सुश्री सरोज कंसारी
कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका
अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, छ.ग.
(नया अध्याय, देहरादून)
“मैं धरा-सी, धैर्य की मूरत !”
(कविता)
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मैं बेटी हूँ इस सुंदर जहान की,
किसी हरे-भरे खलिहान की मुस्कान की।
मैं ही उड़ान हूँ खुले आसमान की,
अथाह गहराई हूँ सागर के अरमान की।
मैं अटल हिमगिरि-सी चट्टान हूँ,
हर बागबान की मेहनत की पहचान हूँ।
हर घर-आँगन की मधुर जरूरत हूँ,
निर्मल नदिया की कल-कल धार हूँ।
मैं ही श्रृंगार हूँ सारी सृष्टि का,
अपने परिवार का मान, उसकी तुष्टि का।
चहकती हूँ मैं स्वछंद पंछियों-सी,
पर वक्त पड़े तो दहकूँ अंगारों-सी।
आत्मसम्मान की परवाह मुझे भी है,
रंग-बिरंगी तितली-सी उड़ान मुझे भी है।
संस्कारों की सजीव मूरत हूँ,
इस धरा-सा मुझमें असीम धैर्य है।
आँखों में रखती हूँ आँसुओं का सैलाब भी,
सबके होठों की मैं ही मुस्कान भी।
माता-पिता का मैं गर्व, अभिमान भी,
सारे रिश्तों की मैं ही धुरी, कमान भी।
खुशियों का एहसास हूँ, प्रीत पराई भी,
दो कुलों की लाज निभाती, सगाई भी।
चाहतें दफ़न कर देती हूँ दिल में ही,
पर ज़ख़्म अपना दिखाती कभी नहीं।
हर दर्द की मैं ही मरहम बन जाती हूँ,
साँझ की लाली-सी ढल भी जाती हूँ।
सुबह की उम्मीद की पहली किरण हूँ,
घर के पकवानों में ममता की शरण हूँ।
घर की साज-सजावट, रौनक मैं ही,
पल-पल की ज़रूरत, गृहलक्ष्मी मैं ही।
भारत माँ की शान बढ़ाती मैं ही,
पर फिर भी पूछूँ – दरिंदगी का शिकार मैं ही?
क्यों आज भी सुरक्षित नहीं मैं आज भी?
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