से निकाल फेंकिए। इस संसार के हर पग में नवीनता है। अच्छाई-बुराई हर जगह है। कभी किसी परिस्थिति में निराश मत रहिए। जहाँ अधिक शिकायतें होती हैं, वहाँ मन स्वतंत्र नहीं होता। निर्मल होकर इन साँसों में सुखद प्रेम का एहसास भरिए। जो भी करें, उसे आत्मा की गहराई से कीजिए। चाहे रिश्ता कोई भी हो, उसमें पूर्ण समर्पण का भाव हो।
जीवन के इस सफर का आनंद लेने के लिए तैयार रहिए। मोह-माया में जितना कम उलझेंगे, उतने ही अधिक खुश रह पाएँगे। जीवन की डोर अपने हाथ रखिए। अपनी भावनाओं का सम्मान खुद कीजिए।
चाहे दुनिया कैसी हो, लोग कितने बुरे हों, खुद दूसरों जैसा बनने से बचिए। हर साँस के साथ कम हो रही जिंदगी के महत्व को समझिए। वक्त बर्बाद मत कीजिए। मन की हर उलझन को सुलझाते रहिए। कुछ भी भीतर भरकर मत रखिए। शांत रहिए, वक्त का इंतजार कीजिए। किसी के प्रति नफरत मत रखिए। अतीत की कड़वाहट से निकलकर वर्तमान को देखिए। जीवन बहुत सरल होता है..! किन्तु, हमारी बेवजह की सोच उसे कठिन बना देती है। यह मत सोचते रहिए कि सब कुछ आसानी से मिल जाए। कठिनाई से गुजरने की क्षमता रखिए। सीखिए हर किसी से। दर्द के साथ भी मुस्कुराइए। जीवित हैं तो लड़िए हर जंग जिंदगी की। चलते रहिए, अपने आत्म-विकास के कार्य कीजिए। सांसारिक जीवन की व्यथाएँ कभी खत्म नहीं होंगी। आत्म-शांति के लिए मन की शुद्धि आवश्यक है।
दिखावे से दूर रहकर सामान्य से विशेष बनने की दिशा में कार्य कीजिए। अपनी आंतरिक ऊर्जा को सही कार्य में लगाकर परम सुख की प्राप्ति कीजिए। जितना हो सके अपनी क्षमता का उपयोग कीजिए। भावनाओं में बहने की बजाय हिम्मत से काम लीजिए। विभिन्नताएँ जीवन का अंग हैं, हर पग पर बदलाव का सामना करना पड़ता है। बस मानसिक संतुलन स्थापित कीजिए। ज्यादा ज़िद ठीक नहीं। जहाँ आपकी भावनाएँ आहत हों, उन लोगों से दूरी बना लीजिए। अपनी उन आदतों को छोड़ने की पूरी कोशिश कीजिए जिनसे आपको तकलीफ होती है, जिनकी वजह से अपमानित होना पड़े, मानसिक पीड़ा हो। जहाँ झुकने से सुकून मिले, वहाँ अवश्य झुक जाइए। बस किसी के सामने गिड़गिड़ाते मत रहिए।
आत्म-सम्मान बनाए रखने के लिए खुद पर विश्वास कीजिए। अपने दम पर उस मुकाम की ओर बढ़िए जो आपकी चाहत है। कल्पना को सच करने के लिए खुद का साथ दीजिए। दूसरों का साथ हमेशा मत ढूँढिए। लोगों की सोच कभी भी बदल सकती है। इस संसार में आपके लिए कोई पूर्ण वफादार हो, यह जरूरी नहीं। हम जो देखते हैं, महसूस करते हैं, कभी-कभी वह सिर्फ भ्रम होता है। अपने भविष्य, सपने, करियर और जिम्मेदारी के साथ ही खुद की खुशी का ध्यान रखिए। दिल से आप जो महसूस करते हैं, जो ख्वाहिश है, उसे भी पूर्ण करने का समय निकालिए। नि:स्वार्थ जीना सीखिए। हर जगह लाभ या स्व-सुख को महत्व मत दीजिए, दूसरों के हित में भी कार्य कीजिए। क्योंकि अंत में वही साथ जाता है जो आपने दिया है, न कि जो आपने पाया है।
पानी की तरह निर्मल होने का अर्थ है कि तुम्हारा मन, वचन और कर्म एक हो। भीतर कोई छल न हो, कोई दोहरापन न हो। जब तुम अपने आप से ईमानदार रहते हो तो तुम्हारी मौजूदगी ही सबसे बड़ा उपदेश बन जाती है।
लोगों को बदलने के लिए भाषण नहीं चाहिए। जब तुम बिना ईर्ष्या के किसी की तरक्की पर खुश होते हो, जब गलती पर माफी मांग लेते हो, जब पीठ पीछे किसी की बुराई नहीं करते, तब पास बैठा इंसान खुद सोचता है – मैं भी ऐसा क्यों न बनूं।
सदा पानी सा, मन रखना,
बहते रहना, रुकना नहीं!
कीचड़ छुए तो छू लेने देना,
किन्तु, मैल को घर में रखना नहीं।
बोल वही जो भीतर गूँजे,
छल न हो, न दिखावे का रंग।
माफी मांगो, माफ कर देना,
यही है निर्मल का ढंग।
तुम दीया बनकर जलते रहना,
भाषण मत देना, बात न करना
जो पास आए, उजला हो जाए,
तुम्हारा होना ही काफी रहेना।
पानी कीचड़ में गिरता है पर बहता रहता है और धीरे-धीरे खुद को साफ कर लेता है। वैसे ही दुनिया की कड़वाहट, धोखे, गंदगी तुम पर आएगी। पर अगर तुम रुके नहीं, शिकायतों में सड़े नहीं, बदले की आग में जले नहीं, तो तुम निर्मल बने रहोगे। और जो निर्मल है उसके पास आकर लोग अपने आप हल्के हो जाते हैं…उनका डर, उनका लालच, उनकी नफरत धुलने लगती है। तुम्हें उन्हें समझाना नहीं पड़ता। तुम्हारा जीना ही प्रमाण बन जाता है कि साफ रहा जा सकता है। खुद दीया बनकर रहा करें, उजाला अपने आप फैल जाएगा।
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