उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर: उप्रेती बहनों की सुरमयी और आध्यात्मिक संगीत-यात्रा।

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रमाकान्त पन्त

 

              (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर: उप्रेती बहनों की सुरमयी और आध्यात्मिक संगीत-यात्रा।

 

 

​देवभूमि उत्तराखंड की माटी की सुगन्ध को अपने सुरों में पिरोने वाली ज्योति और नीरजा उप्रेती आज ‘उप्रेती सिस्टर्स’ के नाम से देश-विदेश में विख्यात हैं। लोक-मंच, रंगमंच और विविध सांस्कृतिक आयोजनों में इन दोनों बहनों की सांगीतिक प्रस्तुतियां श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। आभासी दुनिया (सोशल मीडिया) पर भी इनकी कला का जादू सिर चढ़कर बोलता है। चाहे किसी विस्मृत पुराने गीत को नवजीवन देना हो या अपनी कोई नवीन रचना प्रस्तुत करनी हो, इनका हर अंदाज़ जनमानस के हृदय में गहरे उतर जाता है। अल्प समय में ही उन्होंने ऐसी विलक्षण ख्याति अर्जित की है कि रसिकजन उनके नए सृजन की आतुरता से प्रतीक्षा करते हैं।

 

​हाल ही में इन सुरीली बहनों ने एक नवगीत “पहाड़ी छां हम पहाड़ी रुनेर” को स्वरबद्ध किया है, जो सीधे रूह को छूता है। पहाड़ी राग पर आधारित इस गीत को उत्तराखंड की नैसर्गिक और उन्मुक्त शैली में पिरोया गया है।

इन बहनों द्वारा स्वयं रचित इस गीत में हिमालयी माटी की सोंधी महक और शीतल हवाओं का झोंका महसूस होता है। गीत का मूल भाव पर्वतीय अंचल के स्वाभिमानी, कर्मठ और प्रकृति-प्रेमी निवासियों के जीवन-दर्शन को दर्शाता है। यह गीत सुदूर प्रदेशों में बसे प्रवासियों को अपनी जड़ों, अप्रतिम सौंदर्य और सांस्कृतिक परंपराओं का स्मरण कराता है। चंदन के भावपूर्ण संगीत से सजी इस रचना में गहरी संवेदनशीलता और शब्दों की अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति है।

 

​जिस प्रकार स्वीडन की जोहाना और क्लारा बहनें अपने पारंपरिक लोकगीतों के युगल गायन के लिए विश्व-विख्यात हैं, उसी तर्ज पर ज्योति और नीरजा ने विशेष रूप से कुमाऊंनी लोक-संगीत को एक अभिनव और वैश्विक पहचान दिलाई है। यह उनकी गायकी का एक नव-उन्मेष है।

 

​अपनी सधी हुई आवाज से वे उत्तराखंड की पारंपरिक विधाओं छपेली, झोड़ा और सेदई को वैश्विक पटल पर गुंजायमान कर रही हैं। उनकी बहुमुखी गायन शैली के कई आयाम हैं।

 

​लोकगीतों के संरक्षण के लिए समर्पित इन बहनों ने ‘मासी कू फूल’, ‘खोल दे माता खोल भवानी’, ‘बेडू पाको बारमासा’ और ‘यो बाटो का जाणों होलू’ जैसे गीतों को अपने सुरों से पुनर्जीवित किया है। साथ ही, ‘फगवा दे हो आशीष’, ‘दो शीशी भर दे गुलाल’ और ‘हरी धरे मुकुट खेले होरी’ जैसे पारंपरिक होली के गीतों को वे पूर्ण तन्मयता से गाकर फाग का अद्भुत रंग जमा देती हैं।

 

​आध्यात्मिक चेतना से ओतप्रोत ‘निर्वाण षट्कम’, ‘गंगा स्तोत्रम्’ और ‘न मंत्रं नो यंत्रं’ जैसे क्लिष्ट श्लोकों को उन्होंने अत्यंत शुद्ध और मधुर वाणी में प्रस्तुत किया है। ‘जी के इंडिया यूथ समिट’ में उनका ‘जय देवभूमि उत्तराखंड’ और देवी स्तुति का गायन विदेशी अतिथियों तक को भाव-विभोर कर गया था। दिल्ली दूरदर्शन के लिए रिकॉर्ड किए गए उनके शिव भजन भी अत्यंत प्रभावकारी हैं।

