डॉ. ऋचा यादव
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
लघुकथा
जहर
ममता – क्या सच में कल रमन ने अपने पिता को मारने की कोशिश की?
माया – हाँ माँ, कल बहुत भयंकर लड़ाई हुई थी।
ममता – लेकिन वो तो अस्पताल में भर्ती हैं?
माया – हाँ माँ…
ममता (गंभीर होकर) – मुझे तो पहले से ही लग रहा था, एक दिन ऐसा ही होगा। उसकी स्कॉलरशिप, उसकी माँ की कमाई, घर-गहने—सब कुछ तो उसके सट्टे की भेंट चढ़ गया।
माया – और माँ, रमन खुद कह रहा था कि वह हर जान-पहचान वाले से उधार ले चुका है। अब तो हाल ये है कि वह कहीं भी निकलता है, लोग उसे घेर लेते हैं—मारते हैं, गालियाँ देते हैं और कहते हैं,
“चाहे मजदूरी करके चुका, लेकिन पैसे लौटा।”
तभी शिखर बोला – पहले जुआ, फिर सट्टा और अब शेयर मार्केट… बात तो एक ही है न? लोग इतनी सी बात समझते क्यों नहीं? ऐसे आदमी को तो जीने का हक ही नहीं…
माया ने आकाश की तरफ देखा। वह जैसे जड़ हो गया था।
“ऐसे आदमी को जीने का हक नहीं…”
ये शब्द हथौड़े की तरह उसके कानों में गूंजने लगे।
कुछ देर बाद उसने अपना मोबाइल उठाया और सट्टा, लॉटरी और शेयर से जुड़े सारे ऐप्स डिलीट कर दिए।
माया की ओर देखते हुए आकाश बोला –
“तुम सही कहती हो… पैसे कमाने का कोई शॉर्टकट नहीं होता।”
माया ने राहत की सांस ली –
“चलो अच्छा है… जो मैं प्यार से समझा नहीं पाई, वो शिखर की बात ने समझा दिया।”
ममता – हाँ, अब समझ आ जाए तो ही अच्छा है।







