सुश्री सरोज कंसारी
लेखिका/कवयित्री/शिक्षिका
अध्यक्ष: दुर्गा शक्ति समिति
गोबरा नवापारा राजिम, रायपुर, (छ.ग.)
(नया अध्याय, देहरादून)
डर से आगे (कविता)
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वक्त की इन आँधियों से, लड़ना हमको आता है,
खुशियों के कुछ दीप जलाना, धर्म हमारा कहलाता है।
डरने से क्या होगा पथिक! अब डर के आगे जाना है,
कर्मपथ पर चलकर हमको, फिर से जीत दिखाना है।
अकर्मण्यों का जीवन जग में, केवल मृत्यु समान है,
चुनौतियों की पगडंडी ही, वीर की असली पहचान है।
सुख-दुख की इस नदिया में, साहस ही पतवार है,
काँटों के बीच रहकर भी, फूलों सा हमें मुस्काना है।
उलझनों को पार कर, जीवन सफल बनाना है,
गम की गठरी छोड़कर, खुशियों को अपनाना है।
बैठ न जाना थक कर तुम, मंजिल अब भी दूर है,
विपरीत धाराओं को चीर, पाना अपना छोर है
धैर्य की राह पर चलकर ही, हिम्मत को बढ़ाना है,
संघर्ष ही जीवन का नाम, लड़ते ही हमें जाना है।
अंधियारों के बीच भी तुम, औरों का साहस बढ़ाओ,
लक्ष्य पर रख अटूट ध्यान, खुद का इतिहास बनाओ।