सदाबहार फिल्मी नगमे: बहुमुखी प्रतिभा की धनी ये बहनें ‘ये दिल और उनकी निगाहों के साये’, ‘हुस्न पहाड़ों का’ और ‘कोरा कागज़ था ये मन मेरा’ जैसे सुप्रसिद्ध हिंदी फिल्मी गीतों को भी अपने विशिष्ट अंदाज़ में गाकर श्रोताओं को आनंदित करती हैं।

 

​एक ओर जहाँ वे लोक-मंगल का गान कर हिमालयी संस्कृति को समृद्ध करती हैं, वहीं दूसरी ओर वैदिक श्लोकों के उच्चारण से श्रोताओं को अध्यात्म की ओर ले जाती हैं। कभी दिग्गज संगीतकार मोहन उप्रेती को जो अक्स गोपाल बाबू गोस्वामी जी की कला में दिखता था, आज वही सांस्कृतिक विरासत इन बहनों के स्वरों में साकार हो रही है।

व्यक्तिगत जीवन की बात करें तो ज्योति जहाँ आकाशवाणी की प्रतिष्ठित कलाकार हैं, वहीं उनकी अनुजा नीरजा पेशे से एक फिजियोथेरेपिस्ट हैं। बचपन से ही दोनों का झुकाव संगीत की ओर रहा है और पर्वतीय जीवन के सामाजिक ताने-बाने ने उनकी कला को गहराई दी है।

 

​अपनी सुमधुर आवाज़ के साथ-साथ वे शब्दों के स्पष्ट उच्चारण, सुर और लय के परिष्कृत संतुलन का विशेष ध्यान रखती हैं। इसके अतिरिक्त, प्रस्तुति के दौरान उनके मुखमंडल पर उभरने वाले नैसर्गिक भाव (भाव-भंगिमा) उनके गायन को अद्वितीय बना देते हैं। यही कारण है कि उनकी हर सांगीतिक भेंट को अपार सराहना मिलती है। ज्योति और नीरजा अत्यंत प्रफुल्लित अंतर्मन से गाती हैं—गीत चाहे उत्तराखंड की पीड़ा, संघर्ष और जीवटता का हो, या लोक-परंपरा के हर्षोल्लास का, वे उसे पूर्ण प्रामाणिकता के साथ उसी की मूल भावना में ढाल देती हैं। देवभूमि को जिस आध्यात्मिक और सांस्कृतिक स्वर की सदैव आकांक्षा रही है, उसे इन दोनों बहनों ने अपनी साधना से पूर्णतः चरितार्थ किया है।

 

संगीत की इस अलौकिक यात्रा में इन बहनों ने सफलता के कई अभूतपूर्व कीर्तिमान रचे हैं। उल्लेखनीय है कि ज्योति उप्रेती ने महज़ आठ वर्ष की कोमल आयु से ही मंचों पर अपनी सुर-साधना का श्रीगणेश कर दिया था। वर्तमान में वे आकाशवाणी और दूरदर्शन की ‘ए’ (A) श्रेणी की प्रतिष्ठित गायिका हैं, तथा दोनों बहनें संयुक्त रूप से इन राष्ट्रीय प्रसारण मंचों पर लोक और सुगम संगीत की छटा बिखेरती रहती हैं। उनकी कला का चरमोत्कर्ष वर्ष 2023 में नई दिल्ली में आयोजित ‘जी-20’ (G-20) शिखर सम्मेलन में देखने को मिला। वहाँ उन्होंने कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी लोकगीतों की ओजस्वी प्रस्तुति देकर वैश्विक मंच पर देवभूमि का मान बढ़ाया। इसी ऐतिहासिक आयोजन में विश्व के गणमान्य अतिथियों के समक्ष उन्हें ‘उत्तराखंड की स्वरागिनी’ की गरिमामयी उपाधि से अलंकृत किया गया। महान जनकवि ‘गिर्दा’ की कालजयी रचनाओं (‘उत्तराखंड मेरी मातृभूमि’) से लेकर ठेठ पहाड़ी लोकगीतों तक, उनकी सांगीतिक यात्रा का फलक अत्यंत विस्तृत और इंद्रधनुषी है।

