राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
नया अध्याय, देहरादून
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कहलाती है माँ.
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हथेलियों में नरम धूप
और पलकों पर सपनो की राख लिए
कदम-कदम नापती चलती है वह जो
कभी चिड़िया रही, पर नहीं, घर नहीं
हजारों-प्रहर, हजारों जन्मों का सफ़र
सोते-जागते, उठते-बैठते हर कहीं
धँसते ही जाते हैं फिर-फिर
पाँव-पाँव,गाँव-गाँव तीनों लोक
उसके भीगे इरादों में रहते हैं देवता
अँकुरित अन्न जैसे बँधी पोटली में
शोर बहुत है सरकारों की ओर से
पढ़ेगी बेटी तो बढ़ेगी बेटी
चूल्हा फूँकते हुए धुएँ में आँखें अपनी
खोती है, खोजती है रह-रहकर
मिलता नहीं है पता-ठिकाना
कच्चे धागे से दु:ख सिलती रहती है
खाती है बचा-खुचा सभी से छुपाकर
मुदित-मन मुस्काती है फिर हर सुबह
कहलाती है माँ
नन्हें-नन्हें हाथों के लिए कभी दस्ताने
और कभी रँग-बिरँगे स्वेटर बुनती रहती है
भूलते हुए स्वैग अपना.
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