आत्मज्ञान के प्रकाश के बाद जीवन में निराशा का अंधकार टिक नहीं पाता

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका

अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति

गोबरा नवापारा/राजिम

रायपुर, (छ.ग.)

 

 

                    (नया अध्याय, देहरादून)

 

आलेख –

आत्मज्ञान के प्रकाश के बाद जीवन में निराशा का अंधकार टिक नहीं पाता

                  :सुश्री सरोज कंसारी

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आंतरिक चेतना जाग जाए तो बाहरी परिस्थितियां कभी स्थायी अंधेरा नहीं ला सकतीं। यह संसार परिवर्तनशील है! परिस्थितियाँ पल-पल बदलती हैं,किन्तु…मनुष्य के भीतर एक शक्ति ऐसी है जो शाश्वत है, अडिग है, अखंड है — वह है आत्म-चेतना का सूर्य। जब बाहरी जगत् में अंधकार छा जाए, दिशाएँ भ्रमित करने लगें, तब भीतर का यह सूर्य ही मार्ग दिखाता है!…ऋषियों-मुनियों-कवियों का मानना-कहना है — “तमसो मा ज्योतिर्गमय” — अंधकार से प्रकाश की ओर चलो। यह प्रकाश कहीं बाहर नहीं, तुम्हारे मन के भीतर ही प्रज्ज्वलित है। बस उसे पहचानने की देर है। मन वह केंद्र बिंदु है जहां संसार के समस्त गम और खुशी समाहित हैं।

 

अब हमें ध्यान देना है कि इस मन रूपी अथाह सागर से हमें क्या लेना है? सांसारिक जीवन में दुख, चिंता, शोक, भय, घृणा, नफरत, बैर, क्रोध, छल, षड्यंत्र, मद, मोह और माया के साथ ही मानवीय भावनाएं — प्रेम, स्नेह, करुणा, दया, क्षमा, सहयोग — की धारा निरंतर प्रवाहित होती रहती है। जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच मन ही हमें जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने के अनेक विकल्प देता है। गम के बादल अर्थात् हर लम्हा निराशा के भाव में रहना। जब हम किसी समस्या में उलझे रहते हैं, शारीरिक या मानसिक रूप से पीड़ित होते हैं, तो स्वाभाविक है कि नकारात्मक भाव आ जाते हैं और कभी-कभी हम एकदम गुमसुम हो जाते हैं। दुख की घड़ी ही ऐसी होती है — हम दर्द को महसूस करके न जाने क्या-क्या सोचते हैं, चिंतित हो जाते हैं, घबराहट होती है। ज्यादा चिंता में जाने से मानसिकता कमजोर हो जाती है।

 उलझन में जब इंसान फँसता है,

 मन के भंवर में खुद धँसता है।

 पर, रोशनी भी भीतर ही बसती है,

 हर सवाल का हल वहीं हँसता है।

 

किन्तु…गहन अंधकार में भी जब हम मन की चेतना को जागृत कर दुख की अवस्था से निकलने का प्रयास करते हैं, तब सुख के सूर्य का उदय होता है। उम्मीद ही वह रोशनी है जिससे हम रूठे भाग्य, गर्दिश के दौर और विचलित मानसिकता से निकल सकते हैं। गम की अवस्था ही काले बादल का प्रतीक है। याद रखिए — कोई भी परिस्थिति एक सी नहीं रहती। जिंदगी से कितनी ही ठोकरें मिलें, जीवन को बदलने की संभावनाएं कहीं न कहीं बनी रहती हैं। दुख के बादल को हटाने के लिए मन को सूर्य के समान तेज, उज्ज्वल और मजबूत बनाना आवश्यक है। जब हम कहते हैं “मेरा मन सूर्य है” तो मन में ओजस्वी भाव जागते हैं। मन के सूर्य को प्रज्ज्वलित कर हम जीवन के हर पल को जीवंत बना सकते हैं।

 

मन की सुप्त अवस्था से निकलते ही दहशत, भय और शोक नष्ट हो जाते हैं। मन को सूर्य की भांति बना लेने से असीम साहस का संचार होता है। असंभव को संभव बनाने की शक्ति मन को मजबूत बनाने से ही आती है। सूर्य के समान औरों के जीवन को प्रकाशित करना सीखिए। विपत्ति में निर्भीक होकर खड़े होने के लिए मन के हर द्वंद्व को मिटाना जरूरी है। सूर्य स्वयं में पूर्ण है — इस संसार का अंधियारा मिटाने के लिए अपने अंदर साहस का सूर्य उदय होने दीजिए, हर दुर्भाव स्वतः मिट जाएंगे। जैसे सूर्य अपनी जगह अडिग है, आंधी-तूफान, भूकंप में भी विचलित हुए बिना हर दिन फिर से उदय होता है, वैसे ही मनुष्य जीवन में समस्याएं आती हैं — धैर्य से सामना कर अपने सत्कर्म पथ पर चलते-बढ़े चलो। समय के साथ जीवन में कई तरह के विचार आते-जाते हैं, लेकिन हमें सद्कार्य और सद्व्यवहार को नहीं बदलना है। अंतरात्मा के प्रति प्रणाम कर, ईमानदार होकर अपने फ़र्ज़ निभाते रहिए। मन को शांत, सक्रिय और उत्साहित रखिए।

