व्यंग्य
राजेन्द्र सिंह जादौन
(सम्पादक)
भोपाल म. प्र.
(नया अध्याय, देहरादून)
मध्यप्रदेश की राजनीति में गिद्धों का बढ़ता साम्राज्य?
हम मध्यप्रदेश के वासी हैं। हमारी पहचान सीधी-सादी, प्रकृति से जुड़ी, जल–जंगल जमीन का सम्मान करने वाली रही है। हम पेड़ों को पूजते हैं, नदियों को माँ कहते हैं, और जानवरों को अपने जीवन का हिस्सा मानते हैं। लेकिन समय ने हमें थोड़ा बदल दिया है या यूँ कहिए, हमारी प्राथमिकताएँ बदल दी गई हैं।
जमीन हमने व्यापारियों को दे दी, जंगल बड़े-बड़े “सेठों” के हवाले कर दिए, और अब हमारे पास बचा क्या? जानवर। और अगर कहीं जानवर नहीं हैं, तो हम पार्क बना लेते हैं और उन्हें वहाँ छोड़ देते हैं। क्योंकि हमें जानवरों से प्रेम है कम से कम दिखाने के लिए तो है ही।
कहानी यहीं से दिलचस्प होती है।
देश के बड़े नेता जब कुनो में चीते छोड़ते हैं, तो हमें गर्व होता है। लगता है कि इतिहास लौट रहा है, जंगल फिर से जिंदा हो रहे हैं। उसी उत्साह में हमारे अपने नेता भी पीछे नहीं रहते कहीं कछुए, कहीं भैंसे, कहीं और कोई जीव बस एक होड़ सी लगी है कि कौन कितना “प्रकृति प्रेमी” है। पर सवाल ये है कि क्या सच में हम प्रकृति प्रेमी हैं? या हम सिर्फ तस्वीरों में अच्छे दिखने वाले प्रेमी बन गए हैं?
क्योंकि इसी प्रदेश में इंसान की हालत देखिए कोई गंदा पानी पीकर बीमार हो रहा है, कोई अस्पताल में दवाई के अभाव में दम तोड़ रहा है, कोई अव्यवस्था का शिकार होकर हादसों में मर रहा है। लेकिन इन सबके बीच हमारी सबसे बड़ी चिंता क्या है?






