खुशी मेरा स्वभाव है, पुरस्कार नहीं!

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका

अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति

(गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, छ.ग.)

 

                    (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

आलेख –

           खुशी मेरा स्वभाव है, पुरस्कार नहीं !

               — सुश्री सरोज कांसारी

 

“खुशी कोई बाहरी उपलब्धि नहीं, बल्कि आत्मा का एक सुप्त राग है; इसे संसार में खोजो मत, बस अपने भीतर की परतों को हटाकर इसे जगा लो।”

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हमारे अंतस खुशी अधिकतर एक ऐसी वस्तु मान ली जाती है जिसे भविष्य में किसी उपलब्धि के उपरांत हासिल किया जाना है। हम सोचते हैं कि जब पद मिलेगा, धन आएगा या कोई लक्ष्य पूरा होगा, तब हम खुश होंगे। परन्तु वास्तविकता इसके उलट है। खुशी कोई गंतव्य नहीं, बल्कि हमारी यात्रा का तरीका है। यह हमारे अंतस (अंतर्मन) की वह मूल अवस्था है जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होनी चाहिए। जब हम खुशी को एक पुरस्कार की तरह देखते हैं, तो हम खुद को एक अंतहीन दौड़ में झोंक देते हैं। यह दौड़ हमें वर्तमान से दूर ले जाती है। हम आज की शांति को कल की काल्पनिक खुशी के लिए…गिरवी रख देते हैं। यह सोचना कि “जब यह होगा, तब मैं खुश होऊँगा” एक मानसिक जाल है। यह जाल हमें कभी संतुष्ट नहीं होने देता, क्योंकि एक लक्ष्य पूरा होते ही मन दूसरे लक्ष्य की ओर भागने लगता है।

न खोज इसे दुनिया की भीड़ में, ये कोई बाहरी जीत नहीं।

ये आत्मा का सुप्त राग है, कोई कृत्रिम संगीत नहीं।।

हटा दे मन की परतों को, जो घेरे है तेरी हस्ती को।

जगा ले खुद में उस ख़ुशी को, जिसका कोई अतीत नहीं.

 

स्वभाव अर्थात्…वह जो सहज है, जो हमारे साथ पैदा हुआ है। एक छोटे बच्चे को देखिए, उसे खुश होने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं होती। वह धूल में खेलकर भी उतना ही आनंदित होता है जितना कि किसी महंगे खिलौने से। बच्चा खुश रहना जानता है क्योंकि खुशी उसका स्वभाव है। जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, समाज हमें सिखाता है कि खुशी के लिए कुछ हासिल करना जरूरी है।…पुरस्कार हमेशा बाहरी होता है और इसे छीना जा सकता है। यदि आपकी खुशी आपकी सफलता या दूसरों की प्रशंसा पर टिकी है, तो आप हमेशा असुरक्षित रहेंगे। जिस दिन सफलता कम होगी या लोग आलोचना करेंगे, आपकी खुशी गायब हो जाएगी। इसके विपरीत, यदि खुशी आपका स्वभाव है, तो वह आपके भीतर के स्रोत से आती है। इसे संसार की कोई भी ताकत आपसे नहीं छीन सकती।

 

अध्यात्म हमें सिखाएगा है कि आत्मा का मूल गुण ‘आनंद’ है। जैसे सूरज का स्वभाव चमकना है और फूल का स्वभाव महकना है, वैसे ही मनुष्य का स्वभाव प्रसन्न रहना है। हम अपनी इस आंतरिक चमक को चिंताओं और अपेक्षाओं की परतों के नीचे दबा देते हैं। साधना और आत्म-चिंतन का उद्देश्य उन परतों को हटाना है ताकि हमारा सहज स्वभाव पुनः प्रकट हो सके।…जीवन में चुनौतियां और दुख आएंगे, यह अटल सत्य है। लेकिन खुशी को स्वभाव बनाने का मतलब यह नहीं है कि आप कभी दुखी नहीं होंगे। इसका अर्थ यह है कि दुख की लहरें आपके आंतरिक सागर की गहराई को विचलित नहीं कर पाएंगी। आप अशांति के बीच भी शांत रहना सीख जाते हैं। आप जानते हैं कि बाहरी तूफान अस्थाई हैं, लेकिन आपकी आंतरिक प्रसन्नता स्थाई है।

