अंधकार ही हमें प्रकाश का मूल्य सिखाता है

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सुश्री सरोज कंसारी

लेखिका/कवयित्री/शिक्षिका

अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति

गोबरा नवापारा राजिम, रायपुर, छ.ग.

 

           (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

लेख –

          अंधकार ही हमें प्रकाश का मूल्य सिखाता है

                      -सुश्री सरोज कंसारी

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जीवन की विविध समस्याओं और दुखों से घिरे मनुष्य को हर पल अंधकारमय प्रतीत होता है। तकलीफ में मनुष्य का मन विचलित हो जाता है। हम सभी अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का प्रयास करते हैं, पर यह जानने की कोशिश अवश्य करनी चाहिए कि आखिर जीवन का अंधकार है क्या? अंधकार रूपी बुराइयों को दूर करके हम जीवन को मूल्यवान, सार्थक और श्रेष्ठ बना सकते हैं।

 

जैसी अंतर्मन की स्थिति होती है, बाहरी दुनिया भी वैसी ही प्रतीत होती है। मनोदशा को हमेशा स्वस्थ रखने के लिए आत्म-मंथन द्वारा चुनिंदा और सार तत्वों का अनुकरण करना ज़रूरी है। सबसे पहले मन से नकारात्मक सोच दूर कीजिए। “मुझसे नहीं होगा” यह अज्ञानपूर्ण बात है। सब कुछ हार कर भी सोचिए— अब आप सतर्क, जागरूक, अनुभवी और परिपक्व हो गए हैं। जो छूट गया, या किसी कारणवश सफल नहीं हुए, उसमें कुछ कमी थी। अब सुधार का अवसर है।

 

जब तक जीवन है, याद रखिए: जीने के लिए कई बहाने हैं। अंत तक उत्साहित रहकर कार्य कीजिए। अपनी चाहतों को बंदिशों के घेरे में मत रखिए। जो नहीं जानते, उसके लिए अफ़सोस करने के बजाय जिज्ञासु होकर आगे बढ़ें और खोज करते रहें। आप धीरे-धीरे सब कुछ सीख जाएंगे।

 

जीवन उसी दिन अंधकारमय होने लगता है जब आप निष्क्रिय हो जाते हैं, डर कर रुक जाते हैं, और निराश होकर अंदर ही अंदर घुटते हैं। जब आप शिकायत करते हैं, खुद को दीन-दुखी, अभागा और कमज़ोर मान लेते हैं। सांसारिक जीवन में जब हम अति में क्रोध, लोभ और वासना के पीछे भागते हैं, तब पूरी तरह उसमें डूब जाते हैं और बुरी तरह उलझ जाते हैं। मन-मस्तिष्क उत्तेजित और अशांत हो जाता है, जीवन नर्क के समान हो जाता है। कहा भी गया है: अति का अंत निश्चित है।

 

संयम, संस्कार और जीवन-मूल्यों के अभाव में हम आज व्यथित हैं। आधुनिक जीवन शैली में पाने की होड़ से मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है। आज हम जीवन का हर सुख पाना चाहते हैं, औरों को दुखी करके आगे बढ़ रहे हैं। कुछ पाकर घमंड से चूर हो गए। हमें होश नहीं कि जोश में क्षणिक सुख के लिए हम क्या कीमती चीज़ खो रहे हैं। धर्म, अध्यात्म और नैतिकता से दूर, भोग और मोह में सब भूल गए। शील, शर्म और सादगी से कोसों दूर, बस अपने सुख के लिए स्वार्थ की एक लंबी दौड़ में भटक गए। अपनी जिम्मेदारियाँ भूल गए। आज कसमें-वादे, प्यार और वफ़ा की बातें सिर्फ कहने तक ही सिमट गई हैं। दिल के एहसास आज कोई मायने नहीं रखते। लोग झूठी कहानी में खुद को हीरो और औरों को ज़ीरो साबित करने में लगे हैं।

 

जीवन को प्रकाशित, सुंदर और सार्थक करने के लिए अच्छाइयों को ग्रहण करते रहिए। धर्म शास्त्र पढ़िए, सत्संग में रहिए, कुछ क्षण अपने साथ ध्यान मग्न रहिए। जो मिला है उसके लिए आभारी रहिए। किसी को दोष देना बंद कीजिए। सही कर्म कीजिए, बुरे कर्म से डरिए। निस्वार्थ सेवा और सहयोग कीजिए। जीवन एक भ्रम है, इसे याद रखिए और भलाई करते रहिए। मिलकर रहना और अपनी व औरों की खुशियाँ बाँटना सीखिए।

 

वक्त बदलेगा आपकी अच्छी सोच, मेहनत और ईमानदारी से। तनाव में बहकिए नहीं, बल्कि संभलकर रहिए। भीतर जो ईर्ष्या, बैर, नफ़रत, बदले का भाव और बेईमानी जैसी अनेक बुराइयाँ भरी हैं, उन्हें निकालिए। शुद्ध और सरल बनिए। दुर्भाव मुक्त होंगे तभी ईश्वर की कृपा होगी।

 

सत्कर्म ही जीवन का प्रकाश है। अच्छे कर्म से ही गम का अँधियारा मिट सकता है। दुर्भाव के अंत के बाद ही जीवन में सद्भाव के दीप जलते हैं। जीवन में चाहे कितनी भी दुख-तकलीफ़ हो, हमेशा विश्वास बनाए रखिए। श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक सोच से जीवन को साकार कीजिए। मन का मैल धो लीजिए, तभी यह संसार स्पष्ट और सुंदर दिखाई देगा।

 

इसलिए अंधकार से डरना मत, उसे स्वीकार करना होगा। अंधकार ही हमें प्रकाश का मूल्य सिखाएगा। आज से ही एक संकल्प लीजिए— प्रत्येक दिन एक अच्छा विचार, एक अच्छा कर्म और एक आभारी भाव। यही छोटे-छोटे दीप मिलकर आपके जीवन को महाप्रकाश से भर देंगे।

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