 

सद्कार्यों से अपने जीवन को नई ऊर्जा देते रहिए। सूर्य स्वयं में शक्ति है, किसी पर निर्भर नहीं! — अकेला ही पर्याप्त और पूर्ण है इस संसार को प्रकाशित करने के लिए। अपने मन के सूर्य को कभी बुझने मत दीजिए। खुद को इतना सामर्थ्यवान बनाइए कि जिंदगी की कोई भी जंग तुम्हें पराजित न कर पाए। खुद को प्रकाश मानिए और अपनी आंतरिक शक्ति को पहचानिए। सच्चे मन से की गई ध्यान-भक्ति, आस्था, विश्वास और प्रेम में बहुत शक्ति होती है। जीवन में असफलता और निराशा के कितने ही घनघोर बादल क्यों न हों, आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति से नई रोशनी जरूर आएगी। हर हालात में अडिग रहिए…ईमानदारी, धर्म, फ़र्ज़, नेकी कभी मत छोड़िए — ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद हमेशा आपके साथ है, बस आपकी सोच, कर्म, व्यवहार और उद्देश्य सही हों। खुद के भीतर देखिए — तुम अपने जीवन के मजबूत आधार हो।

        तुम ही निर्माण हो..!

       तुममें ही छिपा विनाश है।

      खुद को कमजोर न समझना,

      जीवन में करते रहना नया सृजन।  

      किसी के बुरे बर्ताव से दुखी न होना,  

       याद रखना — 

       अति के बाद ही होता अंत है।

       किसी को उजाड़ना नहीं।

      आशियाना बनाना है।

       हृदय की गहराई से निकली !

      हर एक आह में होता बहुत असर है।

 

जिस शक्ति का प्रयोग अधिक करेंगे, बाहर भी वही प्रकट होगा। जब भी लगे कि तुम इस स्वार्थ से भरी दुनिया में अकेले हो..! छल-कपट, षड्यंत्र के शिकार हो, जब लगे चारों तरफ सिर्फ दुख है — तब अपने अंदर जोश, जुनून और साहस को जगाना। इस सांसारिक यातनाओं के जंजाल को तोड़कर आगे बढ़ना, सामना करना, जोखिम उठाना, संघर्ष से खुद को निखारना — यही जीवन है…सुनो..! ध्यान से करो दिमाग से, भागो गलत कार्य से, और सानिध्य में रहो भगवान के। बाकी सब समय का खेल है। बस तैयार रहिए गम की रात के बाद सुनहरी सुबह के लिए। सूरज सा बनकर औरों के पथ-प्रदर्शक बनिए, निस्वार्थ रहिए। आशान्वित नज़र से देखिए — विधाता के खेल निराले हैं। कोई भी कार्य, संबंध या मित्रता हो, अंत तक निभाइए, बीच में मत छोड़िए।

 

अपना स्वभाव हमेशा शांत-सरल रखिए, लेकिन जहां चरित्र, स्वाभिमान या आत्मा को चोट पहुंचे, वहां सूरज सा तेज, प्रभावशाली व्यक्तित्व रखिए — जहां दुष्ट व्यक्ति का अहंकार जलकर राख हो जाए। इसलिए उठो, जागो व पहचानो कि तुम मनुष्य केवल हाड़-मांस का पुतला नहीं, तुम स्वयं प्रकाश-पुंज हो। बादल आएंगे, बरसेंगे, गरजेंगे और चले भी जाएंगे — यही उनका धर्म होता है। पर तुम्हारा धर्म है अडिग रहना है, जलते रहना है, प्रकाश बांटते रहना है। जब एक बार मन का सूर्य पूर्ण तेज से चमक उठता है, तो फिर जीवन में कोई रात इतनी काली नहीं होती जिसे सुबह न मिटा सके। स्मरण रहे — तुम समस्या नहीं, समाधान हो। तुम प्रश्न नहीं, उत्तर हो । तुम अंधकार नहीं, स्वयं सूर्य हो। अब न रुकना है, न झुकना है — बस अपने तेज से युग को आलोकित करना है। मन ही बंधन है, मन ही मोक्ष है। बाहर जो अंधकार दिखता है, उसका दीया भीतर ही जलता है। जय-जय भारत !

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