सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका
अध्यक्ष : दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा/राजिम,
रायपुर, (छ.ग.)
(नया अध्याय, देहरादून)
“माटी का मेहमान”
(कविता)
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मन में हर क्षण उठता सवाल है
हर दिन लिए नया बवाल है
यह जीवन सचमुच रंगमंच है
हम सब बस उसके कलाकार हैं।
सबके जुदा जुदा किरदार हैं
डोर बंधी उस एक हाथ से है
जिसे जगत कहे भगवान है
विधि का विधान उसी पास है।
फिर किस बात का अभिमान है
हम कठपुतली, वो सूत्रधार है
इस धरा पर हम मेहमान हैं
साँसों की डोर बहुत नाजुक है।
जन्म-मरण का चक्र चलता है
केवल आत्मा अजर अमर है
‘माटी का तन’ माटी में मिलना है
बस, इतनी सी समझ का फेर है।
खुशी और ग़म का संगम है
भोग में उलझे रहना व्यर्थ है
आध्यात्म की राह मोक्ष द्वार है
सेवा, समर्पण जीवन आधार है।
सृष्टि की हर रचना खूबसूरत है
कर्मों का फल यहीं मिलता है
हे मनुष्य, तू क्यों अनजान है
भोग-विलास में ही क्यों लीन है।
मनुज जन्म सचमुच अनमोल है
स्वर्ग-नरक का यहीं आभास है
जो क्षण मिला वही सौभाग्य है
कल पर फिर क्यों विश्वास है।







