युगपुरुष कविवर सूर्य
आध्यात्मिक दार्शनिक • मानवतावादी • समाज सुधारक
(भारतीय संस्कृति एवं सामाजिक समानता के प्रखर संरक्षक)
(नया अध्याय, देहरादून)
‘मर चुकी हैं संवेदनाएँ! (काव्य)’
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जानवरों का यह युग है रे
यहाँ हँसते-खेलते इंसान को
ज़िंदा और बड़ी बेरहमी से
मार देने में ये वक़्त नहीं लगाते
इनके भीतर की संवेदनाएँ
मर चुकी हैं या फिर कभी थी ही नहीं
सिर्फ़ मांस का एक लोथड़ा बचा है
जो नफ़रत की आग में जल रहा है
किन्तु याद रखना
वक़्त का पहिया थमता नहीं
इन असामाजिक तत्वों का
सुधार तो होकर रहेगा
चाहे कानून के डंडे से हो
या फिर कुदरत के न्याय से
इंसानियत अभी पूरी तरह हारी नहीं है
उजाला आएगा
और इन अंधेरों कोजड़ से मिटाएगा।