 

आज के भौतिकवादी युग में खुशी को ‘खरीदने’ की कोशिश की जाती है। विज्ञापनों के माध्यम से हमें बताया जाता है कि अमुक वस्तु हमें सुख देगी। पर…वस्तुएं केवल क्षणिक सुविधा दे सकती हैं, स्थायी आनंद नहीं। जब हम वस्तुओं में खुशी तलाशते हैं, तो हम अपनी स्वतंत्रता खो देते हैं। खुशी को स्वभाव बनाने वाला मनुष्य सीमित संसाधनों में भी सम्राट की तरह जीता है।…कृतज्ञता वह चाबी है जो हमारे स्वभाविक आनंद को खोलती है। जब हम उन चीजों पर ध्यान देते हैं जो हमारे पास हैं, तो हम स्वतः ही प्रसन्न महसूस करते हैं। यह प्रसन्नता किसी उपलब्धि का परिणाम नहीं, बल्कि जीवन के प्रति एक दृष्टिकोण है। हर सांस, हर सुबह और हर छोटा अनुभव उत्सव बन जाता है जब हम खुशी को अपना आधार बना लेते हैं।

 

देखा जाए तो जो लोग खुशमिजाज होते हैं, वे अधिक सफल और स्वस्थ होते हैं। उनकी खुशी सफलता का ‘परिणाम’ नहीं बल्कि ‘कारण’ होती है। जब आप प्रसन्न मन से काम करते हैं, तो आपकी रचनात्मकता और ऊर्जा बढ़ जाती है। इस प्रकार, खुशी आपके जीवन की बुनियाद बन जाती है, न कि ऊपरी ढांचा। रिश्तों में भी यह सिद्धांत बहुत काम आता है। यदि आप अपनी खुशी के लिए दूसरों पर निर्भर हैं, तो आप उन पर बोझ बन जाते हैं। लेकिन यदि खुशी आपका स्वभाव है, तो आप दूसरों को खुशी बाँटते हैं। आप एक ऐसे फूल की भाँति होते हैं जो अपनी महक से सबको सराबोर कर देता है। ऐसे व्यक्ति के साथ हर कोई रहना चाहता है क्योंकि उसकी ऊर्जा संक्रामक होती है।

 

