लेखनी, कर्म, आस्था और आत्म अनुशासन का महापर्व भगवान चित्रगुप्त प्रकट्योत्सव।

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अंजनी सक्सेना

 

              (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

लेखनी, कर्म, आस्था और आत्म अनुशासन का महापर्व भगवान चित्रगुप्त प्रकट्योत्सव।

 

 

भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में ऐसे अनेक देवता हैं जिनका संबंध केवल आस्था एवं विश्वास से ही नहीं जीवन के मूल सिद्धांतों से भी है। इन्हीं में एक प्रमुख नाम है भगवान चित्रगुप्त का,जिन्हें कर्मो के लेखाकार, न्याय के संरक्षक और सत्य के प्रतीक के रुप में पूजा जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान चित्रगुप्त, प्रत्येक प्राणी के पाप पुण्यों का लेखा-जोखा रखने वाले देवता हैं यथा वे धर्मराज के सहायक हैं।

 

भगवान चित्रगुप्त की उत्पत्ति का विवरण कई पुराणों एवं धर्मग्रंथों में मिलता है। इस विवरण के अनुसार ब्रह्मा जी ने अपने मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, पेट या जंघा से वैश्य तथा पैरों से शूद्र उत्पन्न किए। उन्होंने सूर्य एवं चन्द्र आदि ग्रहों के साथ ही बिना पैर वाले जीवों से लेकर अनेक पैर वाले जीवों की रचना की। इस सृष्टि की रचना के बाद ब्रह्मा के शरीर (काया) से बड़ी-बड़ी भुजाओं वाले, श्याम वर्ण, कमलवत् नेत्रवान्, शंख के समान गर्दन वाले, तेजस्वी, अति बुद्धिमान, हाथ में लेखनी और दवात धारण किए हुए, अव्यक्त जन्मा चित्रगुप्त जी प्रकट हुए। समाधि खुलने के बाद ब्रह्मा जी ने अपने सामने उपस्थित इस पुरुष से पूछा आप कौन हैं? उस पुरुष ने कहा – मैं आपके ही शरीर से उत्पन्न हुआ हूं इसलिए आप मेरा नामकरण कीजिए तथा मेरे कर्तव्य बताईये।

 

ब्रह्मा जी ने यह सुनकर कहा कि तुम मेरी काया (शरीर) से उत्पन्न हुए हो इसलिए तुम्हारी संज्ञा कायस्थ है। तुम्हारी उत्पत्ति के समय मेरा मन विश्रांत स्थिति में था अर्थात् मेरा चित्त गुप्त था इसलिए तुम चित्रगुप्त कहलाओगे। तुम धर्मराज की धर्मपुरी में निवास करो और प्राणियों के धर्माधर्म पर विचार करो।

 

भगवान चित्रगुप्त के नाम में ही उनकी भूमिका छिपी है “चित्र” यानी स्पष्ट चित्रण और “गुप्त” यानी छिपा हुआ। अर्थात वे केवल दिखाई देने वाले कर्म ही नहीं, बल्कि मन के भाव और इरादों तक का लेखा रखते हैं। उनके स्वरूप का वर्णन करते हुए एक प्रचलित श्लोक अक्सर सुनने को मिलता है-

 “लेखनी-पत्र-हस्तं च चित्रगुप्तं नमाम्यहम्।

 कर्मणा लेखनं यस्य सर्वभूतहिते रतम्॥”

 

इस श्लोक में चित्रगुप्त के उस रूप का चित्रण है, जिसमें वे हाथ में लेखनी और पत्र लिए हुए हैं और समस्त प्राणियों के कर्मों का लेखा लिखते हैं। जिसमें हर कार्य का हिसाब है और हर निर्णय का परिणाम।

 

धर्म ग्रंथों के अनुसार चित्रगुप्त जी के दो विवाह हुए। एक सूर्य कन्या से तथा दूसरा नाग कन्या से। इन पत्नियों से उनके बारह पुत्र उत्पन्न हुए। इन पुत्रों के नाम पर ही कायस्थों की बारह उपजातियां हैं। भगवान चित्रगुप्त ने अपने इन पुत्रों को शास्त्रों की शिक्षा दी तथा उनके लिए कर्तव्यों का निर्धारण किया। इन कर्तव्यों के अनुसार कायस्थों को देवताओं का पूजन, पितरों का श्राद्ध तथा अभ्यागतों की सेवा करना चाहिए। चित्रगुप्त जी ने अपनी संतति को महिषासुर मर्दिनी देवी की पूजन एवं उपासना करने का भी आदेश दिया।