 

लोक-धरोहर के संरक्षण के साथ-साथ इन बहनों ने आध्यात्मिक गायन में भी एक स्वर्णिम प्रतिमान स्थापित किया है। उनके द्वारा किया गया ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के श्लोकों का सस्वर और भावपूर्ण पाठ श्रोताओं के अंतर्मन को असीम शांति व दिव्यता से सराबोर कर देता है। यह उनके व्यक्तित्व की ही विलक्षणता है कि जहाँ एक ओर अनुजा नीरजा चिकित्सा क्षेत्र (फिजियोथेरेपी) से जुड़कर लोगों की शारीरिक पीड़ा हरने का पुनीत कार्य करती हैं, वहीं दोनों बहनें मिलकर अपने सांगीतिक तप से समाज के मानसिक और आत्मिक संताप को भी दूर कर रही हैं। अपनी मातृभूमि के प्रति उनका यह अगाध समर्पण और विलुप्त होती लोक-कला को नवजीवन देने का यह भगीरथ प्रयास, निस्संदेह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अनुपम और दीप्तिमान प्रेरणास्रोत है।

 

उत्तराखंड के सीमान्त अंचल और अप्रतिम नैसर्गिक सुषमा से परिपूर्ण जनपद पिथौरागढ़ का सांस्कृतिक रूप से जाज्वल्यमान गाँव ‘हुड़ेती’, इन सुरमयी बहनों की पुण्य जन्मभूमि है। हिमालय की रजत शिखरों की छांव में बसी इसी स्वप्निल वादी में, पिता श्री ललित मोहन उप्रेती और माता श्रीमती पुष्पा उप्रेती के आँगन में ज्योति और नीरजा का अवतरण हुआ। यहाँ के बांज-बुरांश और देवदार वनों की झंकृत होती सरसराहट, सदानीरा नदियों के कल-कल निनाद और प्रकृति के शाश्वत नाद के मध्य ही, इन बहनों के कंठ में साक्षात् माँ वाग्देवी (सरस्वती) ने अपना स्थायी बसेरा बनाया।

 

इन साधिकाओं के लिए उनका पैतृक गाँव महज मानचित्र पर उकेरी गई कोई भौगोलिक रेखा नहीं, अपितु वह प्राणदायिनी ऊर्जा है, जिसने इनकी गायकी को अथाह गहराई और एक अलौकिक रूहानियत प्रदान की है। ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ के शाश्वत मंत्र को अपनी आत्मा में पिरोने वाली इन बहनों के सुमधुर स्वरों में हुड़ेती की शीतल बयार का मर्मस्पर्शी अक्स और पिथौरागढ़ की माटी की सोंधी सुगन्ध प्रत्यक्ष जीवंत हो उठती है। यह भी एक अत्यंत सुखद और काव्यात्मक संयोग है कि ज्योति उप्रेती का मायका जहाँ कुमाऊं की मनमोहक वादियों में पल्लवित हुआ, वहीं उनकी ससुराल गढ़वाल के पावन अंचल में है। इस अद्भुत भौगोलिक और भावात्मक समन्वय ने उन्हें कुमाऊं, गढ़वाल और जौनसारयानी संपूर्ण उत्तराखंड की साझी सांस्कृतिक धरोहर की एक प्रामाणिक एवं सशक्त संवाहिका बना दिया है। उनके द्वारा गाए गए लोकगीतों में अपनी जन्मभूमि के प्रति जो अगाध अनुराग और समर्पण झलकता है, वह रसज्ञ श्रोताओं को भी पल भर में देवभूमि के उसी तपोनिष्ठ और पावन आँगन की भाव-यात्रा पर ले जाता है।   (विभूति फीचर्स)

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