खुद को स्वीकार करना खुशी की ओर पहला कदम है। हम अक्सर अपनी तुलना दूसरों से करते हैं और खुद को कमतर आंकते हैं। यह तुलना हमारे स्वभाविक आनंद को सोख लेती है। जब हम स्वीकार करते हैं कि हम जैसे भी हैं, पूर्ण हैं, तो संघर्ष समाप्त हो जाता है। इसी ठहराव से वह खुशी जन्म लेती है जो बिना किसी कारण के होती है। अतीत की पछतावे और भविष्य की चिंताएं खुशी के सबसे बड़े दुश्मन हैं। अतीत बीत चुका है और भविष्य अभी आया नहीं है। जीवन केवल ‘अभी’ में है। जो व्यक्ति वर्तमान क्षण की सुंदरता को देख लेता है, उसके लिए खुशी एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया बन जाती है। वह हर काम को पूरे होश और आनंद के साथ करता है। खुशी को स्वभाव बनाने के लिए सचेत अभ्यास की आवश्यकता होती है। शुरुआत में हमें अपने नकारात्मक विचारों को पहचानना होता है। जब भी मन किसी पुरस्कार के पीछे भागने लगे या उदासी को गले लगाए, तो खुद को याद दिलाएं कि मेरी खुशी किसी शर्त की मोहताज नहीं है। यह निरंतर अभ्यास ही हमारे भीतर एक स्थायी शांति स्थापित करता है। प्रकृति हमें बहुत कुछ सिखाती है। नदियाँ बहती हैं क्योंकि बहना उनका गुण है, इसलिए नहीं कि उन्हें समुद्र से कोई पदक चाहिए। पेड़ फल देते हैं क्योंकि वे उदार हैं। प्रकृति में कहीं भी प्रतिस्पर्धा या पुरस्कार की लालसा नहीं है, फिर भी सब कुछ कितना जीवंत और आनंदमय है। हम भी प्रकृति का हिस्सा हैं, हमें भी अपनी सहजता में लौटना होगा।शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य भी यही होना चाहिए—बच्चे को अपने स्वभाव से जोड़ना। आज की शिक्षा प्रणाली केवल ‘हासिल करने’ पर जोर देती है, ‘होने’ पर नहीं। अगर बच्चा यह सीख जाए कि उसकी आंतरिक प्रसन्नता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है, तो वह एक बेहतर समाज का निर्माण करेगा। वह केवल करियर के पीछे नहीं भागेगा!…बल्कि सार्थक जीवन जिएगा।सेवा और करुणा भी खुशी के स्वभाव को पुख्ता करते हैं। जब हम दूसरों की मदद करते हैं, तो हमारे भीतर एक विशेष प्रकार का संतोष पैदा होता है। यह चैन-संतोष किसी को दिखाने के लिए नहीं होता, बल्कि यह हमारे अस्तित्व का विस्तार है। दूसरों के आँसू पोंछने में जो सुख है, वह किसी भी व्यक्तिगत पुरस्कार से कहीं ऊपर है।

 

विचारों का हमारे स्वभाव लेकिन गहरा असर पड़ता है। यदि हम सकारात्मक और प्रेमपूर्ण विचार रखते हैं, तो खुशी हमारा अभिन्न अंग बन जाती है। विचारों का प्रबंधन करना ही वास्तव में अपने स्वभाव का प्रबंधन करना है। एक संतुलित मस्तिष्क ही उस खुशी का अनुभव कर सकता है जो बिना किसी बाहरी उद्दीपन के पैदा होती है। अंततः, ‘खुशी मेरा स्वभाव है’ यह कहना एक क्रांतिकारी घोषणा है। यह घोषणा आपको परिस्थितियों का दास बनने से बचाती है। आप दुनिया के खेल में भाग तो लेते हैं, पर…हार-जीत से प्रभावित नहीं होते। आप एक दर्शक की तरह जीवन का आनंद लेते हैं, जहाँ हर दृश्य महत्वपूर्ण है पर कोई भी दृश्य आपकी शांति-सुकून भंग नहीं कर सकता।

 

जब हम मरते हैं, तो हमारे साथ हमारे पुरस्कार या डिग्रियां नहीं जातीं। साथ जाता है तो वह स्वभाव जो हमने जीवनभर विकसित किया। अगर हमने खुशी के साथ जीना सीखा है, तो हम शांति के साथ विदा भी ले पाएंगे। जीवन का अंतिम यथार्थ यही है कि हम यहाँ केवल अनुभवों के लिए आए हैं, और सबसे खूबसूरत अनुभव अपने ही आनंद में स्थित होना है। इसलिए, आज से ही अपनी खुशी की शर्तों को तोड़ दीजिए। मुस्कुराइए, क्योंकि आप जिन्दा हैं। खुश रहें, क्योंकि यह आपका अधिकार व…आपकी मौलिक प्रकृति है। याद रखिए, सूरज को चमकने के लिए किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं होती, और आपको खुश रहने के लिए किसी पुरस्कार की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। आप खुशी ही हैं। व…आप ही खुशी हैं।

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