 

भारतीय समाज में कायस्थ एक बुद्धिजीवी एवं चतुर जाति मानी जाती है। मध्यकाल में तो यह मान्यता थी कि राज-काज के संचालन में इससे कुशल एवं प्रवीण कोई अन्य जाति नहीं है। गुप्त काल से लेकर राजपूत, मुगल एवं मराठा शासकों के काल में कायस्थ न केवल महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होते थे, बल्कि राजस्व विभाग विशेषकर ‘पटवारियों’ के पदों पर कायस्थों का ही अधिकार होता था।

 

भगवान चित्रगुप्त के प्रकटोत्सव वैशाख शुक्ल पक्ष सप्तमी के दिन मंदिरों में श्रद्धालु भगवान चित्रगुप्त की पूजा करते हैं, कलम-दवात अर्पित करते हैं और अपने जीवन में सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं। कई स्थानों पर शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, जिनमें भगवान की झांकियां, भजन-कीर्तन और पारंपरिक वेशभूषा में शामिल लोग उत्सव को जीवंत बना देते हैं। प्रकटोत्सव के अलावा कायस्थ जाति में भगवान चित्रगुप्त की वर्ष में कम-से-कम दो बार और पूजन होती है। इनमें से पहली पूजन दीपावली की द्वितीया को होती है तथा दूसरी होली की द्वितीया (दौज) को। यह दोनों ही तिथियां भाई दौज या यम द्वितीया के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन प्रत्येक कायस्थ के घर मे चित्रगुप्त जी एवं कलम दवात की पूजा होती है। कई स्थानों पर यह पूजन सामूहिक रूप से भी की जाती है।

 

पूजन के समय भगवान चित्रगुप्त की स्तुति में जो मंत्र कहे जाते हैं, उनका अर्थ है कि दवात-कलम और खल्ली धारण करने वाले भगवान चित्रगुप्त आप लेखकों को अक्षर प्रदान करते हैं। इन धर्मग्रंथो में कहा गया है कि कायस्थों के अतिरिक्त अन्य जाति के लोग भी चित्रगुप्त जी की पूजन करते हैं तो इस पूजन से उन मनुष्यों की आयु बढ़ती है तथा उन्हें नरक के कष्ट नहीं भोगने पडते है और वे स्वर्ग के अधिकारी होते हैं।

 

आज के दौर में जब पारदर्शिता और जवाबदेही की चर्चा हर क्षेत्र में हो रही है। चाहे वह राजनीति हो, प्रशासन हो या समाज तब भगवान चित्रगुप्त की अवधारणा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उनका संदेश स्पष्ट है कि हर कर्म का लेखा है और अंततः न्याय अवश्य होता है। यह विचार व्यक्ति को अपने आचरण के प्रति सजग बनाता है और समाज में नैतिकता को मजबूत करता है।

 

भगवान चित्रगुप्त के प्रकटोत्सव की अपनी अलग पहचान और महत्व है। समय के साथ इस उत्सव का स्वरूप भी बदला है। अब यह केवल मंदिरों या समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी व्यापक रूप से मनाया जा रहा है। युवा पीढ़ी इसे नए अंदाज़ में जोड़ रही है, लेकिन मूल भावना वही बनी हुई है कर्म, सत्य और जिम्मेदारी।

 

भगवान चित्रगुप्त का प्रकटोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन का एक संदेश है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारे हर कर्म का महत्व है, हर निर्णय का प्रभाव है और हर व्यक्ति अपने जीवन की कहानी खुद लिख रहा है। यह दिन उसी लेखनी और उसी जिम्मेदारी का प्रतीक बनकर सामने आता है,जहां आस्था और आत्मचिंतन एक साथ चलते हैं, और जहां पूजा केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि एक संकल्प भी बन जाती

(विभूति फीचर्स)

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