राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, देहरादून)
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ये कविता, ये पृथ्वी.
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विश्वास है, पृथ्वी है, मैं हूँ
मैं नहीं रहूँगा, पृथ्वी है, रहेगी पृथ्वी
विश्वास रहा है, रहेगा विश्वास सहित विश्वास
चींटियाँ चाट जाएँगी मगरमच्छों के दिन
हलवाई और कर्णधार बनाते रहेंगे नीतियाँ
कारखाने उगलते रहेंगे जहरीले फरमान
मैं फिर-फिर रौपता रहूँगा नीम और करँज
मैं फिर-फिर लिखता रहूँगा प्रेम और पानी
मैं फिर-फिर उठाता रहूँगा आवाज भीड़ में
नक़्कारखानों में साधारण तूती की तरह
कोई प्रलय की अफवाह फैलाएगा
कोई फैलाएगा नश्वरता का प्रलाप
कोई बटोरेगा डाॅलर और चाँदी-सोना
सब चुभोएँगे नश्तर कविता को ही चुभोएँगे
कोई भी चाहेगा नहीं, कोई भी बचाएगा नहीं
फिर भी रहेगी और बचेगी कि है विश्वास
गहराई से ऊँचाई है, पेट में है पानी अपार
चीरते हुए चट्टानी सीना, अतल तक गड़ी है
शायद इसीलिए मनुष्य से कुछ बड़ी है
ये कविता, ये पृथ्वी.
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झूठ को सच लिखूँगा नहीं
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डरता हूँ तो डरता हूँ खुद से
किसी की भी बंदूक से डरूँगा नहीं
लालच कोई है नहीं, लिप्सा भी है नहीं
सच को सच कहा है सच ही कहूँगा
आज हूँ, कल हूँ हमेशा रहूँगा नहीं
झूठ को सच लिखूँगा नहीं.
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